पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने अपने कार्यकाल में कई चुनौतियों का सामना किया। उनके कार्यकाल के दौरान सचिव रहे पीएम नायर ने उन पर एक किताब लिखी है। 'द कलाम इफेक्टर : माई ईयर्स विद द प्रेसिडेंट' के कुछ अंशों पर खुद नायर के साथ कलाम के व्यक्तित्व के कुछ अनछुए पहलुओं पर चर्चा कर रहे हैं रेहान फजल।
अपने असाधारण हेयर स्टाइल और परंपरागत रूप से चीजों को न करने के जज्बे के साथ अबुल पाकिर जैनलआबदीन अब्दुल कलाम ने पाँच साल राष्ट्रपति भवन में गुजारे।
जुलाई 2002 में भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति बने कलाम ने राष्ट्रपति पद के बारे में नजरिए को ही बदलकर रख दिया। इन पाँच सालों में कलाम के सचिव रहे नायर कहते हैं उन से अच्छा बॉस किसी को मिल ही नहीं सकता।
'मुझे कोई तनाव नहीं था क्योंकि मुझे काम करने की पूरी आजादी थी। मैं हर मसले पर उनके सामने अपनी राय रख सकता था। कलाम ऐसे राष्ट्रपति थे जिनके लिए मुझे 'यस सर-यस सर' कहने की जरूरत नहीं थी। वो इस तरह की चीज में बिलकुल यकीन नहीं करते हैं। कलाम हमेशा अपने मातहत काम करने वालों की ना सुनने के लिए तैयार रहते थे।'
बेहद सादा कलाम : कलाम के जमाने में राष्ट्रपति भवन एक ऐसी जगह बन गया था, जहाँ आम लोगों की पहुँच हो सकती थी। कोई भी शख्स उन्हें ई-मेल कर सकता था, जिसका जवाब वो खुद दिया करते थे।
नायर जिक्र करते हैं कि एक बार आगरा की एक लड़की ने उन्हें खत लिखा कि एक पार्क जहाँ वो खेलती है, वहाँ का झूला काम नहीं कर रहा। उन्होंने तुरंत जिला कलेक्टर को फोन करवाकर उसे ठीक करवाया।
जब भी उनके रिश्तेदार उनसे मिलने राष्ट्रपति भवन आते वो उनकी खिदमत का पूरा खयाल रखते। यहाँ तक की पूरा खर्च अपनी जेब से दिया करते थे।
नायर बताते हैं कि एक बार उनके बड़े भाई उनसे मिलने आए। उस वक्त उनकी उम्र तकरीबन 91 साल थी। उनके पैरों में भी तकलीफ थी, लेकिन कलाम साहब ने एक बार भी सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल नहीं किया। ये लोग अजमेर शरीफ भी गए, लेकिन उन्होंने कहा किसी को मत बताना।
नायर कहते हैं कि कलाम एक बेहद नेक शख्सियत हैं। उनके अंदर कोई दिखावा नहीं है। वो एक सरल और बेहतरीन इनसान हैं। नायर ने बताया कि उनके भाई हज के लिए मक्का गए। कलाम ने मुझसे साफ कह दिया था कि वो किसी भी तरह से उनके लिए कुछ स्पेशल नहीं करना है।
नायर बताते हैं कि किसी भी राष्ट्रपति को भोज में खर्च करने के लिए दो-ढाई लाख रुपए का कोटा होता है, लेकिन कलाम ने कहा कि इतना पैसा खाने-खिलाने में खर्च करने की बजाय क्यों न हम ये पैसा किसी अनाथ आश्रम में जाकर दान कर दें।
रमजान के वक्त कलाम ने कंबल और गर्म बनियानें खरीदीं इनके साथ कुछ खाने-पीने की चीजें लीं और सभी चीजों को एक अनाथ आश्रम में जाकर दान कर दिया। इन सब चीजों के लिए उन्होंने अपनी जेब से एक लाख रुपए अलग से भी दिए।
कलाम का मानवीय चेहरा : कलाम का सादा व्यक्तित्व ही उनके कद को ऊँचाइयाँ देता है। उनके सचिव रहे नायर बताते हैं कि एक बार मेरी माँ ने उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की। उस वक्त वो कलाम से 10 साल बड़ी थीं। उन्होंने कहा- हाँ जरूर लेकर आओ। वो मेरी माँ से पूरे सम्मान के साथ मिले।
20-25 मिनट की मुलाकात के बाद जब हम जाने लगे तो उन्होंने कहा आप जरा रुकिए और अंदर जाकर एक बेहद कीमती शॉल मेरी माँ को तोहफे में दिया। वो तो हमें नीचे तक छोड़ने आना चाहते थे, लेकिन मैंने उन्हें कहा कि वो राष्ट्रपति हैं तभी वो इसके लिए माने।
नायर बताते हैं कि एक बार मेरी पत्नी सड़क हादसे में घायल हो गईं। वो राष्ट्रपति कलाम से मिलकर उन्हें बधाई देना चाहती थी। मैंने जब उन्हें ये बताया तो वो खुद ही हमारे घर पहुँच गए।
राष्ट्रपति के तौर पर कलाम : लेकिन, एक राष्ट्रपति के तौर पर कलाम की खासी आलोचना भी की गई। जिस तरह से उन्होंने 23 मई 2005 को अपनी रूस यात्रा के दौरान मंत्रिमंडल की सलाह पर आधी रात को बिहार विधानसभा को भंग कर दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी भी की थी।
हालाँकि कलाम के इस बिल पर हस्ताक्षर करने को लेकर दो अलग-अलग राय हैं। जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक इंदर मल्होत्रा कहते हैं कि राष्ट्रपति कलाम ने इस बिल पर दस्तख़त करने में ज्यादा जल्दी दिखाई। इंदिरा गाँधी के वक्त में तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरी विदेश यात्रा पर कीव में थे। वो इंदिरा गाँधी की मेहरबानी से ही राष्ट्रपति बने थे। इंदिरा गाँधी ने उनके पास दस्तखत के लिए एक बिल भिजवाया, लेकिन उन्होंने कहा कि वो इस पर अध्ययन के बाद ही फैसला करेंगे।
शाम को कैबिनेट की मीटिंग हुई। उसके बाद प्रधानमंत्री से लंबी बातचीत के बाद बिल को फैक्स करके राष्ट्रपति के पास मास्को भिजवाया गया। कलाम ने इस पर तुरंत दस्तखत करके वापस भिजवा दिया। इसीलिए तो सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि ये विधान के विपरीत है।
नायर याद करते हैं कि इस सारे विवाद के दो दिन बाद उन्होंने उन्हें अपने कमरे में बुलाकर अपनी जेब में रखा लिफाफा दिखाया। कलाम साहब ने कहा कि मैंने कुछ फैसला किया है। नायर ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन कलाम ने उन्हें ये कहकर चुप करा दिया कि उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर ये फैसला किया है।
मेरा खयाल है कि वो इस्तीफा होगा। उस वक्त समाचार-पत्रों में आता था कि राष्ट्रपति को बिहार के मामले में बिल पर दस्तखत नहीं करने चाहिए थे। उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।
मैंने उन्हें बताया कि अगर मैं आपको उस वक्त सलाह देता तो बिलकुल यही करने को कहता जो आपने दस्तखत करके किया। आपने कुछ भी गलत नहीं किया। नायर कहते हैं कि तकनीकी तौर पर सारी चीजें सही थीं। लिहाजा उन्हें इस पर थोड़ा भी रुकने की जरूरत नहीं थी।
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