ललित मोदी से मेरी पहली मुलाकात करीब पाँच साल पहले जयपुर के रामबाग पैलेस में हुई थी। जो पैलेस अब होटल बन चुके हैं, उनमें से रामबाग पैलेस मेरी नजर में दुनिया के सबसे खूबसूरत राजमहलों में से है। अगर मैं जयपुर में हूँ तो दिन में एक चक्कर रामबाग का तय है और वहीं एक मित्र ने परिचय कराया एक साँवले रंग के, चश्मा लगाए, आम कद-काठी के सिगरेट फूँकते शख्स से। यह ललित मोदी हैं, मेरे मित्र ने कहा। ललित मोदी, नाम से कोई घंटी नहीं बजी। उस समय मैं क्या देश में बहुत कम लोग जानते होंगे ललित मोदी को। चाय के प्याले पर ललित मोदी ने मुझे बताया कि वह व्यवसायी हैं और राजस्थान क्रिकेट संघ के सदस्य बनने वाले हैं। क्रिकेट की राजनीति की पेचीदगियाँ वे समझते दिखते थे और क्रिकेट की व्यावसायिक संभावनाओं के बारे में भी उनकी पकड़ ठीक ही दिखी। पहली नजर में मैं जो उन्हें भाँप पाया तो वे काफी ऊर्जावान नजर आए, बहुत तेजी से बोलते थे और नई सिगरेट कुछ जल्दी ही सुलगाते थे। लग रहा था कि वह जल्दी में हैं। उनकी उम्र भी काफी कम दिख रही थी, जबकि वह करीब 40 साल के हैं। भारत में क्रिकेट की राजनीति की जितनी बारीकियाँ वह जानते थे, उससे मैं प्रभावित हुआ। लेकिन हमारी पहली मुलाकात में मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा, जिससे मैं अंदाजा लगा पाता कि आने वाले दिनों में वो भारतीय क्रिकेट के प्रशासक के रूप में इतना नाम कमाने वाले थे। इसके बाद हम कभी-कभार ही मिले।
भारत के कैरी पैकर : लेकिन अगर आप भारतीय हैं और आपको क्रिकेट से प्यार है तो आपका ललित मोदी के करियर से साबका न पड़ा हो, ऐसा संभव नहीं है। राजस्थान क्रिकेट संघ के सदस्य से लेकर अध्यक्ष पद तक का सफर, बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया की हार तय कर उन्हें भारतीय क्रिकेट में अप्रासंगिक बना देना, पहले बीसीसीआई उपाध्यक्ष बनना और फिर भारतीय क्रिकेट का चेहरा-मोहरा बदल देने वाले आईपीएल के चेयरमैन पद पर आसीन होना, भारतीय क्रिकेट में ललित मोदी के योगदान के चलते ही उनकी तुलना अब ऑस्ट्रेलिया के कैरी पैकर से की जाने लगी है। ये सब नहीं होता अगर 1993 में क्रिकेट लीग शुरू करने का ललित मोदी का प्रस्ताव बीसीसीआई ने मान लिया होता। पिछले हफ्ते मुंबई में जुहू बीच स्थित अपने खूबसूरत बंगले पर मुलाकात के दौरान उन्होंने मुझसे कहा कि 1993-94 में हम एक खेल चैनल और एक इंटरसिटी लीग शुरू करना चाहते थे।
हमने उस समय बीसीसीआई को एक करोड़ बीस लाख डॉलर की मोटी रकम का प्रस्ताव भी दिया था, लेकिन तब क्रिकेट बोर्ड पर बिचौलियों और उन लोगों का कब्जा था जिनके निहित स्वार्थ थे। यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया और हमें बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ। ललित मोदी ने कहा कि उसी दिन मैंने तय किया कि चीजों को सही करने के लिए मुझे बीसीसीआई में होना चाहिए। इसके बाद हालात बदले। देखिए कैसे! बीसीसीआई हमेशा से ही अमीर खेल संगठन रहा है। क्रिकेट का दीवाना देश इसकी गारंटी भी देता है, लेकिन तीन साल पहले जब मोदी ने बीसीसीआई की व्यावसायिक गतिविधियाँ अपने हाथ में लीं, तब से बीसीसीआई के खजाने में भारी वृद्धि हुई है। अनुभव का फायदा : मोदी का परिवार तंबाकू, एग्रोकेमिकल्स, शिक्षा, मार्केटिंग और मनोरंजन के क्षेत्र में रहा है। इसके अलावा मोदी भारत की सफलतम तंबाकू कंपनियों में से एक गॉडफ्रे फिलिप्स के बोर्ड में भी रहे हैं। मोदी के इस कारोबारी पृष्ठभूमि से बीसीसीआई को भारत का मुनाफे का व्यावसायिक प्रतिष्ठान बनाने में मदद मिली। तीन साल में बीसीसीआई की सालाना आय सात गुना बढ़कर एक अरब डॉलर पहुँच गई है, लेकिन अधिकतर लोगों का मानना है कि सर्वश्रेष्ठ अभी आना बाकी है। मोदी की साहसिक सोच इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल से क्रिकेट के नई ऊँचाइयाँ छूने की संभावना है। लीग के तहत बॉलीवुड स्टार और उद्योग के घरानों के स्वामित्व वाली आठ टीमें 20-20 ओवरों के मुकाबले में अगले सात हफ्तों तक एक-दूसरे से टकराएँगी। जिस रफ्तार से वे काम को अंजाम देने में लगे हुए हैं, बहुत लोगों को ये लगने लगा है कि सत्ता उनके सर चढ़कर बोलने लगी है और इसने उन्हें घमंडी, असभ्य, असहनशील बना दिया है। मोदी भी मानते हैं कि वे कूटनीति नहीं जानते। वो कहते हैं कि मेरी दिक्कत ये है कि जब मुझे कोई काम मिलता है तो वह चाहे फिर कितना ही मुश्किल और कठिन हो, मैं अपने निजी हितों को एक तरफ रखते हुए इसे पूरा करने की कोशिश करता हूँ। ऐसा करना हमेशा आसान नहीं होता। तमाम दबाव में जब आप पारदर्शिता और समझौता किए बिना काम करते हैं तो इस बात की संभावना रहती है कि किसी के साथ आपका रवैया सख्त हो। लेकिन जब वे ये पाते हैं कि वास्तव में गलती उनकी थी तो क्या वह फोन पर माफी माँगते हैं, मोदी कहते हैं कि मैं हमेशा ऐसा करता हूँ, लेकिन लोगों को ये भी सोचना चाहिए कि बीसीसीआई में कम लोग हैं और हम पर हमेशा बहुत दबाव रहता है।
मुखर व्यक्तित्व : सीधी सपाट बात और कभी-कभार के गुस्से के अलावा ललित मोदी हठधर्मी प्रवृत्ति के भी हैं। वो कहते हैं कि किसी ने नहीं सोचा था कि जगमोहन डालमिया को बीसीसीआई अध्यक्ष पद से कभी हटाया जा सकता है। अब लग रहा है कि शरद पवार की अगुवाई में हमारी टीम के सामने कोई टिक नहीं सकता, लेकिन बीसीसीआई के चुनाव जीतने के लिए हमें अच्छा प्रदर्शन करते रहना होगा। इसके बाद वे थोड़ा मुस्कराकर कहते हैं कि हाँ, अच्छा काम करने के बावजूद भी हम चुनाव हार सकते हैं। मोदी का कहना है कि बीसीसीआई पदाधिकारियों की किस्मत का फैसला 31 वोटों से होता है और चुनाव में सिर्फ बेहतर काम ही जीत का एकमात्र आधार नहीं हो सकता। जिस किसी ने भारतीय क्रिकेट प्रशासन की पेचीदगियों को करीब से देखा है, वो इस बात को मानेगा। लेकिन हाल ही में बीसीसीआई के संविधान में संशोधन की बदौलत मोदी ने खुद को अगले पाँच साल के लिए आईपीएल चेयरमैन के रूप में पक्का कर लिया है। मोदी नहीं मानते कि आईपीएल कभी टेस्ट या सीमित ओवरों के क्रिकेट के लिए खतरा बनेगी और इसकी वजह वो ‘इस फॉर्मेट से जुड़ा राष्ट्रीय गौरव और जोश’ बताते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय क्रिकेट की दबंग छवि के बारे में वो क्या सोचते हैं? कुछ देर सोचने के बाद ललित मोदी थोड़ा मुस्कराते हैं जैसे कह रहे हों आखिर शिकायत किसको है! वो कहते हैं कि पिछले कई वर्षों से अधिकांश कमाई भारत से होने के बावजूद किसी ने भी हमारी परवाह नहीं की। लेकिन इसमें हमारा भी दोष था। हम शायद कुछ ज्यादा ही डर-डर कर चल रहे थे। यह असंतुलन दूर होना चाहिए और हमें खुशी है कि अब ऐसा हो रहा है।
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