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क्या पाक को चाहिए भारतीय मदद?
- जनरल अशोक मेहत
जब से बराक ओबामा ने दुनिया की इकलौती महाशक्ति के राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली है, तब से 'समाधान' शब्द प्रचलित हो गया है। चाहे वह आर्थिक मंदी हो, मध्य-पूर्व का संकट या अफगानिस्तान-पाकिस्तान (अफ-पाक), नया खेल प्रोत्साहन पैकेजों का है।

अफ-पाक अब एक नया शब्द है और यह आतंकवाद का केंद्र है। अफगानिस्तान में अस्थिरता को ठीक करने के लिए पहले पाकिस्तान से निपटना होगा। एक तर्क यह है कि अमेरिका अफगानिस्तान में अपनी कामयाबी के लिए पाकिस्तान पर बहुत हद तक निर्भर है तो पूरा फोकस काबुल पर चला जाता है।

सीमापार आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान एक-दूसरे से भिड़े हुए हैं,
  पश्चिम में स्थायी तथा कठोर कार्रवाई शुरू करने में पाकिस्तानी सेना को सक्षम बनाने में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है बशर्ते दिल्ली को पंजाबी और कश्मीरी जेहादियों को काबू करने और उनके ढाँचे को तहस-नहस करने की ठोस गारंटी मिले      
दोनों एक-दूसरे पर अस्थिरता फैलाने और उसे डुरंड रेखा के पार धकेलने का आरोप लगा रहे हैं। अमेरिका की शिकायत है कि पाकिस्तान फाटा (एफएटीए) में अल कायदा के शरणगाहों को तबाह करने और अफगानिस्तान में अमेरिका तथा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल (आईएसएएफ) आपूर्ति लाइनों की सुरक्षा की फिक्र नहीं कर रहा है
इसी तरह वाशिंगटन काबुल पर कुशासन और भ्रष्टाचार का आरोप लगाता है। इस्लामाबाद और काबुल अपने देशों पर अमेरिकी हवाई हमलों की आलोचना करते हैं जिससे नागरिक हताहत होते हैं और अफगान व पाकिस्तानी अमेरिका से नफरत करने के लिए प्रेरित होते हैं। भारत का आरोप है कि उनकी सामूहिक अस्थिरता उस पर असर डाल रही है। यह समस्या अंतहीन है।

अफगानिस्तान सुरक्षा, शासन और सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण की जटिल समस्याओं का सामना कर रहा है। पाकिस्तान अधिक पैंचीदा है और वहाँ तालिबानीकरण के लिए स्थितियाँ अनुकूल हैं, जैसा कि राष्ट्रपति जरदारी ने सीबीएस न्यूज को संकेत दिया है। वह भारत के साथ अस्थिर सीमाओं, कश्मीर पर अनिश्चितता और पश्चिम में समस्याग्रस्त डुरंड रेखा वाला एक असुरक्षित देश है। मुंबई हमला डुरंड रेखा से ध्यान हटाने का एक प्रयास था।

राष्ट्रपति ओबामा ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान संबंधी नीतियों की विस्तृत समीक्षा का वादा किया है। कम से कम एक दर्जन अध्ययनों, पेपरों और समितियों ने अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की हैं। सब सहमत हैं कि अफगानिस्तान से संबंधित कोई भी रणनीति पाकिस्तान के बिना कामयाब नहीं हो सकती।

पुराने दक्षिण एशियाई विशेषज्ञ फिर सक्रिय हो गए हैं। पूर्व कमांडर यूएस फोर्सेस अफगानिस्तान जनरल डैन मैकनील और डेविड बर्नो सैन्य सलाहकारों में हैं जो कमांडर जनरल डेविड पेट्रियस को सलाह देंगे जो इराक की अपनी कामयाब राजनीतिक और सैन्य नीति इस क्षेत्र में लागू करेंगे।

बोस्निया के बुल्डोजर कहे जाने वाले क्लिंटन युग के विश्वस्त कूटनीतिज्ञ रिचर्ड होलब्रुक, जो अफ-पाक के लिए विशेष प्रतिनिधि हैं, ने हाल में इस क्षेत्र का दौरा किया है। दोनों देशों में आत्मघाती हमलों के साथ उनका स्वागत हुआ, काबुल में हुआ हमला मुंबई हमले का एक छोटा रूप था। अफगानिस्तान के खुफिया प्रमुख अमरुल्लाह सालाह के पाकिस्तानी आतंकवादियों को हमले का दोषी बताया है। कारगिल से प्रसिद्ध हुए सीआईए के पुराने खिलाड़ी ब्रूस रीडल रिचर्ड होलब्रुक के साथ बातचीत करेंगे। अफ-पाक नीति की समीक्षा के लिए कई अन्य भी अपने सुझाव दे रहे हैं।

अमेरिकी सैन्य खुफिया अधिकारियों ने सिफारिश की है कि जब तक तालिबान के बड़े नेताओं को बलूचिस्तान की प्रांतीय राजधानी क्वेटा में न घेरा जाए, वहाँ के आतंकी ढाँचे से दक्षिणी अफगानिस्तान में हिंसा की घटनाएँ होती रहेंगी।

रक्षामंत्री राबर्ट गेट्स ने अफगानिस्तान में अमेरिकी लक्ष्यों को एक निकास रणनीति से संबद्ध संयमित और यथार्थवादी रूप दिया है। स्पष्ट रूप से एक समन्वित और एकीकृत विस्तृत रणनीति महत्वपूर्ण है। विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के शब्दों में इसे रक्षा, विकास और कूटनीति का मिश्रण होना चाहिए। ईरान, चीन, रूस, सऊदी अरब, मध्य एशिया और भारत जैसी क्षेत्रीय ताकतों की नई रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

अफगानिस्तान में अगस्त में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले अमेरिकी सेनाएँ वहाँ जमा हो जाएँगी। उसका मुख्य जोर खासकर क्वेटा और फाटा के मार्गों को अवरुद्ध करते हुए दक्षिणी और पूर्वी अफगानिस्तान में स्थिरीकरण की प्रक्रिया पर होगा। पिछले साल पाकिस्तान में 22 और इस वर्ष 3 अमेरिकी हवाई हमले हुए। अमेरिकी विशेष बलों ने दो जमीनी हमले किए। तालिबान ने अब आत्मघाती हमलों की बजाय बम धमाकों की रणनीति अपना ली है।

दूसरे विद्रोहों की तरह इसमें नागरिकों को अधिक नुकसान पहुँचता है। अफगानी या पाकिस्तानी अमेरिकियों से नफरत करते हैं, हर हवाई हमले के साथ उनकी नफरत बढ़ती जा रही है। अमेरिकी और ब्रिटिश पायलट तालिबान के खिलाफ अलग-अलग रणनीति अपनाते हैं जबकि ब्रिटिश पायलट फायरिंग से पहले यह सुनिश्चित करते हैं कि तालिबान हथियारबंद हैं, अमेरिकी ऐसी कोई सावधानी नहीं बरतते।

पाकिस्तान में डुरंड रेखा के पार सुरक्षा की स्थिति बदतर है। उत्तर-पूर्वी सीमा प्रांत में सीमावर्ती क्षेत्र के पश्चिमी हिस्सों में उग्रवाद ने जड़ें जमा ली हैं जहाँ न तो राज्य और न ही केंद्र सरकार के कानून प्रभावी होते हैं। अल कायदा के अलावा, तालिबान और कट्टरपंथी संगठनों के विभिन्न गुट यहाँ आजादी से काम करते हैं। दक्षिण वजीरीस्तान में बैतुल्लाह महसूद, बजौर में मौलाना फकीर, स्वात में मौलाना फजलुल्लाह और क्वेटा में मुल्ला उमर। जलाउद्दीन हक्कानी और उनके बेटे फिलहाल कंधार में जमीन तैयार कर रहे हैं। यह संकट पंजाब में भी प्रवेश कर गया है।

पेशावर लगभग तालिबान से घिर चुका है, 2008 में पाकिस्तान में हुए साठ आत्मघाती
  पाकिस्तान को कम असुरक्षित महसूस कराने के लिए, भारत शांति प्रक्रिया बहाल कर सकता है और तारिक अजीज-सतिंदर लांबा चार सूत्री कश्मीर फॉर्मूले पर चलते हुए कश्मीर समस्या को सुलझा सकता है      
हमलों में आधे उत्तर-पूर्वी सीमा प्रांत में केंद्रित थे। अमेरिका-पाकिस्तान-अफगानिस्तान संयुक्त खैबर सीमा समन्वयन केंद्र के बावजूद कराची के रास्ते अफगानिस्तान जाने वाले अमेरिकी लॉजिस्टिक्स दल को खैबर के रास्ते में लूटा जा रहा है। अमेरिका रूस, मध्य एशिया और ईरान से होते हुए वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग ढूँढ रहा है।


निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि पाकिस्तानी सेना सीमा के अपनी ओर विद्रोह को कुचलने की इच्छुक या समर्थ है या नहीं। 9/11 के बाद से पाकिस्तान को दिए गए 11.2 अरब डॉलर का अधिकांश हिस्सा तैनाती में खर्च की प्रतिपूर्ति के लिए था, विद्रोहियों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने के लिए नहीं, यही वजह है कि पाकिस्तान पहले से भी अधिक असुरक्षित हो गया है।

पश्चिम में स्थायी तथा कठोर कार्रवाई शुरू करने में पाकिस्तानी सेना को सक्षम बनाने में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है बशर्ते दिल्ली को पंजाबी और कश्मीरी जेहादियों को काबू करने और उनके ढाँचे को तहस-नहस करने की ठोस गारंटी मिले। बदले में भारत पहले बल प्रयोग न करने का वादा कर सकता है ताकि इस्लामाबाद निश्चिंत होकर अपने बलों को घरेलू सुरक्षा कार्यों में लगा सकता है।

पाकिस्तान के अच्छे मित्र श्रीलंका ने आतंकवाद के खिलाफ केंद्रित कार्रवाई का रास्ता दिखाया है। इससे अमेरिकी और आईएसएएफ अफगानिस्तान पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाएँगे। लेकिन सिर्फ सैन्य उपायों से काम नहीं चलेगा। इससे तालिबान के साथ राजनीतिक समझौते की स्थितियाँ उत्पन्न होंगी। पाकिस्तान को कम असुरक्षित महसूस कराने के लिए, भारत शांति प्रक्रिया बहाल कर सकता है और तारिक अजीज-सतिंदर लांबा चार सूत्री कश्मीर फॉर्मूले पर चलते हुए कश्मीर समस्या को सुलझा सकता है।

क्षेत्रीय समन्वयक रिचर्ड होलब्रुक ने भारत के अपने दौरे में इनमें से कुछ उपाय किए। ये नई अफ-पाक नीति के कुछ मानदंडों को निर्धारित करेंगे जिसे अप्रैल में नाटो सम्मेलन में राष्ट्रपति ओबामा प्रस्तुत करने वाले हैं। इस क्षेत्र को दुरुस्त करने के लिए वाशिंगटन को पाकिस्तान, उसकी सेना और आईएसआई पर निर्भर करना होगा।
(लेखक प्रसिद्ध सुरक्षा विशेषज्ञ हैं।)
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