| | इस ब्लॉग पर जाना ऐसा लगता है जैसे हम अपनी ही माँ के उस कमरे में से होकर आ रहे हैं जो उनके जाने के बाद अक्सर ही अंधेरे में बंद रहता है। और हम इसमें जाकर एक बार फिर अपनी माँ को पा लेते हैं, उसकी यादों के आँचल में मचल जाते हैं। |
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वे लिखते हैं- मेरे भीतर एक दरवाजा बार-बार खुलने को होता है और बार-बार मैं उसे बंद करना चाहता हूँ।इस दरवाजे के भीतर की दुनिया में माँ है। वह बाहर की दुनिया छोड़ गई है। हालाँकि अब भी मुझे यकीन नहीं होता। या मैं यकीन करना नहीं चाहता। इसीलिए वह दरवाजा खोलने से डरता हूँ। लगता है भीतर एक पानी का रेला है जो मुझे बहाकर ले जाएगा। इसके अलावा अनुराग अपनी बहन रेमी (अनामिका ) के संस्मरण भी देते हैं और और पिता के भी। लेकिन इस ब्लॉग का खास आकर्षण है उनकी माँ श्रीमती शैलप्रिया की कविताएँ। अपने लिए, चाँदनी आग है, घर की तलाश में यात्रा और शेष है अवशेष संग्रह की चुनिंदा कविताएँ इस ब्लॉग पर पढ़ी जा सकती हैं। यहाँ अनियतकालीन पत्रिका प्रसंग के उस अंक से सामग्री भी दी गई है जो श्रीमती शैलप्रिया पर एकाग्र है। उनकी एक कविता पर गौर करें- साक्षी जिस अग्नि को साक्षी मान करशपथ लेते हैं लोग,उस पर ठंडी राख की परतेंजम जाती हैं।मन की गलियों मेंभटकती हैं तृष्णाएँ।मगर इस अंधी दौड़ मेंकोई पुरस्कार नहीं।उम्र की ढलती चट्टान परसुनहरे केशों की मालाटूटती है।आँखों का सन्नाटापर्वोल्लास का सुखनहीं पहुँचाता।मगर एक अजन्मे सुख के लिएमरना नादानी है,जिंदगी भँवर में उतरतीनाव की कहानी है।जाहिर है इस जैसी कई कविताएँ एक स्त्री के सुख-दुःख को बहुत ही बेलौस ढंग से व्यक्त करती हैं। उनकी कविताएँ मन की बात कहने की बेचैनी है। इसके लिए वे कोई कटी-छँटी मुद्राएँ नहीं अपनाती बल्कि अपनी पीड़ा को, दुःख को कहीं भीतरी परतों में बहते छल-छल सुख को बहुत ही सादा ढंग से अभिव्यक्त कर जाती हैं। इन कविताओं को पढ़ना एक स्त्री के आत्मसंघर्ष से रूबरू होना भी है। |