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स्टेम सेल से पार्किंसंस का इलाज
अमेरिका के शोधार्थियों ने कहा है कि चिकित्सकीय क्लोनिंग से चूहों में पार्किंसंस रोग का इलाज करने में उन्हें सफलता मिली है। नेचर मेडिसिन पत्रिका में छपे इस अध्ययन ने अब तक इस बात के सबूत दे दिए हैं कि यह विवादास्पद तकनीक एक दिन इस बीमारी से जूझ रहे लोगों की मदद करेगी।

मेमोरियल स्लोन केटेरिंग कैंसर केंद्र की टीम का कहना है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी जानवर का इलाज उसकी अपनी कोशिकाओं से सफलतापूर्वक किया गया हो। इंग्लैंड के विशेषज्ञों का कहना है कि यह शोध आशाजनक और उत्साहित करने वाला था। हालाँकि इसका उपयोग मनुष्यों के इलाज के लिए करने में अभी काफी वक्त लगेगा।

पार्किंसंस रोग में मस्तिष्क में मांसपेशियों की गति को नियंत्रित करने वाले हिस्से की नसों की कोशिकाएँ या तो मर जाती हैं या फिर बेकार हो जाती हैं। इससे अक्सर मरीज अपनी शारीरिक गतिविधियों पर अच्छी तरह नियंत्रण नहीं रख पाता।

चूहों को फायदा : आमतौर पर ये कोशिकाएँ एक रसायन का उत्पादन करती हैं, जिसे डोपामाइन कहते हैं। यह रसायन शरीर की मांसपेशियों के सुगम प्रचालन की अनुमति देता है। चिकित्सकीय क्लोनिंग में कोशिकाओं के नाभिक को अंडे में प्रत्यारोपित किया जाता है। इसके बाद इस कोशिका को एक भ्रूण के रूप में विकसित किया जाता है और इससे स्टेम सेल बनाकर उन्हें इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है।

इस अध्ययन में अपने ही क्लोन से बने न्यूरॉन पाने वाले चूहों को काफी फायदा दिखाई दिया। लेकिन जब इन न्यूरॉन को उन चूहों में प्रत्यारोपित किया गया, जो प्रत्यारोपित कोशिकाओं से मेल नहीं खाते थे तब वे कोशिकाएँ जीवित नहीं रह सकीं और चूहों को कोई फायदा नहीं हुआ।

बड़ी आशा : वैज्ञानिक पार्किंसंस रोग में स्टेम सेल पद्धति के प्रयोग को इसलिए बढ़ावा दे रहे हैं, क्योंकि यह मृत डोपामाइन को नई बनी और स्वस्थ कोशिकाओं से बदल देती है। फिर भी चुनौती यह है कि नसों की ऐसी कोशिकाएँ बनाई जाएँ जो प्रत्यारोपण के बाद जीवित रह सकें।

पार्किंसंस रोग सोसाइटी में शोध और विकास की निदेशक डॉ. किरेन ब्रीन कहती हैं कि यह उत्साहित करने वाले परिणाम हैं, क्योंकि पहली बार हम यह देख सकते हैं कि किसी व्यक्ति के अपने स्टेम सेल का प्रयोग पार्किंसंस रोग के इलाज के लिए किया जा सकता है। उनके अनुसार अब जरूरत है कि इस क्षेत्र में शोधार्थी सुरक्षा के दृष्टिगत और अध्ययन करें, जिससे पार्किंसन के शिकार लोगों पर आजमाने से पहले ही यह प्रणाली ज्यादा प्रभावी साबित हो सके।
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