विचार-मंथन
मुख पृष्ठ » सामयिक » विचार-मंथन » विचार-मंथन » मुसलमानों ने नहीं चाहा था बँटवारा (Jaswant Singh BJP book zinna)
 
- सईद नकव
ND
जसवंतसिंह की पुस्तक के प्रकाशन को लेकर हल्ला इसीलिए मचा कि वे भाजपा में जिन्ना की प्रशंसा करने वाले एक वरिष्ठ नेता थे। इस तरह का काम पहले लालकृष्ण आडवाणी ने किया था। अपनी कराची यात्रा के दौरान उन्होंने पाकिस्तान की संविधान सभा में 11 अगस्त 1947 को जिन्ना के भाषण की तरीफ करते हुए कहा था कि इसमें पाकिस्तान का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप साफ नजर आता है। इस पर आरएसएस सहित पूरा संघ परिवार आडवाणी पर टूट पड़ा था। विवाद इतना बढ़ा कि आडवाणी को इस्तीफा देना पड़ा।

जसवंत को बयान वापस लेने के लिए भी नहीं कहा गया। उन्हें सीधे निकाल दिया। जसवंतसिंह के साथ ऐसा व्यवहार आखिर क्यों हुआ? पुस्तक का प्रकाशन भाजपा की शिमला में होने वाली चिंतन बैठक की पूर्व संध्या पर किया गया। यह बैठक लोकसभा चुनावों में भाजपा की बुरी तरह हार के बाद बुलाई गई थी। किसी भी हालत में पार्टी जसवंतसिंह की कोई बात सुनने के लिए तैयार नहीं थी।

इसके विपरीत किसी को यह सूझा कि मामले को जसवंतसिंह पर ही उलटकर मौके का फायदा उठाया जाए। (जिसके लिए अरुण शौरी ने किसी और संदर्भ में कहा था कि एक झटका दिया जाए) ताकि चुनाव में पार्टी की पराजय के लिए जिम्मेदार दूसरे सभी लोगों पर से ध्यान हट जाए। इससे उन लोगों की विदाई भी कुछ समय के लिए टल सकती है जो अपने आपमें ही इस कदर अभिभूत हैं कि राजनीति के इस मंच पर अपनी भूमिका खत्म हो जाने का भी एहसास उन्हें नहीं है। ये लोग कैसे दावा कर सकते हैं कि उन्होंने एक रात में 700 पृष्ठों की पूरी किताब पढ़ ली है?

पूरे पचास साल से संघ परिवार गा रहा है कि मुसलमानों को खुश किया जा रहा है और यहाँ एक शीर्षस्थ नेता मुसलमानों के दर्द की दास्तान कह रहा है। सच्चर कमेटी ने विभाजन की पूरी जिम्मेदारी मुसलमानों पर डाल दी थी। हिन्दुओं के लिए तो यह सब त्रासद रहा है
यह सब मीडिया की पहल पर हुआ या प्रकाशक की कमाल की मार्केटिंग रणनीति थी या फिर पुस्तक के विमोचन से पहले जसवंतसिंह द्वारा एक चैनल को दिए गए इंटरव्यू की वजह से यह हुआ जिसे सभी चैनलों ने दिखाया और अगले दिन सुबह इसे सारे अखबारों ने पहले पृष्ठ पर छापा था! चिंतन बैठक में हलचल मचाने के लिए यह काफी सामग्री थी। संघ परिवार के खलनायक जिन्नाा को नायक बनाया गया था। सरदार पटेल को विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।

लेकिन जिस बात ने ध्यान खींचा वह कुछ और ही थी। पूरे पचास साल से संघ परिवार गा रहा है कि मुसलमानों को खुश किया जा रहा है और यहाँ एक शीर्षस्थ नेता मुसलमानों के दर्द की दास्तान कह रहा है। सच्चर कमेटी ने विभाजन की पूरी जिम्मेदारी मुसलमानों पर डाल दी थी। हिन्दुओं के लिए तो यह सब त्रासद रहा है। पचास साल से जो प्रचार निरंतर किया जा रहा था, उसके नकार ने शिमला में इकट्ठा हुए नेताओं को हिला दिया।

जसवंतसिंह द्वारा पार्टी के 'मूल सिद्धांत' को 'नुकसान पहुँचाए जाने' ने गुस्साए भाजपाई नेताओं को और ज्यादा तब भड़का दिया, जब मासूमियत के साथ उन्होंने पूछ लिया कि 'सरदार पटेल इस 'मूल' में कहाँ से आ गए?'वे एक स्वर से चिल्लाते हैं, 'पटेल ने देश को एक किया था।' जसवंतसिंह जवाब में याद दिलाते हैं कि पटेल ने तो उस प्रस्ताव का समर्थन किया था जो नेहरू ने कांगे्रस कार्यसमिति की मीटिंग में देश के विभाजन के लिए रखा था।

मान सकते हैं कि सरदार पटेल ने हैदराबाद सहित छः सौ रजवाड़ों को भारत संघ में मिलाया था और इस बात के लिए उन्हें देश को जोड़ने वाला बताया जाता है, लेकिन इस कारण देश के विभाजन में पटेल की भूमिका की तरफ से आँखें बंद नहीं की जा सकतीं।

संक्षेप में कांग्रेस कार्यसमिति के दो मुस्लिम नेताओं मौलाना आजाद और बादशाह खान ने विभाजन का तगड़ा विरोध किया था। अब जसवंत उस अरुचिकर सचाई पर जोर देते हुए कहते हैं कि एक और मुस्लिम नेता जिन्ना को कांग्रेसी नेताओं ने ही दरकिनार कर दिया था।

हम में से ज्यादातर लोगों को यह सचाई क्यों परेशान कर देती है? इसका मूल कारण यह है कि हिन्दू मानसिकता में यह बात गहरे बिठा दी गई है कि मुसलमानों ने देश को बाँटा और फिर यहीं रह गए। इसी सचाई की धरती पर सांप्रदायवादियों ने अपना तंबू खड़ा किया।

जसवंतसिंह का यह प्रयास प्रशंसनीय है। अफसोस की बात है कि विभाजन पर मुश्ताक नकवी की महत्वपूर्ण लेकिन उपेक्षित पुस्तक 'द रियल स्टोरी' उन तक नहीं पहुँची। मुश्ताक की पुस्तक के कुछ आँकड़े उनके तर्क को और मजबूत कर सकते थे- जैसे यही कि 1945-46 में यूपी (तब के संयुक्त प्रांत, अब उत्तरप्रदेश) के चुनावों में मतदाताओं में कुल 10.2 प्रतिशत मुसलमान थे। इनमें से भी सिर्फ 52 प्रतिशत मतदाताओं ने ही वोट दिए। दूसरे शब्दों में कहें तो कुल मतदाताओं का 5 प्रतिशत। मुस्लिम लीग को 37.3 प्रतिशत वोट मिले थे।

यूपी तब मुस्लिम लीग की गतिविधियों का गढ़ था। अगर यूपी के आँकड़ों को देश के आँकड़े माना जाए तो 100 में से सिर्फ 3 मुसलमान ही पाकिस्तान चाहते थे। तो फिर विभाजन कैसे हो गया? जसवंतसिंह ने इस बहस को छेड़कर बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन किसमें इतना दम और दिलचस्पी है कि इस बहस को चलाए रखे? (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
संबंधित जानकारी खोजें