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हिंदू अपने घर कश्मीर लौटें-किरण कुमार
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फिल्मों में बतौर नायक शुरुआत करने वाले वरिष्ठ अभिनेता किरण कुमार ने अपने करियर में पहली फिल्म ख्वाजा अहमद अब्बास की 'दो बूँद पानी' की थी। उनके पिता जीवन हिंदी सिनेमा के एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने आवाज और हावभाव के जरिये खलनायकी को नए आयाम दिए।

किरण ने अपने पूरे करियर में एक ही मराठी फिल्म की। पर हिंदी, गुजराती और भोजपुरी सिनेमा में बतौर नायक और खलनायक की जो भूमिकाएँ निभाईं वो उन्हें न केवल बतौर कलाकार बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी तसल्ली देने वाली हैं। एक कश्मीरी होने के नाते उनका मानना है कि हिन्दुओं को अपने घर कश्मीर लौटना चाहिए।

अस्सी के दशक में फ़िल्मों में खलनायक बनकर वापसी करने वाले किरण अब टीवी और फिल्मों में बराबर दिखाई देते हैं। पर अपने करियर की अब तक की सबसे बेहतर फिल्म वे अपनी आने वाली पहली अंग्रेजी फिल्म 'लव हैज नो लैंग्वेज' को मानते हैं।

स्टार टीवी के अपने नए शो 'गृहस्थी' के लिए वे जब दिल्ली आए तो हमने उनसे लंबी बातचीत की। हालाँकि दिल्ली से मुंबई पहुँचने के बाद वे तेज बुखार से पीड़ित थे पर इसके बावजूद उन्होंने अपने जीवन के हर पहलू पर खुलकर बात की।

आपके टीवी पर ज्यादा काम करने की वजह क्या है?
मुझे कुछ स्क्रिप्ट और विचार पसंद आ जाते हैं बस। मैं महीने में तीस दिन शूटिंग करता हूँ।

आपके पिता जीवन हिंदी फिल्मों के सर्वश्रेष्ठ खलनायकों में सबसे ऊपर की पंक्ति के कलाकार थे। आपने वह ऊँचाई हासिल नहीं की?
उनकी बराबरी कोई नहीं कर पाया। कुछ लोगों ने उनकी नकल करने की कोशिश की। मेरे पिता खलनायकी के ऐसे तिलिस्म थे जो कोई नहीं ढूँढ सकता था। वे महान कलाकार थे। उन्होंने अपनी आवाज और शारीरिक भाषा से अपने पात्रों और चरित्रों के अपने प्रतिमान गढ़े।

आप उनके कितने करीब थे। उनकी कौन सी फिल्में और चरित्र आपको सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं?
मैं उनके साथ इमोशनली भीतर तक जुड़ा था। अपने पात्रों और चरित्रों में वे मुझे चमत्कारी लगते थे। वे पहले ऐसे कलाकार थे जिन्होंने नारद के चरित्र को इकसठ बार निभाया। पर मुझे उनकी कोहिनूर और बीआर चोपड़ा की 'कानून' में की गई भूमिकाएँ प्रभावित करती हैं। कानून में उनका केवल एक ही दृश्य हैं पर वही उस फ़िल्म का सबसे बड़ा आधार भी है।

मैं बचपन में उनके साथ आरके और बसंत स्टूडियो जाया करता था, बाबू भाई मिस्त्री की धार्मिक फिल्मों की शूटिंग में। वे अलौकिकता और चमत्कार दिखाने के लिए जो तकनीक अपनाते थे, अपने पिता के साथ उन्हें देखना कमाल का अनुभव था। मैंने उनके संघर्ष और काम के अलावा उनके वास्तविक जीवन के छिपे अंश भी देखे।

पिता की अचानक मौत के बाद आपके भाई की मौत आपके लिए उस समय एक तोड़ने वाली घटना थी?
हाँ. उनकी मौत लिवर में खराबी से हुई और उसके बाद अचानक मेरे छत्तीस साल के भाई की मौत किडनी फेल होने से हो गई। पर मेरे पिता कहा करते थे कि हारने से जिंदगी नहीं चलती।

आपके अपने करियर के बारे में क्या कहेंगे?
मैंने अपनी तरह काम करने की कोशिश की। मैंने हीरो से शुरुआत की। फिर खलनायक बनकर राकेश रोशन साहब की खुदगर्ज, एन. चन्द्रा की तेजाब और मुकुल आनंद की खुदा गवाह जैसी फिल्मों से वापसी की। अब टीवी और फिल्में दोनों कर रहा हूँ।

फिर आप अचानक गायब हो गए?
मैं खुद को दोहराना नहीं चाहता था। अस्सी के दशक में सिनेमा ने जो करवट ली उसमें मेरे लिए विश्लेषण करना जरूरी था। मैंने गुजराती सिनेमा में न केवल फिल्मों में काम किया बल्कि उनका निर्माण और निर्देशन भी किया। उनमें से चार को बेस्ट फिल्म का अवॉर्ड मिला। मैंने उस समय डाक्युमेंट्री बनाई। उसके बाद टीवी शुरू किया। सत्तर और अस्सी का दौर अलग था। इससे अब प्रायोगिक सिनेमा को जगह मिलने लगी है।

पर क्षेत्रीय सिनेमा अब भी पिछड़ा हुआ है?
यह दुख की बात है। मराठी, गुजराती के बाद भोजपुरी हिंदी के बाद सबसे बड़ी इंडस्ट्री बन गई है, पर अभी तक वे सत्तर के दशक की बात कर रहे हैं। हिंदी फिल्मों में भी हम सम्भावनाओं के बावजूद बहुत प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं।

अब हमारे यहाँ सत्यजीत रे जैसे फिल्मी कलाकार नहीं हैं। हॉलीवुड में भी जब हम नए तरह का सिनेमा देखना चाहते हैं तो उसके लिए यूरोप जाते हैं। गोद्दार, फेलेनी, त्रुफो वहीं थे। हॉलीवुड भी स्पीलबर्ग का दीवाना है।

बरसों बाद 'ब्लैक एंड व्हाइट' में पूना संस्थान से कोई अभिनेता सामने आया है जबकि सत्तर के दशक में ऐसा नही था?
जब हम लोग वहाँ थे तो जया जी, शत्रु, डैनी और असरानी साहब जैसे कई लोगों ने जो सिनेमा किया उसका उदहारण दूसरा नहीं। जया जी इसमें सबसे आगे रहीं। फिर रंगमंच से लोग आने शुरू हो गए। यह बेहतर संकेत थे पर बाद में वहाँ एक्टिंग का पाठ्यक्रम शायद बंद कर दिया गया।

आप कश्मीरी हैं, कश्मीर के हालातों पर बात होती है तो कैसे रिएक्ट करते हैं?
मेरे दादाजी पाकिस्तान में गिलगित से जुड़े थे। कश्मीरी राजसी परिवार में उन्हें 'वजीरी वजारत' का दर्जा मिला था. मैं चाहता हूँ हर हिंदू अपने घर कश्मीर लौटे।

अपने अपनी निर्माण कम्पनी भी शुरू की है?
मैं चाहता हूँ कि टीवी और फिल्मों में हम लोग और बुनियाद का दौर वापस आए।

अब कैसी भूमिकाएँ करना चाहते हैं और अब कौन सी फिल्में और टीवी शो हैं?
बेनूर के 'स्टीफन बौयाद' की तरह की भूमिका करना चाहता हूँ। दूरदर्शन का शो 'डिटेक्टिव' पाँच साल पूरे कर चुका है। स्टार प्लस पर 'गृहस्थी' है। एक इंग्लिश फिल्म 'लव हैज नो लैंग्वेज' और हिंदी में प्यार छुपाए नहीं छुपता।
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