जिंदगी के करीब 35 साल दूसरे देश पाकिस्तान के जेल में बीत गए, आसान तो नहीं होता पर कहते हैं न कि अगर किसी की याद दिल में बसा लो, तो वक्त कट ही जाता है। या किसी चीज की लौ दिल में जला लो, समय निकल जाता है।
जब-जब उदासी घिरने लगती और मन परेशान हो जाता तो मैं किताबों की आगोश में खो जाता। किताब का एक-एक शब्द जैसे एक-एक जख्म पर मरहम लगाने की कोशिश कर रहा हो- मन को बड़ा सुकून मिलता था।
रसाले, उपन्यास जो हाथ लगता पढ़ डालता था। जब मैं भारत से पाकिस्तान आया था तो मेरे बच्चे बहुत छोटे थे। उनकी याद सताती थी मुझे, लेकिन कुछ कर नहीं सकता था- मजबूर था।
नाजुक दिल आपके दर्द को और गहरा कर देता है। सो बाद में मैंने ये सोचना कम कर दिया कि बच्चे क्या कर रहे होंगे क्योंकि अगर दिलो-दिमाग में हर वक्त यही खयाल रहता तो मैं जेल में जिंदा बचता ही नहीं। बस खुद को यही तसल्ली देता रहा कि बच्चे जहाँ भी होंगे सही-सलामत ही होंगे।
फरिश्ता कहूँ या अवतार : जेल में रहते हुए 1988 में मुझे पक्षाघात भी हो गया। वक्त के थपेड़ों ने तन-मन दोनों को कमजोर करना शुरू कर दिया था। जैसे-जैसे समय बीतता गया जेल से रिहा होने के आसार कम होते नजर आने लगे।
जिंदगी जैसे-तैसे कट रही थी। किसी लंबे, रहस्यमय अंतहीन उपन्यास की कहानी के जैसी जिंदगी, वो कहानी जिसे शुरू करने के बाद छोड़ दिया गया हो और जिसे अपने अंजाम की तलाश हो।
उसी दौरान एक फरिश्ता आया मेरे जीवन में- अंसार बर्नी। उनसे मिलने के बाद हालात ने अजब तरीके से करवट बदले और जो कुछ भी अच्छा हुआ वो पाकिस्तान के पूर्व मानवाधिकार मामलों के मंत्री अंसार बर्नी की ही मेहरबानी है। मेरे लिए तो वे अवतार बनकर आए- भगवान कहिए, वाहे गुरु कहिए या अल्लाह समझ लो।
वर्ष 2008 के जनवरी महीने में बर्नी साहब जेल का दौरा करने आए। अंसार बर्नी मेरी चक्की भी आए। चक्की मतलब वो क्वार्टर जहाँ मैं बंद था।
कैदियों से पूछा गया कि हमारी सजा कितने साल की है। उसी दौरान मैंने बताया कि सजा-ए-मौत सुनाए हुए मुझे 30 से ज्यादा साल हो गए हैं। अंसार बर्नी ने बस इतनी बात सुनी और मेरा नाम लिखकर ले गए। मेरा ही नहीं, वहाँ जितने भी कैदी थे जिनकी सजा को 10 साल हो चुके थे, वे सबका नाम ले गए।
इन 14 लोगों में सरबजीतसिंह का नाम भी शामिल था। पाकिस्तान के राष्ट्रपति के पास माफी के लिए अपील गई। उन्हें बताया गया कि मैं 35 साल से यहाँ बंद हूँ।
पिछले 35 सालों से समय का पहिया जैसे मेरे लिए रुका हुआ था। फिर चंद ही महीनों में समय का चक्का ऐसा सरपट दौड़ा कि अभी तक उससे कदमताल करने की कोशिश में जुटा हूँ।
बर्नी साहब से मिलने के कुछ महीनों के अंदर ही मेरी कोठी तोड़ दी गई... आपकी भाषा में बोलूँ तो पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने मुझे रिहा करने का आदेश दे दिया।
पंछी बनूँ उड़ता फिरूँ मस्त गगन में : तीन दशकों तक मैंने काल कोठरी के अंधेरे में तनहा जीवन बिताया था। इतने सालों बाद जब बाहर कदम रखा तो आँखों को चौंधियाती रोशनी मिली, नीला आसमाँ देखा, आसमान में उड़ते पंछी देखे। खुली हवा में साँस लेने को मिला तो ऐसा महसूस हुआ कि मैं बस अभी-अभी पैदा हुआ हूँ...इसके आगे सोचने-समझने का मन भी नहीं था मुझे, शब्द गौण हो गए थे।
भगवान ने मुझे नई जिंदगी दी थी, जेल से निकलकर मैं गुरुद्वारे गया और मत्था टेका। रात एक आलीशान होटल में बिताने को मिली..मन में उत्सुकता थी। तीन मार्च 2008 को मैं रिहा हुआ और चार मार्च को मुझे बड़ी इज्जत के साथ वाघा बॉर्डर पर छोड़ दिया गया।
बाकायदा मेरा पासपोर्ट बनाया गया था। मुझे पाकिस्तानी पुलिसवालों के हवाले नहीं किया गया। सीधा भारत भेज दिया गया अपने परिवार के पास-जैसे किसी भी व्यक्ति को भेजा जाता है, जो पासपोर्ट के जरिये यहाँ से वहाँ जाता है... अदब से।
भारत-पाक सीमा पर देखा तो टीवी चैनलों और पत्रकारों का हुजूम उमड़ा हुआ था...अचानक मैं उनकी नजरों में ‘अहम’ शख्स बन गया, हर कोई इंटरव्यू लेना चाहता था।
कुछ देर के लिए रब्ब ने मुझे एक ऐसी ऊँचाई पर जरूर पहुँचाया दिया था, जहाँ लगे कि आप बड़ी हस्ती हैं लेकिन मैं इस सब के काबिल नहीं हूँ।
खैर भारत की सीमा में कदम रखा तो आँखें अपने नन्हे-मुन्ने बच्चों को तलाश रही थीं। जब जेल में था तो हमेशा मन में यही तस्वीर रहती थी कि एक दिन जब वापस आऊँगा तो मेरे बच्चे मुझे वैसे ही मिलेंगे जैसा मैं उन्हें छोड़कर आया था। और अब जब भारत लौटा हूँ तो बच्चे वैसे ही मिल भी गए हैं।
बस फर्क यही है कि मैं दो बेटे छोड़कर गया था, अब वापस आया हूँ तो जिस उम्र के बेटे छोड़ कर गया था अब उसी उम्र के पोते मिल गए हैं। एक बेटी थी पहले मेरी पर अब चार बेटियाँ और मिल गई हैं- मेरी दो बहुएँ और दो पोतियाँ भी तो बेटियों समान हैं।
एक बेटा मेरे साथ अब गाँव में ही रहता है। वहीं दूसरा बेटा इटली में काम करने गया हुआ है। मुझे मिलने वो इटली से भारत आया था कुछ दिन पहले। हम दोनों ने एक-दूसरे से मुलाकात की।
लेकिन पता नहीं क्यों इटली वापस जाते समय न वो मुझसे मिलने आया न मैं उससे मिला...वो एक-दो रोज मुझसे मिला, लेकिन फिर मिलना शायद उसे पसंद न आया हो। बहुत सारी बातें अनकही-अनसुलझी रह गईं।
मेरी बिटिया रानी भी इटली में रहती है और जून में अपने बेटे के इम्तिहान के बाद मुझसे मिलने आएगी। मुझे इंतजार रहेगा...
(अगली बार डायरी की आखिरी कड़ी में जिक्र उन भारतीय क़ैदियों का जिन्हें मैंने पाकिस्तानी जेल में देखा है, बात अपने गाँव में आने के बाद के अनुभवों की और वहाँ अपनी पुरानी पहचान तलाशते कश्मीरसिंह की)
(कश्मीर सिंह के जीवन के अनुभवों पर आधारित यह श्रृंखला बीबीसी संवाददाता वंदना से उनकी बातचीत पर आधारित है।)
|