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फैसले के लिए तैयार करोड़ों हाथ
- सी. उदय भास्कर
अगर चुनाव लोकतांत्रिक अनुभव का सबसे स्पष्ट हिस्सा होता है तो गुरुवार को दुनिया का सबसे बड़ा शो शुरू हुआ है, जब भारतीय संसद के निचले सदन लोकसभा के 15वें आम चुनावों के पहले चरण में 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने भाग लिया।

पूरी प्रक्रिया में लगभग 40 करोड़ भारतीयों के मतदान करने की उम्मीद की जा रही है
  भारतीय चुनाव आयोग लगभग एक माह की लंबी अवधि तक अत्यंत सराहनीय काम करता है। चुनाव का आखिरी चरण मध्य मई में समाप्त होगा, जब दिल्ली में एक नई सरकार बनेगी। मंजिल तक देश को पहुँचाने में आयोग की भूमिका भी महत्वपूर्ण है      
और हाँ, उनमें से बहुत से मतदाता बहुत ही गरीब हैं, जिन्हें सुंदर शब्दों में 'डीएडी' सिंड्रोम से पीड़ित, यानी दिन में पचास रुपए से कम कमाने वाला माना जाता है, लेकिन यह आम भारतीय के उत्साह और जोश को किसी रूप में कम नहीं करता, जिससे वह आम चुनावों में भाग लेता है। चुनावी शोरशराबे के पैमाने और विविधता की बराबरी कोई नहीं कर सकता और हर तरह के आँकड़ों के रिकॉर्ड और विशिष्ट उपलब्धियों के बावजूद अप्रत्याशित परिणाम भी सामने आ जाते हैं।


चुनाव का अर्थ है, मतदान द्वारा सत्ता में आने या सरकार का गठन करने, अपने आपको एक शासन देने की प्रक्रिया। साथ ही वह सबसे बुरे प्रकार के और निंदनीय क्रियाकलापों को प्रेरित करता है, जिनमें धमकी और विपक्षी उम्मीदवारों की राजनीतिक द्वेष से प्रेरित हत्याओं से लेकर रिश्वतबाजी और अन्य प्रकार के प्रलोभन शामिल होते हैं। अनजान-सी इंडियन जस्टिस पार्टी के विजय बहादुर सोनकर, जो भारत के सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश के जौनपुर से चुनाव मैदान में उतरे थे, का शव 13 अप्रैल को एक पेड़ से लटकते पाया गया। इससे पहले उड़ीसा के एक उम्मीदवार की स्थानीय वामपंथी उग्रवादियों ने हत्या कर दी।

इससे विपरीत, भारतीय चुनाव आयोग लगभग एक माह की लंबी अवधि तक अत्यंत सराहनीय काम करता है। चुनाव का आखिरी चरण मध्य मई में समाप्त होगा, जब दिल्ली में एक नई सरकार बनेगी। मंजिल तक देश को पहुँचाने में आयोग की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
भारत में हर 5 साल में बैलट की बुलेट पर जीत होती है और यह संतुलन इसे अशांत दक्षिणी एशियाई क्षेत्र में एक विशिष्ट स्थान बना देता है। मुख्य संघर्ष प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई (हालाँकि सोनिया गाँधी कांग्रेस अध्यक्ष और भीड़ खींचने वाली नेता हैं) में कांग्रेस नीत संप्रग गठबंधन और प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा नीत राजग गठबंधन में है। तीसरा मोर्चा भी है, लेकिन इसकी भूमिका संतुलन साधने तक सीमित है।

16 अप्रैल को हुए मतदान की तैयारी में अनवरत और जम कर प्रचार अभियान और नारेबाजी चली। यह सिलसिला अब भी जारी है। दृश्य-श्रव्य माध्यम अधिक व्यापक और सस्ती पहुँच का अवसर देते हैं। टेलीविजन पर हर समय बहस और चर्चाएँ जारी हैं, लेकिन यह कहना गलत होगा कि यह गहमा-गहमी सिर्फ टेलीविजन पर है।

अधिकांश भारत न तो टीवी से चिपका हुआ है और न ही उसे साइबर-स्पेस की
  अधिकांश चुनाव पूर्व सर्वेक्षण संकेत देते हैं कि कांग्रेस और भाजपा दोनों नई लोकसभा में 150 का आँकड़ा पार नहीं कर पाएँगे और इस प्रकार एक गठबंधन सरकार अपरिहार्य है      
जानकारी है और आखिरकार सामाजिक-आर्थिक क्रम के सबसे निचले पायदान पर मौजूद ग्रामीण मतदाता ही यह निश्चित करेंगे कि दिल्ली में किसकी सरकार बनेगी। उत्तर प्रदेश (84 सीटें), महाराष्ट्र (48 सीटें), आंध्रप्रदेश और पश्चिम बंगाल (42-42), बिहार (40) और तमिलनाडु (39) वे प्रमुख राज्य हैं, जो मिलकर 543 सदस्यों वाली लोकसभा में लगभग 54 फीसद का योगदान करेंगे।


इन सभी राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियाँ बहुत मजबूत हैं और आंध्रप्रदेश को छोड़कर, जहाँ फिलहाल कांग्रेस की सरकार है, दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियाँ इन राज्यों में कमजोर स्थिति में हैं। इस प्रकार, इन चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियाँ काफी महत्वपूर्ण होंगी। अधिकांश चुनाव पूर्व सर्वेक्षण संकेत देते हैं कि कांग्रेस और भाजपा दोनों नई लोकसभा में 150 का आँकड़ा पार नहीं कर पाएँगे और इस प्रकार एक गठबंधन सरकार अपरिहार्य है।

इस प्रकार तीसरे और चौथे मोर्चों का जन्म होगा, जो क्षेत्रीय और जाति आधारित संगठनों के गठबंधन हैं और वे दिल्ली की अगली सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। रोटी, पानी, कपड़ा, मकान, बिजली, सड़क के रूप में रोजगार और बेहतर सामाजिक-आर्थिक स्थितियाँ मुख्य मुद्दे हैं और मतदाताओं को हर प्रकार के प्रलोभन दिए जा रहे हैं। इनमें दो रुपए प्रति किलोग्राम की दर पर चावल और दूसरी राहतें भी शामिल हैं।

दूसरी ओर चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे तथा धर्म, जाति या जातीयता की पहचान पर लोगों को लुभाने की प्रवृत्ति होगी, लेकिन भारतीय मतदाता ऐसे हर दाँव-पेंच से अवगत है और टीवी, रेडियो तथा मोबाइल फोन के साथ आई संचार क्रांति ने अप्रत्याशित कनेक्टिविटी और जागरूकता उत्पन्न की है, मगर आखिरी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि मजबूत व उत्साह से भरे चुनावों का अंजाम निष्पक्ष और भ्रष्टाचार मुक्त शासन में हो। यह चीज अब तक देखने में नहीं आई और इसलिए भारतीय लोकतंत्र में बहुत-सी विकृतियाँ उत्पन्न हो गई हैं, लेकिन चुनाव प्रक्रिया पहला आवश्यक कदम है और उसका उत्साह से इंतजार है।
(लेखक रक्षा विशेषज्ञ हैं।)
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