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जगदीश टाइटलर के बहाने
-वेबदुनिया डेस्क

वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट पर कड़कड़डूमा कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई होनी थी लेकिन कोर्ट ने यह सुनवाई अब 28 अप्रैल तक बढ़ा दी है। इसका अर्थ यह हुआ है कि काग्रेस नेता जगदीश टाइटलर को सीबीआई की क्लीन चिट के बावजूद उनका भविष्य इस बात पर निर्भर था कि इस मामले में कांग्रेस प्रमुख सोनिया गाँधी क्या फैसला लेती हैं। राजनीतिक नफा नुकसान को ध्यान में रखते हुए सोनिया गाँधी ने भी वही किया जो कि पार्टी के हित में था। नतीजतन जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार के टिकट काट दिए गए।

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एक पत्रकार वार्ता के दौरान ‍गृह मंत्री चिदम्बरम पर जूता उछालने के कांड के बाद टाइटलर के खिलाफ दंगा पीड़ितों का विरोध और मुखर हो गया था। ऐसे में सबकी नजरें कोर्ट पर थीं लेकिन कोर्ट की कार्यवाही टलने के बाद यह फिर यह मामला सोनिया दरबार में पहुँच गया। उन्हें यह सोचना था कि पंजाब में सरकार विरोधी भावनाओं का पूरा पूरा लाभ उठाने के लिए क्या टाइटलर को ही मैदान से हटा लिया जाए? टाइटलर का अधिक विरोध हो रहा था लेकिन यही पैमाना दंगा मामलों के दूसरे आरोपी सज्जन कुमार पर भी लागू हो गया और वे भी प्रत्याशी बने नहीं रह सके।

वैसे सीबीआई ने 29 सितंबर, 2007 को ही टाइटलर को इस मामले में क्लीन चिट दे दी थी लेकिन कोर्ट ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को अमान्य कर मामले की दोबारा छानबीन करने को कहा था। सीबीआई ने दोबारा छानबीन की और पिछले महीने रिपोर्ट अदालत के सामने पेश की। रिपोर्ट में सीबीआई ने कहा है कि टाइटलर के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। लिहाजा केस बंद किया जाए।

अगर कोर्ट सीबीआई रिपोर्ट से संतुष्ट हो जाता तो निश्चित रूप से जगदीश टाइटलर के लिए राहत की बात होती और उन पर लगा दाग पूरी तरह से धुल तो नहीं जाता लेकिन वे अपने पक्ष में यह तर्क दे सकते थे कि उन्हें कोर्ट ने भी निरपराध माना है पर ऐसा न होने पर टाइटलर के लिए मुश्किल हालात पैदा हो गए। उन्होंने अपनी पत्रकार वार्ता में कहा कि वे सोनिया गाँधी के सामने हाजिर होकर अपनी बात रखेंगे। वे ही फैसला करेंगी कि टाइटलर चुनाव लड़ें या नहीं और जिसकी आशंका थी वही फैसला भी सामने आ गया।

अब कांग्रेस को यह जवाब देना है कि वह कैसे टाइटलर और सज्जन कुमार को मैदान में उतार रही थी? क्या उसे सिखों के वोट नहीं चाहिए थे? दिल्ली और पंजाब तथा देश के अन्य हिस्सों में भी क्या उसे सिखों के वोट नहीं चाहिए थे? यह फैसला कांग्रेस को करना था और फैसला हो गया लेकिन ऐसे मौके पर यह विचार करना गलत न होगा कि क्या जगदीश टाइटलर ने वाइई में दंगाईयों को भड़काने का काम किया होगा?

बेहतर होगा कि हम जगदीश टाइटलर की पृष्‍ठभूमि पर निगाह डालें और तय करें कि क्या टाइटलर ऐसा कर सकते हैं? दिल्ली सदर के सांसद और कई अवसरों पर पूर्व मंत्री रह चुके 65 वर्षीय टाइटलर 11 जनवरी को 1944 को पाकिस्तान के गुजराँवाला में पैदा हुए थे। वे एक कपूर परिवार में पैदा हुए थे और जब उनके पिता का निधन हुआ तो वे मात्र एक वर्ष के बच्चे ही थे।

जगदीश टाइटलर की माँ एक धार्मिक विचारों वाली सिख महिला दयाल कौर थीं जिन्होंने उनकी शुरूआती शिक्षा दीक्षा अपने धर्म के अनुसार दी थी। क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि एक सिख महिला का बेटा ही सिखों की हत्याएँ करवाएगा? एक हिंदू पति की पत्नी और एक कुछेक वर्ष के बच्चे की माँ ने भी देश विभाजन के दंगे नहीं देखे होंगे और वे भी पाकिस्तान से दिल्ली नहीं आईं थीं।

क्या इन बातों पर जगदीश टाइटलर पर कोई असर नहीं पड़ा होगा? जगदीश टाइटलर को भी सिख धर्म मे थोड़ी बहुत तो आस्था रही होगी अन्यथा उनका विवाह गुरुद्वारे का एक ग्रंथी नहीं करवाता? इसके अलावा एक ईसाई और शिक्षाविद जेम्स डगलस टाइटलर का प्रेम, स्नेह तथा संस्कार जगदीश टाइटलर को क्या इतना शिक्षित और विवेकशील नहीं बना सके कि वे इतना घृणित कार्य कर बैठे? जो सिख भी जगदीश टाइटलर को जानते हैं और उनके करीब रहे हैं वे भी मानते हैं कि उन्होंने ऐसा नहीं किया होगा?

दंगों की जाँच के लिए आठ जाँच आयोगों ने उन्हें निर्दोष करार दिया था और केन्द्र सरकार द्वारा जाँच के लिए नियुक्त नानावटी आयोग ने भी कहा कि टाइटलर के खिलाफ कुछ 'भरोसेमंद प्रमाण' हैं और बहुत संभावना है कि उनका दंगों के दौरान किए गए हमलों में हाथ हो। इस मामले पर टाइटलर का कहना है कि उनके खिलाफ प्रमाण गलत पहचान का मामला है। इन दंगों को भड़काने में टाइटलर, सज्जन कुमार,आर के आनंद और अन्य लोगों का भी हाथ हो सकता है लेकिन ज्यादातर विरोध टाइटलर के नाम को लेकर होता रहा है।

भारत में दंगों की जाँच और इनके परिणाम के बारे में हम गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगों के परिणाम से भी जान सकते हैं। इन दंगों में भी हजारों की संख्‍या में लोग मारे गए थे और नरेन्द्र मोदी सरकार के कई मंत्रियों और अधिकारियों पर भी दंगों में भागीदारी करने के आरोप लगे लेकिन चुनाव में जीत के बाद दंगों के सारे दाग धुल गए? वर्षों बाद मात्र एक महिला मंत्री को पुलिस हिरासत में लिया जा सका।

हम यह नहीं कह सकते हैं कि दंगों जैसी अराजकता की स्थिति में किस व्यक्ति विशेष या आम आदमी का क्या भूमिका हो सकती है लेकिन अपने विवेक से इतना अंदाजा भर लगा सकते हैं कि अमुक व्यक्ति ने ऐसा किया होगा या नहीं? हमारे देश में ही नहीं वरन अन्य देशों में भी राजनीति और न्याय व्यवस्था की पेचीदिगियों में लोगों की सच्चाई कहीं दब सी जाती है। इसलिए क्या ऐसा संभव नहीं है कि टाइटलर जो कह रहे हों वह भी सच हो। पर फिलहाल जो आम राय है और लोगों का मानना है कि संभव है कि सज्जन कुमार और टाइटलर दंगों में शामिल रहे हों इसलिए राजनीति ने इन दोनों उम्मीदवारों की बलि ले ही ली।

ये लाख कहें कि दंगों में उनका कोई हाथ नहीं था लेकिन आम जनता यह मानने को तैयार नहीं है और जब मामला सामूहिक विवेक का हो तो एक व्यक्ति के विवेक और उसकी ईमानदारी पर जनमत भारी पड़ता है और कम से कम लोकतंत्र का मतलब भी एक तरह से भीड़तंत्र होता है क्योंकि भीड़ या ज्यादा संख्या में जो बात लोग कहते हैं वही सच मानी जाती है। इसलिए हालाँकि टाइटलर का टिकट कट गया है लेकिन अब यह आपके विवेक पर निर्भर नहीं करता है कि आप ही तय करें कि उन्होनें दंगाई भीड़ का नेतृत्व किया होगा या नहीं?
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