रामकिशोर पारचा (वरिष्ठ फिल्म समीक्षक) पाकिस्तानी शायर हफीज जालंधरी ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी लिखी एक नज्म की कुछ पंक्तियाँ दुनिया के हर उस शख्स के लिए उसकी ताकत और बुझती हुई जिंदगी का नया फलसफा बन जाएँगी जो उम्र के अंतिम दौर में समाज के रहमो करम पर आश्रित हो जाता है।उम्र के 97 पड़ाव पार कर चुकीं वरिष्ठ अभिनेत्री और डांसर जोहरा सैगल 1983 में जब पाकिस्तान गईं तो उनसे लोगों ने हफीज जालंधरी की नज्म की वही पंक्तियाँ- अभी तो मैं जवान हूँ- सुनाने का आग्रह किया। पिछले दिनों दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने जब उनके सम्मान में एक समारोह आयोजित किया तो उनकी चहक और उत्साह देखने लायक था। उन्होंने अपना गुलदस्ता उनके देने से पहले ही लपक लिया और जोर से हँसते हुए बोलीं, इससे पहले कि आप लोग इसे मुझे देना भूल जाएँ, मैं खुद ही इसे ले लेती हूँ।हालाँकि अब वे लोगों से कम बात करती हैं लेकिन यदि कोई उनके मन भा जाए तो फिर उन्हें रोकना आसान नहीं। हमने उनसे उनके जीवन और करियर के लम्बे सफर के कुछ ऐसे पहलुओं पर एक लंबी बातचीत की जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।*चीनी कम और साँवरिया के बाद अपने फिल्में क्यों नहीं कीं?- जब तक मुझे कहानी पसंद नहीं आती और मैं अपने पात्र और चरित्र के साथ आत्मीयता नहीं बना लेती तब तक मैं काम नहीं करती। ऐसा भी हुआ जब मुझे कहानी तो पसंद आई लेकिन मेरे लिए जो चरित्र लिखा गया उसमें जान नहीं थी। तब मैंने उसे सुधरवाकर फिल्म में काम किया। चीनी कम के समय मैंने बाला के साथ ऐसा ही किया। अमिताभ बच्चन की माँ बनना आसान नहीं था। आजकल प्रितीश नंदी की एक फिल्म 36-24-36 पर बात हो रही है। इसमें एक बार फिर मुझे ऐसा ही मौका मिलेगा। पर अभी तक मैं इसके लिए तैयार नहीं हुई हूँ। शायद जुलाई में काम शुरू होगा। *आपने अभी तक फिल्मों में जितनी भी माँ या दादी की भूमिकाएँ की वो ऐसी थीं जो अपने बच्चों को हमेशा ही अंत में अपनी तरह जीने की आजादी देती है?- ये सारी भूमिकाएँ मेरे अपने जीवन के सचों से जुडी रही हैं। मैं रोहिल्ला पठान परिवार में पैदा हुई। मुझे मेरे सपनों की तरह जीने की आजादी नहीं थी। मेरे परिवार में बुर्का और पाँच वक्त की नमाज जरूरी थी। मैं उड़ना चाहती थी। गाना चाहती थी और नाचना चाहती थी। एक दिन मेरे यूरोप में रहने वाले चाचा ने ब्रिटेन के एक आर्टिस्ट के बारे में बताया और कहा कि तुम वहाँ जा सको तो तुम्हारे सपने पूरे हो जाएँगे। उस समय मैंने ईरान, मिस्र होते हुए यूरोप तक की यात्रा सड़क और पानी के रास्ते तय की। इसीलिए मेरी फिल्मों की भूमिकाएँ इन घटनाओं से मेल खाने वाली रहीं जहाँ नायक या नायिका को अपनी तरह से जीने की छूट दी जाती है।*तो क्या यही आपके यहाँ तक पहुँचने की शुरुआत थी?- शायद नहीं, इसकी शुरुआत तो मेरी बहन उजरा के साथ बचपन में ही हो गयी थी। मेरे घरवाले मुझे सात भाई बहनों में सबसे अलग मानते थे। उनका मानना था कि मुझे लड़की नहीं लड़का होना चाहिए था और यूरोप जाना मेरे सपनों तक पहुँचने की सीढ़ी बन गया। *आपके घरवालों ने विरोध नहीं किया। आपको लगता है कि यदि आप यह नहीं करतीं तो यहाँ तक नहीं आतीं?- जब आप अपने मन की करतें हैं तो उसका विरोध तो होता ही है, लेकिन धीरे-धीरे सब बदल जाता है। यूरोप में मैंने पहली बार उदय शंकर का बैले शिव-पार्वती देखा और वहीँ मेरी मुलाकात कामेश्वर सैगल से हुई। पहले प्रेम हुआ और फिर शादी। यह सब तय होता है। पंडित नेहरु मेरी शादी में आए थे। उन्होंने मुझसे पूछा तुम यह सब करके खुश तो हो न। मेरे लिए एक प्रधानमंत्री का यह पूछना सबसे बड़ा उपहार था। सब बदल गया था मेरा जीवन भी। *आपने लाहौर से मुंबई और फिर यूरोप से लेकर फिल्मों, टीवी और रंगमंच का एक लंबा सफर तय किया है। इन सत्तर सालों के सफर में अब आपके लिए क्या बदल गया है?- सब कुछ। मैंने शुरू में अभिनय के बारे में नहीं सोचा था। मैं केवल कोरियोग्राफर बनना चाहती थी और चेतन आनंद के साथ नीचा नगर में जब मौका मिला तो तुंरत लपक लिया। वो मेरी पहली फिल्म थी और भारत की ऐसी फिल्म भी जिसने कांस में पहली बार भारत को गोल्डन पाम दिलाया। उसके बाद ऐसा मौक़ा नहीं आया। फिर बाजी, सीआईडी और आवारा थीं जिनमें मेरी भी भूमिकाएँ थीं। बस तब से अभिनय भी शुरू हो गया। विभाजन के बाद हम बच्चों के साथ मुंबई चले गए और मैंने पृथ्वी थियेटर के साथ इप्टा के नाटकों में काम करना शुरू किया। शकुंतला, पठान, दीवार, गद्दार करना मेरे लिए नए अनुभव की तरह थे। *उन दिनों का ऐसा क्या काम है जो आप कभी नहीं भुला पाईं?- मैंने राजकपूर की आवारा का ड्रीम्स सीक्वेंस कोरियोग्राफ किया था। उसके बाद वैसा काम दोबारा नहीं देखा गया। सब कुछ हमने अपने हाथों से किया। अब रचनात्मकता पर तकनीक हावी है। इसलिए लोग मन से लोगों के साथ नहीं जुड़ पाते। लंदन से आकर एक बार मैं फीरोजपुर जेल में नाटक करने गयी थी, लेकिन नाटक के बाद लोगों ने मुझे धमकाया और कहा कि दोबारा यहाँ आकर ऐसा न करूँ। उसके बाद कई साल पहले हाउस ऑफ बर्नार्ड किया। फिर मन नहीं किया। *आप बीच बीच में कहाँ गायब हो जाती हैं?- गायब नहीं होती। जिंदगी का कुछ पता नहीं। कब क्या हो जाए। हर बार कुछ न कुछ ऐसा होता रहा जिससे मैं लगातार काम नहीं कर सकी। साठ के दशक में भारत आई तो उदय शंकर के स्कूल में अल्मोड़ा पढ़ाने चली गयी। फिर कामेश्वर नहीं रहे। लंदन लौटकर बच्चों को बड़ा करना था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। इसलिए एक बार्बर शॉप में लोगों के बाल काटने लगी। उसी समय बीबीसी पर रुडयार्ड किपलिंग की एक श्रृंखला में काम मिला। काम शुरू हो गया पर सही मायनो में मेरी वापसी जेम्स आयवरी के साथ हुई। एक तरह से यह मेरे करियर की दूसरी शुरुआत थी। *उस समय कौन से फिल्में और टीवी शो किए आपने?- ज्वेल इन द क्राउन, तंदूरी नाइट्स मेरे सबसे लोकप्रिय शो थे। माइंड योर लैंग्वेज और पार्टीशन भी किया। पर सबके नाम बताऊँगी तो तुम्हारा इंटरव्यू बहुत बड़ा हो जाएगा। (ठहाका लगाती हैं) पर मुझे सब याद हैं। हाँ, अम्मा ऐंड फेमिली करते हुए बड़ा मजा आया। *पर आपने ज्यादात काम अंग्रेजी में ही क्यों किया?- मेरे लिए भाषा हमेशा एक समस्या रही। अंग्रेजी में कोई दिक्कत नहीं थी पर हिंदी में काम करने के लिए मुझे कहानी और संवादों को उर्दू या रोमन में लिखवाना पड़ता है। उर्दू मेरी भाषा है पर रोमन में काम करना मुझे रोमांचित नहीं करता। मैं उन लोगों की शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होंने मुझसे दिल से, हम दिल दे चुके सनम, दिल्लगी, तेरा जादू चल गया, चीनी कम और साँवरिया जैसी फिल्मों में इसके बावजूद काम करवाया। *ऐसे कौन से लोग और लम्हे हैं जिन्हें आप हमेशा याद करती हैं?- चेतन आनद और राजकपूर को मैं कभी नहीं भुला सकी। फिर कुछ साल पहले जब गोविंदा के साथ एक फिल्म- चलो इश्क लड़ाएँ की तो मुझे बड़ा मजा आया। (फिर जोर से ठहाका लगाती हैं) उसमें मुझे हर पाँच मिनट में उसे एक जोर का थप्पड़ लगाना पड़ता था और बेचारा चुपचाप शोट के बाद एक तरफ जाकर बैठ जाता था। वो एक मसाला फिल्म थी और इस फिल्म में मुझे मोटर साइकिल चलाने का भी मौका मिला। *और रंगमंच पर?- नसीर, शबाना और नंदिता मुझे बहुत प्रभावित करते हैं। नंदिता और शबाना का एक नाटक- स्प्रिट ऑफ ऐन फ्रैंक मुझे बहुत भाया था। *आप उम्र का शतक छूने जा रही हैं। आपके चाहने वाले कहते हैं कि आपके पास इतनी खुशनुमा जिंदगी जीने का कोई राज है?- हाँ है ना, (हँसती हैं) यही सवाल एक बार किसी और ने भी पूछा था। उस दिन टॉम आल्टर मेरे साथ थे। उन्होंने मजाक में कह दिया कि मैं रोज एक जिंदा छिपकली खाती हूँ। बस लोग उठकर चले गए। पर सही मायनों में मैं एक सख्त नियम वाली इंसान हूँ। आज भी मैं आवाज को बनाए रखने के लिए रियाज करती हूँ। देखिए....(जोर से चिल्लाकर दिखाती हैं) अब मैं नाच नहीं पाती, लेकिन अपनी बेटी किरण सैगल के साथ अभिव्यक्तियों और प्रभावों के लिए रोज अभ्यास करती हूँ। उम्र आपके शरीर में नहीं दिमाग में होती है और खुशी बाहर नहीं आपके भीतर होती है, इसलिए मैं हमेशा अपने हँसने और मुस्कुराने के सामान ढूँढ लेती हूँ। जिंदगी का यह खेल मुझे अच्छा लगता है। *सुना है पिछले दिनों आपने आईपीएल भी बहुत एन्जॉय किया?हाँ, खूब। मैं सुन नहीं पाती, लेकिन दिखाई तो पूरा देता है। पर मैं तभी देखती थी जब सचिन खेलता था। वो मेरा पसंदीदा खिलाड़ी है (हँसती हैं)। |