पाकिस्तान की काल कोठरी से मुझे मेरे वतन भारत लाने में अंसार बर्नी का सबसे बड़ा हाथ रहा है। उन्होंने भाग-दौड़ कर मेरा मामला सार्वजनिक मंच पर उठाया और मुझे नई जिंदगी दी।
अभी कुछ दिन पहले पाकिस्तान के पूर्व मंत्री अंसार बर्नी साहब पंजाब आए थे तो उनकी खूब खातिरदारी की गई थी। इत्तफाक की ही बात है कि मैं चार मार्च को भारत लौटा था तो ठीक एक महीने बाद चार अप्रैल को वो भारत आए।
अब अपने गाँव के आँगन में बैठा मैं सोचता हूँ कि पता नहीं और कितने लोगों ने मेरे लिए अरदास की होगी, कितने लोगों की दुआ रंग लाई होगी जो मेरे जैसा गुनाहकार आज अपने गाँव, अपने देश में बैठकर आप तक ये बात पहुँचा पा रहा है।
जब से आया हूँ 24 घंटे भी दिन में कम लग रहे हैं। लोगों, रिश्तेदारों का ताँता लगा रहता है। रहा सका वक्त पत्रकार भाई-बहनों को इंटरव्यूह देने में चला जाता है। फिर मेरे पैरों में भी इतनी सोजिश थी कि चलने-फिरने में दिक्कत हो रही थी। टखनों पर पड़े स्थायी निशाँ रह-रह कर जेल की बेड़ियों की याद दिलाते हैं।
खैर मैं मिलने-मिलाने की बात कर रहा था...घर पर दिनों तक मिलने वालों की भीड़ लगी रही। लोगों की इस भीड़ को चीरती मेरी आँखों को खोए हुए अपनों की तलाश रहती हैं, शायद कोई पुराना दोस्त मिल जाए जिसे तपाक से बाहों में भरूँ, गले लगा सकूँ, लेकिन आँखें तरसती ही रह जाती हैं।
पुराने दोस्तों-यारों से जाकर मिलना भी चाहूँ तो किससे मिलूँ। जिनके साथ बचपन बिताया, जवानी में मौज-मस्ती की उनमें से ज्यादातर रब्ब को प्यारे हो चुके हैं।
मैंने अपनी डायरी में पहले लिखा था कि मेरे पीछे से इन 35 सालों में मेरे गाँव का नाम बदल गया, दुनिया बदली। बदलाव की इस चाल से तो आप कदमताल करने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन उन लोगों को कहाँ से ढूँढकर लाऊँ जो मेरे पीछे से मुझे हमेशा के लिए अलविदा कह कर चले गए।
जिंदगी के खोए हुए लम्हों, पीछे छूटे रिश्तों का हिसाब-किताब कैसे करूँ। अभी तो जो लोग मुझसे मिलते हैं उनमें से ज्यादातर मेरे लिए अंजान हैं। कई पुराने दोस्तों के बेटे-बेटियाँ आजकल मुझे देखने आते हैं, नए-नए चेहरे- मैं तो पहचान भी नहीं पाता कि वो कौन हैं।
खुद से अभी तक किसी दोस्त या रिश्तेदार के घर जाकर उनसे मिल नहीं पाया हूँ। हाँ कुछ मन्नतें माँगी हुई थीं तो कई गुरुद्वारों में जाकर मत्था जरूर टेका है मैंने। चंद दिन पहले ही आनंदपुर साहब जाकर जाकर मैंने अरदास की। बस अभी यही सब चल रहा है।
ये दुआ है मेरी रब्ब से... वैसे जिन लोगों के साथ पाकिस्तान की जेल में दिन बिताए हैं कभी-कभी उनकी याद भी आती है, लेकिन कुछ कर नहीं सकता मजबूर हूँ।
पाकिस्तान की जेल में क़द मैं अकेला भारतीय कैदी नहीं रहा हूँ। भारतीय कैदियों की असल संख्या का इल्म तो मुझे नहीं है, लेकिन ये दावे के साथ कह सकता हूँ कि अपने जेल प्रवास के दौरान चार भारतीय कैदियों को जरूर देखा है मैंने। भारत का एक कैदी मुझे याद है जो मेरे साथ कुछ अरसा रहा था, उसका नाम गोपाल दास है। जब मैं पाकिस्तान से वापस आ रहा था तब वो लाहौर जेल में था, अब पता नहीं। वो गुरदासपुर का रहने वाला है।
किरपालसिंह नाम के व्यक्ति को भी मैंने देखा था। फिरोजपुर का एक कैदी मक्खनसिंह भी पाकिस्तान के लाहौर जेल में कैद था। सरबजीतसिंह तो पाकिस्तान में है ही।
किरपालसिंह सजा-ए-मौत का कैदी है और अपनी काल कोठरी से मैंने उसे जेल में कई तरह के काम करते देखा है। वे जेल परिसर में झाड़ू लगाने, फर्श साफ करने और बर्तन धोने का काम करते हैं। सरबजीत तो मेरी तरह अंदर ही रहते थे।
अंसार बर्नी जब जेल आए थे तो उन्होंने कई कैदियों के नाम और फोटो पाकिस्तान के राष्ट्रपति को भेजे थे ताकि उन्हें माफीनामा मिल सके। इनमें सरबजीतसिंह वगैरह का नाम भी था। लेकिन रब्ब का कर्म था कि मुझे रिहा कर दिया गया, वहाँ की तर्ज में कहूँ तो मेरी ही कोठ तोड़ी गई। वहाँ कोठी तोड़ने का मतलब था कि जेल से रिहाई।
मेरी दिली दुआ है कि जैसे मुझे रिहा किया गया, वैसे ही मेरे हमवतन कैदियों को भी छोड़ दिया जाए। जेल मैं ज्यादातर पाकिस्तानी कैदियों के साथ रहा हूँ। उनके लिए भी मेरे दिल से दुआ ही निकलती है।
रिहाई का सिलसिला दो तरफा होना चाहिए- भारत को भी पाकिस्तानी कैदियों को रिहा करना चाहिए ताकि सभी को जिंदगी जीने का हक मिल सके। सरबजीत भी मेरे हमवतन हैं, मेरी दुआ और यकीन है कि जल्द ही वो अपने वतन लौट सकेंगे।
यहाँ मैं ये बताना चाहता हूँ कि जिन भारतीय कैदियों के नाम मैंने लिए हैं- मैं उन्हें देखकर आया हूँ, सब तंदुरुस्त हैं और ठीक-ठाक हैं। मेरी तरह (अगर आपने मुझे टीवी पर देखा हो तो) भगवान उन्हें भी मेरी तरह रहम बख्शे।
फर्ज पूरा कर आया हूँ : भारत आने के बाद एक दिन बातों-बातों में मुझसे यूँ ही पूछा गया कि क्या मैं दोबारा पाकिस्तान जाना चाहूँगा? तपाक से मैंने जवाब दिया- पिछली बार गया था तो क्या हुआ था, अब दोबारा जाकर क्या करूँगा। पता नहीं दो-चार साल जिंदगी बची है या नहीं।
कह तो दिया लेकिन मन में अजीब-सी खलबली मच गई। क्योंकि सच ये भी है कि दिल में कहीं न कहीं एक ख्वाहिश जरूर है कि फिर से अदब के साथ पाकिस्तान जाऊँ, वहाँ जाकर दुआ माँगू और हज भी करके आऊँ।
बस इससे ज्यादा इच्छाएँ या सपने मन में अब बचे नहीं है। आर्थिक तंगी सपनों और सपनों के रंगों को फीका कर देती है। सरकार से कुछ उम्मीद जरूर है कि वो आर्थिक तौर पर कुछ मदद कर दे तो बुढ़ापा सुकून से निकल जाएगा।
इस डायरी में आपने मेरा अतीत जाना, जेल के दिनों की गुमनामी के पीछे की कहानी सुनी, वहाँ की तकलीफें, नाउम्मीदी मेरी नजरों से देखी और इसी नाउम्मीदी के बीच उम्मीद को पलते देखा, हँसी के चंद पल भी बाँटे।
यानी मेरे जीवन से जुड़े कई किस्से आपने पढ़े, कई पहलुओं पर बात हुई, लेकिन मैं जानता हूँ मुझे लेकर अब भी सवाल उठे रहे हैं- मैं कौन था, पाकिस्तान क्यों गया था...
इन सब बातों का एक ही जवाब है मेरे पास- 'मैं वहाँ अपना फर्ज पूरा कर आया हूँ। न मैंने पाकिस्तान में कुछ बताया न अब यहाँ कुछ कहूँगा'।
(35 साल पाकिस्तान की जेल में बिताने के बाद कश्मीरसिंह चार मार्च 2008 को अपने वतन लौटे हैं। कश्मीर के जीवन के अनुभवों पर आधारित छह डायरी की यह श्रृंखला बीबीसी संवाददाता वंदना से उनकी बातचीत पर आधारित है। ये इस डायरी की आखिरी कड़ी है)
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