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आमिर, शाहरुख, रितिक बेजोड़ कलाकार
बीबीसी एक मुलाकात में आशुतोष गोवारीकर
महबूब खान के बाद आशुतोष बॉलीवुड के पहले निर्देशक हैं जिनकी फिल्म ऑस्कर के लिए नामांकित हुई थी। आपके काम की इतनी तारीफ होती है, तो हर बार नई फिल्म को लेकर उम्मीदों का दबाव भी रहता होगा?
- नहीं, फिल्म रिलीज के वक्त मेरे ऊपर कोई दबाव नहीं रहता बल्कि मैं राहत महसूस करने लगता हूँ।
BBC
मैं कहानी चुनने के समय दबाव महसूस करता हूँ। उस वक्त मैं सोचता हूँ कि क्या यह एक मनोरंजक कहानी होगी? क्या दर्शक इसे पसंद करेंगे? इस तरह कहानी को मैं सारी कसौटियों पर जाँच लेता हूँ। 'जोधा अकबर' की कहानी को भी मैंने इन सारी कसौटियों पर कस लिया था और जिस तरह से यह फिल्म बनी है उससे मैं खुश हूँ। मैंने जैसी स्क्रिप्ट तैयार की थी, फिल्म पर्दे पर वैसी ही दिखी।


आपने कहा कि कहानी चुनने के समय सबसे ज्यादा तनाव रहता है। मैंने अनुभव किया है कि फिल्म की कहनी पर आप बहुत गंभीरता से अध्ययन करते हैं। यह बहुत मेहनत का काम है, इसमें मजा आता है क्या?
- मुझे तो मजा आता है। दरअसल मैंने अपनी तीनों फिल्मों चाहे वह लगान हो, स्वदेस हो या फिर जोधा अकबर इनके विषय ही ऐसे चुने थे जिसमें रिसर्च जरूरी थी। आपका कहना भी सही है कि ज्यादा रिसर्च भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि आखिरकार एक फिल्म ही तो बनानी है। मैं कोशिश करता हूँ कि रिसर्च का दायरा फिल्म की कहानी के बाहर न जाए। आप अगर 'जोधा अकबर' को देखेंगे तो इसका विषय अकबर के 13 साल से 28 साल तक का जीवन है। इसलिए मैंने अपने रिसर्च का दायरा बाबर, हुमायूँ और अकबर तक ही रखा है। जहाँगीर या शाहजहाँ के काल का न तो फिल्म में जिक्र है और न ही मैंने इस बारे में जानने की कोशिश की।

लेकिन ऐसे कितने निर्देशक होंगे, जो अगर किसी पर फिल्म बनाएँ तो उसके दादा पर भी रिसर्च कर लें?
- देखिए जब मैं ट्रेलर के जरिए ऐतिहासिक कहानी का वादा करता हूँ तो दर्शक फिल्म देखने के समय अपेक्षा करता है कि जो कहा गया है वह हो, जैसे 'लगान' के ट्रेलर के जरिए मैं कहता हूँ कि सन्‌ 1893 की ऐतिहासिक कहानी है जिसमें गाँव वाले ब्रिटिश राज के खिलाफ हैं तो फिल्म देखते समय दर्शकों की चेतना में कहीं न कहीं अपेक्षा रही होगी कि ट्रेलर में जो कहा गया है वो हो। इसलिए यह जरूरी है कि कहानी के दायरे के मुताबिक रिसर्च हो। हम और आप भी जब ऐतिहासिक चीजों को देखते हैं तो आक्रामक नजरिए से देखते हैं, क्योंकि हमें उसमें से खामियाँ निकालनी होती हैं या फिर कोई गलती रह गई है तो उसे निकालनी होती है। मुझे इससे बहुत डर लगता है।

आप इसे चाहे दर्शकों और आलोचकों की अपेक्षा कहें या फिर विश्वास, इस पर खरा तो उतरना ही पड़ता है
- बिलकुल, जैसे 'स्वदेस' एक सोशल ड्रामा है लेकिन मुझे यह जानना था कि एक एनआरआई जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए बाहर गया था क्या सोचता है। क्या वो खुश है? कितनी बार एक दिन या एक महीने में वह अपने देश को याद करता है? मुझे इस बारे में रिसर्च करना था और इसके लिए मैंने एक प्रश्नावली तैयार करने अपने एनआरआई दोस्तों के पास भेजी। उनकी भावनाओं को फिल्म में शामिल किया। यह एक अलग प्रकार का रिसर्च था लेकिन मुझे लगा कि यह बहुत जरूरी है ताकि अमेरिका में बैठा कोई भारतीय भी खुद को इस फिल्म से जोड़ सके।

आपने अपनी पिछली तीनों फिल्मों में आज के दौर के तीनों बड़े स्टारों के साथ काम किया है आमिर, शाहरुख और रितिक कैसे एक-दूसरे से अलग हैं?
- तीनों के काम करने का तरीका बिलकुल अलग है लेकिन परिणाम एक ही है। तीनों बड़े सफल स्टार हैं। आमिर हर काम को नफासत से करना पसंद करते हैं और उन्हें स्क्रिप्ट की हर डिटेल्स जाननी होती है। इसके जरिए वे अपने पात्र की तैयारी करते हैं और पूरी तैयारी के साथ सेट पर आते हैं। आमिर को इससे अपनी भावना व्यक्त करने में आसानी होती है।

शाहरुख एक बार स्क्रिप्ट जान लेते हैं और फिर अपने आपको छोड़ देते हैं। सेट पर वे स्वतःस्फूर्त तरीके से उन्मुक्त होकर शॉट देते हैं इसलिए उन्हें मैं जीनियस मानता हूँ। रितिक दोनों का मिलाजुला रूप हैं। वे स्क्रिप्ट के जरिए जितना कर सकते हैं, करते हैं और फिर सेट पर स्वतःस्फूर्त शॉट देते हैं। जैसे 'जोधा अकबर' में उर्दू के काफी शब्द हैं तो रितिक हर संवाद का उद्धरण सही करने के लिए बार-बार रियाज करके आते थे।

वैसे किसी खास समय में आप किसी अभिनेता के अभिनय के तरीके को परिभाषित नहीं कर सकते। इसका कोई नियम नहीं है। मैंने आमिर के कई शॉट देखे हैं जो गजब के स्वतःस्फूर्त थे। बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि आप जिस निर्देशक के साथ काम कर रहे हैं उसका तरीका क्या है।

'लगान' बनाते वक्त क्या आपने यह सोचा था कि फिल्म ऑस्कर के लिए नामांकित होगी और आपकी तुलना महबूब खान से होने लगेगी?
- ईमानदारी से कहूँ तो नहीं। ऑस्कर के लिए नामांकित होने के बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं था लेकिन इतना जानता था कि फिल्म दर्शकों को पसंद आएगी। इस फिल्म में एक गाँव ब्रिटिश राज के खिलाफ उठ खड़ा होता है और क्रिकेट के जरिए लगान माफ करवाता है। इसमें इतिहास भी है और आधुनिकता भी। फिल्म में राजनीति, क्रिकेट और बागीपन का मिश्रण था और वह भी मनोरंजन के रूप में। इसलिए मैं यह तो जानता था कि फिल्म चलेगी, लेकिन कितनी चलेगी यह कोई भी नहीं बता सकता।
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