वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगले दस सालों में एशियाई गिद्घ विलुप्त हो सकते हैं। इसके लिए जानवरों को दी जाने वाली एक दवा को दोषी ठहराया गया है।
सर्वेक्षण करने वाली टीम का कहना है कि हालाँकि सरकार ने जानवरों को दर्द के लिए दी जाने वाली दवा डाइक्लोफिनेक पर प्रतिबंध लगा दिया है लेकिन इसे अभी भी किसानों को बेचा जा रहा है। यह नया सर्वेक्षण बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि सफेद पूँछ वाले एशियाई गिद्घों की संख्या 1992 की तुलना में 99.9 प्रतिशत तक कम हो गई है। इसके अनुसार लंबे चोंच वाले और पतली चोंच वाले गिद्घों की संख्या में भी इसी अवधि में 97 प्रतिशत की कमी आई है। जूलॉजिकल सोसायटी ऑफ लंदन के एंड्र्यू कनिंघम इस रिपोर्ट के सहलेखक हैं।
वे कहते हैं- 'इन दो प्रजातियों के गिद्घ तो 16 प्रतिशत, प्रतिवर्ष की दर से कम होते जा रहे हैं।' उनका कहना है- 'यह तथ्य अपने आपमें डरावना और विचलित करने वाला है कि सफेद पूँछ वाले गिद्घ हर साल 40 से 45 प्रतिशत की दर से कम होते जा रहे हैं।'
खतरनाक दवा : इससे पहले भी वैज्ञानिकों ने कहा था कि यदि भारत में लगातार विलुप्त हो रहे गिद्घों को बचाना है तो जानवरों को दी जाने वाली दवा को बदलना होगा। कहा गया था कि इस दवा को खाने वाले जानवरों का मांस खाकर पिछले सालों में गिद्घ की प्रजाति लगातार खत्म हुई है।
शोधकर्ताओं ने सलाह दी थी कि जानवरों को डाइक्लोफिनेक नाम की दर्दनाशक दवा को बंद कर देना चाहिए। भारत सरकार ने इसे वर्ष 2006 में प्रतिबंधित भी कर दिया था लेकिन भारतीय और ब्रिटिश शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रतिबंध का कोई खास असर नहीं हुआ है।
उपयोगी गिद्घ : गिद्घ का साफ-सफाई में सामाजिक योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गिद्घों के विलुप्त होने की रफ्तार यही रही तो एक दिन ये सफाई सहायक भी नहीं रहेंगे। जैसा कि वे बताते हैं 90 के दशक की शुरुआत में भारतीय उपमहाद्वीप में करोड़ों की संख्या में गिद्घ थे लेकिन अब उनमें से कुछ लाख ही बचे हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि गिद्घों को न केवल एक प्रजाति की तरह बचाया जाना जरूरी है बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी जरूरी हैं। वे चेतावनी देते रहे हैं कि गिद्घ नहीं रहे तो आवारा कुत्तों से लेकर कई अन्य जानवर मरने के बाद सड़ते पड़े रहेंगे और उनकी सफाई करने वाला कोई नहीं होगा। इससे संक्रामक रोगों का खतरा भी बढ़ेगा।
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