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देश के अंतरिम बजट पर यथास्थितिवाद हावी
-वेबदुनिया डेस्क
यूपीए सरकार की ओर से अंतरिम बजट कहे जाने वाली लेखानुदान माँगों में सरकार से उम्मीद की जा रही थी कि यह ग्लोबल आर्थिक संकट से अर्थव्यवस्था को बचाने और आम चुनाव में अपनी वापसी की संभावनाओं को बरकरार रखने के लिए लोकलुभावन घोषणाएँ करेगी, पर सरकार ऐसा कुछ नहीं कर सकी।

इस बात की पूरी संभावना थी कि सरकार सार्वजनिक खर्च में बढ़ोतरी करेगी और इसी के अनुरूप यह 9.53 लाख करोड़ तक पहुँच गया है लेकिन सरकार ने आम लोगों को राहत देने या मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए कोई घोषणा नहीं की है। बजट में कोई ऐसी बात नहीं है जिससे कहा जाए कि किसी भी वर्ग विशेष को कोई खास मिला है। मात्र किसानों के लिए लोन सब्सिडी जारी रखने की बात कही गई है। इसके अलावा जिन लोगों को इस बजट से उम्मीदें थीं, उन्हें गहरी निराशा ही हाथ लगी है।

सरकार से अपनी फ्लैगशिप योजनाओं, ग्रामीण विकास और हाउसिंग क्षेत्र पर खर्च को बढ़ाने की भी संभावना थी लेकिन यह खर्च भी इतना अधिक नहीं बढ़ा है कि इसे दीर्घकालिक दृष्टि से प्रभावी माना जा सके। इस बार सरकार ने अपनी पिछली उपलब्धियों को ही गिनाया है क्योंकि उसके पास इस बार कुछ कहने के लिए नहीं था।

सरकार ने किसानों की लोन सब्सिडी जारी रखने की मंशा से जाहिर किया है कि इसे किसानों के तो वोट चाहिए लेकिन कर्ज से डूबे किसानों के लिए 60 हजार करोड़ की राहत (जो बाद में 95 हजार करोड़ तक बढ़ गई) से चार करोड़ किसानों को खुश करने की कोशिश की गई थी लेकिन इस बार किसानों और नौकरी पेशा लोगों के लिए भी कुछ नहीं है।

पिछले वर्ष चिदंबरम ने उत्पाद शुल्क और आयात शुल्क में थोड़ी छूट दी थी और सरकार की भारत निर्माण, राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्‍य बीमा योजना, ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और अल्पसंख्यकों के कल्याण की योजनाओं के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराया था लेकिन इस बार सामाजिक क्षेत्र के लिए भी कुछ नहीं है।

पिछले वर्ष अनुसूचित जातियों, जनजातियों के कल्याण के लिए चार हजार करोड़ की घोषणा की गई थी और अल्पसंख्यक मंत्रालय का बजट 500 करोड़ से 1000 करोड़ हो गया था लेकिन इस वर्ष अल्पसंख्यकों के लिए जो घोषणाएँ हैं वे पुरानी ही हैं। गरीबों के लिए इंदिरा गाँधी पेंशन योजना शुरू की गई है। इंदिरा के नाम पर दो और योजनाएँ लागू की गई हैं लेकिन एक पेंशन योजना पिछले साल ही शुरू की गई थी।

इस बार विधवा, विकलांगों के लिए पेंशन और मैला ढोने वाले, सफाई कर्मचारियों के लिए कर्ज सस्ता किया गया है लेकिन इस बात का उल्लेख नहीं किया गया है कि इनके लिए कितनी राशि का प्रावधान किया गया है। कहा जा सकता है कि इस वर्ष सरकार ने सामाजिक कल्याण की जिन नई योजनाओं की घोषणा की है, संभव है कि उनका प्रावधान पिछले वर्ष ही किया गया हो।

पिछले तीन सालों की तरह से इस बार भी देश की विकास दर नौ प्रतिशत रहने का दावा किया गया है लेकिन ऐसा संभव नहीं लगता क्योंकि पहले ही कर वसूली के बजट अनुमान में 60 हजार करोड़ की कमी है। औद्योगिक उत्पादन में पिछले वर्ष के मुकाबले दो फीसदी की गिरावट है।

राष्ट्रीय महिला कोष की पूँजी बढ़ेगी ‍लेकिन कितनी, यह जानकारी नहीं दी गई। ग्रामीण ढाँचागत विकास योजना का विस्तार होगा लेकिन इसके लिए प्रावधान राशि का पता नहीं। देश में खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ेगा, विदेशी व्यापार बढ़ेगा, घरेलू निवेश दर बढ़ी है लेकिन पिछले वर्षों की तुलना में कितनी अधिक?

सरकार ने महँगाई घटने और मंदी के बढ़ने की आशंका जाहिर की है। दो पैकेज देने की घोषणा की गई है लेकिन इनके लिए राशि कितनी तय है, पता नहीं चल सका। सरकार की ओर से निजी क्षेत्र को बचाने की बात की गई ले‍क‍िन बचाने के लिए क्या योजनाएँ हैं और क्या-क्या राहत दी जानी है, इसके बारे में कोई बात नहीं की गई।

बुनियादी ढाँचे में निवेश 10 हजार करोड़ बढ़ाया गया लेकिन क्या यह पर्याप्त है? ऐसे ही अन्य खर्चों के लिए सरकार के पास पैसे कहाँ से आएँगे जबकि निर्यात दर गिर रही है। सरकार निवेश बढ़ाने के कदम उठाने की बात करती है लेकिन निगमित क्षेत्र या शेयर बाजार को कोई राहत नहीं। सरकार का दावा है ‍‍‍कि बाजार में पूँजी बढ़ाएँगे, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को बढ़ावा देंगे लेकिन शेयर बाजार नीचे जा रहा है?

फाइनेंस सेक्टर में सुधार की जरूरत है लेकिन क्षेत्र को कोई राहत नहीं दी गई। पाँच सालों में कृषि के लिए 300 फीसदी आवंटन बढ़ा है लेकिन कृषि विकास की दर घटती जा रही है। सरकार कृषि क्षेत्र के लिए जितने ज्यादा उपाय करने का दावा करती है कृषि तथा कृषक की हालत उतनी ही अनुत्पादक और कमजोर होती जा रही है। सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में जो काम करने की बात कही है वह मूल रूप से पिछले वर्ष की घोषणाओं का दोहराव है।

हालाँकि भारतीय संविधान में अंतरिम बजट जैसी कोई व्यवस्था नहीं है लेकिन सरकार ने बजट की तौर पर लेखानुदान की माँगों को रखा और नीतिगत फैसले लेने की छूट के बावजूद न तो कर दरों में कोई बदलाव किया और न ही नई योजनाओं की घोषणा की है। यह बजट भी राजस्व और खर्चों का लेखाजोखा मात्र है और इसमें घोषणाओं के नाम पर जो कुछ कहा गया है वह पिछले वर्ष का है।

इस वर्ष के बजट से उम्मीद की जा रही थी कि देश की धीमी अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार मिलेगी लेकिन जैसा बजट पेश किया गया है उससे लगता है कि सरकार ने किसी तरह परम्परा का निर्वाह भर कर दिया है और ठोस कुछ भी नहीं किया गया है। जबकि संभावना तो इस बात की ज्यादा है कि पिछले बजट का 2.5 फीसदी राजकोषीय घाटा पाँच फीसदी से भी ऊपर निकल सकता है और अर्थव्यवस्था से जुड़ी नकारात्मक प्रवृत्तियाँ जोर पकड़ेंगी। इस बजट की सबसे अहम बात देश के रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी समझी जा सकती है।
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