गरीबी दूर नहीं हुई, लेकिन पिछले वर्षों के दौरान गरीब अधिक गरीब नहीं हुए हैं। कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यही दावा करते हैं। फिर भी ऐसा क्यों है कि राजधानी दिल्ली की सबसे नई और आलीशान कही जा सकने वाली विशाल बस्ती द्वारका में दस साल का एक बच्चा झोपड़ी में न्यूनतम सुविधा की कमी की वजह से सुबह शौच के लिए किसी नाले के पास बैठता है और खुले मेनहोल में गिरकर मर जाता है?झुग्गियाँ टूटने के बाद छत और रोटी के चक्कर में महिलाओं के शरीर बेचने की नौबत | | आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक जमशेदजी टाटा ने फरवरी 1965 में कहा था कि '40 वर्षों में ऐसा निराशाजनक राजनीतिक-सामाजिक, आर्थिक माहौल कभी नहीं था |
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आने से क्या गरीबों की हालत खराब नहीं मानी जाएगी? महाराष्ट्र, उड़ीसा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में पिछले दशकों के मुकाबले गाँवों में ही नहीं कस्बों में भी पीने का पानी मिलना मुश्किल क्यों हो गया है? राज भाजपा का हो या कांग्रेस का अथवा वाम मोर्चे का, क्या आर्थिक विकास के साथ सामाजिक असमानता में भी बढ़ोतरी नहीं हुई है? फिर भी ऐसे सवालों पर लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के बीच गंभीर बहस नहीं हो रही है।संभवतः अंदर ही अंदर उन्हें अपनी गलतियों और कमजोरियों का अहसास है, इसलिए बच्चे के नाले में गिरकर मरने या झोपड़ियों में कुपोषण और नारकीय स्थितियों के कारण हो रही मौतों पर आँसू बहाने तथा गरीबों की सहायता करने कोई राजनेता नहीं पहुँचता। सब अपने को 'लौह पुरुष' और विरोधी को मोम का पुतला साबित करने में लगे रहते हैं। टीका-टिप्पणियों में राजनीतिक और नैतिक गरिमा की सारी सीमाएँ लाँघी जा रही हैं। इस चक्कर में सही मुद्दों को भी तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है और समस्याओं के निदान पर लीपापोती होती है।अँगरेजी की अनिवार्यता न रखने तथा कम्प्यूटर क्रांति से बेरोजगारी न बढ़ने देने के मुद्दे इसी तरह उछले तथा ध्वस्त हो गए। समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायमसिंह यादव ने लखनऊ में स्कूली शिक्षा में अँगरेजी की अनिवार्यता नहीं होने की बात को रेखांकित किया। यह कोई नई बात नहीं थी। महात्मा गाँधी से लेकर राममनोहर लोहिया तक बुनियादी शिक्षा और हिन्दुस्तानी भाषा की आवाज उठाते रहे हैं। राममनोहर लोहिया ने राजभाषा और जनभाषा की खाई मिटाने का अभियान चलाया था।प्रारंभिक दौर में समाजवादी आंदोलन से जुड़े नेता और कार्यकर्ता विश्व-राजनीति और विश्व-दर्शन का अध्ययन करके नए सपने बुनते थे। हिन्दी आंदोलन कूपमंडूकता के लिए नहीं, जनभाषा को सशक्त और समृद्ध करने के लिए था। साथ ही लोहियावादियों ने सोच-समझकर सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा हिन्दी के जरिए तय करने का अभियान चलाया था, लेकिन सोशलिस्ट भटककर दिशाहीन हुए तो हिन्दी को सही स्थान दिलाने का अभियान भी गड़बड़ा गया।नतीजा यह हुआ कि जिन राज्यों में हिन्दी को महत्व मिला, वहाँ भी अच्छी हिन्दी लिखने और अपनी भाषा में गहरा चिंतन करने वालों की कमी होती गई। इसीलिए अँगरेजी की अनिवार्यता न होने की बात उठने पर ऐसा समझा जाने लगा कि अभियानकर्ता लोगों को अज्ञानी और पिछड़ा रखना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि कई अफ्रीकी देशों में अँगरेजी का वर्चस्व रहने पर भी वहाँ गरीबी और भुखमरी से निजात लोगों को नहीं मिली है। इसलिए गरीबी और पिछड़ेपन का कारण केवल एक भाषा का वर्चस्व न होना कतई नहीं हो सकता। हिन्दीवालों ने ही हिन्दी का सर्वाधिक नुकसान किया है।पहले एक वर्ग क्लिष्ट संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को लेकर अड़ियल रुख अपनाता रहा। हाल के वर्षों में अँगरेजी मिश्रित हिन्दी को जनभाषा के रूप में स्थापित करने का प्रयास होने लगा। गाँधी और लोहिया की विचारधारा के अनुरूप हिन्दुस्तानी को सशक्त और समृद्ध करने की कोशिश नहीं हुई। इस बार विवाद बढ़ने पर समाजवादी नेता बचाव की मुद्रा में आ गए, जबकि वे राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं को एक झटके में अनिवार्य रूप से लागू करने का संकल्प व्यक्त कर सकते थे, लेकिन दक्षिण भारत में पार्टियों के साथ सौदेबाजी या बाद में अंतरराष्ट्रीय (अमेरिकी-ब्रिटिश) बिरादरी से समर्थन के प्रयासों को खतरा हो सकता था, इसलिए भ्रमपूर्ण वायदों के साथ विवाद को दबा दिया गया।पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव के दौर में एक और बात बराबर सुनने को मिल रही है कि 'हाय राम आजादी के 60 सालों में निराशा का ऐसा माहौल नहीं था, जैसा कि अब है।' वास्तविकता यह नहीं है। टेलीविजन क्रांति ने हमें भविष्य के सपनों से खुश रहना तो सिखाया है, लेकिन अतीत के पन्नों को देखने-समझने की शक्ति कुंद कर दी है। अन्यथा लोगों को याद रहता कि चीनी आक्रमण और पंडित नेहरू के निधन के बाद भी निराशा के घनघोर बादल छाए थे। आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक जमशेदजी टाटा ने फरवरी 1965 में कहा था कि '40 वर्षों में ऐसा निराशाजनक राजनीतिक-सामाजिक, आर्थिक माहौल कभी नहीं था।' तब देश को गरीबी और असमानता से जूझते हुए आत्मनिर्भर बनाने को लेकर हर स्तर पर संघर्ष की स्थिति दिखाई दे रही थी। लालबहादुर शास्त्री आज के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मुकाबले अधिक ईमानदार, विनम्र और समर्पित नेता थे, लेकिन समस्याओं का शीघ्रातिशीघ्र निदान का जादुई चिराग उनके पास भी नहीं था। टाटा निराशा व्यक्त कर रहे थे, लेकिन देश में इस्पात उत्पादन, तेल शोधन, बिजली के लिए परमाणु उत्पादन तक की नई योजनाओं का क्रियान्वयन हो रहा था, लेकिन कांग्रेस की तरह भारतीय और सोशलिस्ट, प्रजा सोशलिस्ट पार्टियाँ, स्वतंत्र पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी कमजोर हो चुकी थीं। आज हमें-आपको आश्चर्य हो रहा है कि अरे लालकृष्ण आडवाणी और मनमोहन सिंह | | सबसे बड़ा मुद्दा यह होना चाहिए कि निश्चित राजनीतिक और आर्थिक विचारधारा के बीच लोकतंत्र किस किस तरह मजबूत हो |
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या मायावती और मुलायम के बीच जारी वाक्युद्ध बहुत निचले स्तर पर चला गया है। सोशलिस्टों या कम्युनिस्टों के जहरभरे तीरों को नफरत की राजनीति कहा जा रहा है, लेकिन 1963- 64 में तो जनसंघ या कम्युनिस्ट पार्टियों को अपने अधिवेशनों में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन पर शोक प्रस्ताव पारित करने तक से परहेज था। लालबहादुर शास्त्री के बाद जब श्रीमती इंदिरा गाँधी सत्ता में आईं तो सोशलिस्ट और जनसंघियों ने उनके विरुद्ध निम्न स्तर तक का विषवमन करने में तनिक संकोच नहीं किया था। सत्तर के दशक में जनसंघ के नेता परमाणु बम बनाने के साथ ही भारत और पाकिस्तान के एकीकरण सिद्धांत की दुहाई दे रहे थे। कल्पना कीजिए यदि 1967 में जनसंघ किसी तरह सत्ता में आकर अपने आतंक तथा सैन्य बल पर पाकिस्तान के भारत में विलय की कोशिश करते तो कितने विनाशकारी परिणाम होते? आखिरकार आज तालिबानी पाकिस्तान को उसी तरह हड़पने की कोशिश कर रहे हैं और दोनों क्षेत्र विनाश की स्थितियाँ भुगत रहे हैं। दुःखद बात यह है कि भारत में आज भी ऐसे कट्टरपंथी लोग सत्ता में आने को बेताब हैं, जो परमाणु हथियारों तथा अन्य तरीकों से आतंकित कर पाकिस्तान को तबाह करना चाहते हैं, जबकि भारत और पाकिस्तान की जनता का असली भला मजबूत और लोकतांत्रिक व्यवस्था से ही हो सकता है।दूसरी तरफ कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी जैसी पार्टियों के कमजोर होने से भी विचलित होने की जरूरत नहीं है। सोनिया गाँधी ने तो कुछ वर्ष पहले नेतृत्व संभाला है। बरसों पहले कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस की तुलना ऐसे बड़े हाथी से की थी, जो चल-फिर नहीं सकता। निराशा के दौर में उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि पार्टी को इस तरह घसीटते रहने से तो कांग्रेस का खत्म हो जाना बेहतर है। वास्तव में 1955 के बाद पंडित नेहरू के सत्ताकाल में ही समस्याओं का अंबार बढ़ने लगा था। इंदिरा गाँधी को भी 1967 से 1970 के बीच बड़े राजनीतिक तूफान झेलने पड़े थे। 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध और बांग्लादेश के अभ्युदय से उन्हें बहुत बड़ी ताकत मिली, लेकिन चार वर्षों में ही अराजकता की स्थिति बन गई और इमरजेंसी लगाने की नौबत आ गई। इसलिए अस्थिरता, अराजकता के दौर आते-जाते रहे हैं। सबसे बड़ा मुद्दा यह होना चाहिए कि निश्चित राजनीतिक और आर्थिक विचारधारा के बीच लोकतंत्र किस किस तरह मजबूत हो। |