कोलकाता से अमिताभ भट्टासाली पश्चिम बंगाल के लालगढ़ और सालबोनी इलाके में हथियारों से लैस 'माओवादियों' और आदिवासियों ने लगभग पच्चीस गाँवों पर नियंत्रण कर लिया है। पश्चिमी मिदनापुर के इन इलाकों से आंदोलन कर रहे लोगों ने पुलिस को खदेड़ दिया है और वे अर्धसैनिक बलों को भी वहाँ नहीं घुसने दे रहे हैं। इन लोगों ने पश्चिम बंगाल में सत्तारुढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपएम) के दफ्तरों को निशाना बनाया और सीपीएम के कार्यकर्ता इलाके से भागने को मजबूर हो गए। माओवादियों का दावा है कि पश्चिम बंगाल में यह उनका पहला 'आजाद क्षेत्र' बन गया है।स्थानीय आदिवासी 'पीपुल्स कमेटी अगेंस्ट पुलिस एट्रोसिटीज' यानी पीसीएपीए के बैनर तले सीपीएम का विरोध कर रहे हैं। सीपीएम के एक नेता ने बताया, 'माओवादियों ने सोमवार को धरमपुर गाँव में उत्पात मचाया और हमारे एक कार्यालय में आग लगा दी। तीन या चार लोग मारे गए हैं और छह से ज्यादा लापता हैं।' धरमपुर में सीपीएम का नियंत्रण रहा है जबकि आस-पास के बाकी गाँवों पर पिछले नवंबर से ही माओवादियों का नियंत्रण रहा है। समस्या की जड़ : पिछले साल नवंबर में ही पुलिस ने राज्य के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य की हत्या करने के प्रयास के आरोप में कुछ स्थानीय लोगों को गिरफ्तार किया था। तब एक बारूदी सुरंग के हमले में बुद्धदेब बाल-बाल बचे थे, लेकिन गिरफ्तारियों के विरोध में उस इलाके में पीसीपीए का गठन हुआ। स्थानीय लोगों की मदद से माओवादियों ने इस इलाके में पुलिस और प्रशासन के लोगों को आने की मनाही कर दी।लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग भी वहाँ मतदान केंद्र बनाने में विफल रहा और इलाके से बाहर मतदान केंद्र बनाए गए। यहाँ सीपीएम और माओवादियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चलती रही है लेकिन पिछले कुछ सालों में माओवादियों का दखल बढ़ा है।एक वरिष्ठ माओवादी नेता ने कहा, 'हम स्थानीय गाँव वालों की मदद से बाँधों, नहरों और सड़कों का निर्माण कर रहे हैं। हम स्वास्थ्य शिविर भी चला रहे हैं। सरकार ने यहाँ विकास का कोई काम नहीं किया है। इसलिए हमें ये जिम्मेदारी लेनी पड़ी।' पश्चिम बंगाल में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) प्रतिबंधित संगठन नहीं है और सत्तारूढ़ सीपीएम कहता रहा है कि वो माओवादियों का मुकाबला राजनीतिक स्तर पर करेंगे। |