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समलैंगिकता की सनसनी और सच्चाई
-प्रभु जोश
पिछले कुछेक वर्षों से भारत में भी अमेरिकी तर्ज पर समलैंगिकों के अधिकारों को लेकर बुद्धिजीवियों की एक खास बिरादरी संगठित होकर समवेत-स्वर में लगातार माँग करती आ रही है कि भारतीय न्याय ग्रंथों से भी उस कानून को अविलंब हटा दिया जाए, जो'समलैंगिकता' को 'अप्राकृतिक-मैथुन' मानकर उसे अपराध की श्रेणी में रखता चला आ रहा है। वे इस कानून को 'राज्य' द्वारा मानवता के विरुद्ध किया जा रहा एक जघन्य अपराध मानते हैं। अतः इसका निरस्त किया जाना जरूरी है।

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इस माँग के औचित्य पर विचार करने के पहले हम यहाँ यह भी देख लें कि गत दशकों में अमेरिकी समाज में 'समलैंगिकता' को वैध बनाने के लिए किस तरह की रणनीतिक कवायदें की गईं। यह सब एक सुनिश्चित योजना के अंतर्गत ही हुआ। दरअसल, समलैंगिकता किसी भी व्यक्ति में जन्मना नहीं होती, बल्कि वह बचपन के निर्दोष कालखंड में अज्ञानतावश हो जाने वाली किसी त्रुटि के कारण उसे उसकी आदत का हिस्सा मान लिया जाता है। इस तरह यह नादानी में अपना लिए जाने वाली 'वैकल्पिक यौनिकता' है, जिसे चिकित्सकीय दृष्टि प्राकृतिक या नैसर्गिक नहीं मानती। जब व्यक्ति इसमें फँस जाता है तो बुनियादी रूप से उसके लिए यह एक किस्म की यातना ही होती है, जिसमें उसके समक्ष बार-बार अपना यौन सहचर बदलने की विवशता भी जुड़ी होती है। इसके अलावा इसमें विपरीत सेक्स के साथ किए गए दैहिक आचरण की-सी संतुष्टि भी बरामद नहीं हो पाती।

वैसे तमाम सर्वेक्षण और इस विषय पर एकाग्र अध्ययन बताते हैं कि कोई भी व्यक्ति 'स्वेच्छया समलैंगिक' नहीं बनता। किशोरवय में पहली यौन-उत्तेजना और आकर्षण विपरीत सेक्स को लेकर ही उपजता है, समलैंगिक के लिए नहीं। न्यूयॉर्क के एलबर्ट आइंस्टाइन कॉलेज ऑफ मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. चार्ल्स सोकाराइड्स की स्पष्टोक्ति है कि यौन-उद्योगों से जुड़े कुछ तेज-तर्रार शातिरों की यह एक धूर्त वैचारिकी है, जो समलैंगिकों को पैथालॉजिकल बताती है। इससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। अमेरिकी समाज में समलैंगिकता की समस्या के ख्यात अध्येता डॉ. चार्ल्स अपनी पुस्तक 'होमोसेक्सुअल्टी : फ्रीडम टू फॉर' में अपना सूक्ष्म वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहते हैं:-

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अमेरिकी समाज में यह तथाकथित समलैंगिक क्रांति (?) बस यूँ ही हवा में नहीं गूँजने लगी, बल्कि यह कुछ मुट्ठीभर शातिर बौद्धिकों की 'मानववाद' के नाम पर शुरू की गई वकालत का परिणाम था, जिनमें से अधिकांश स्वयं भी समलैंगिक ही थे। ये लोग 'ट्राय एनीस्त्र्थिंग सेक्सुअल' के नाम पर शुरू की गई यौनिक-अराजकता को नारी स्वातंत्र्य के विरुद्ध दिए जा रहे एक मुँहतोड़ उत्तर की शक्ल में पेश कर रहे थे। पश्चिम में जब पुरुष की बराबरी को मुहिम के तहत स्त्री 'मर्दाना'बनने के नाम पर अपने कार्य-व्यवहार और रहन-सहन में भी इतनी अधिक 'पुरुषवत' या 'पौरुषेय' होने लगी कि जिसके चलते उसका समूचा वस्त्र विन्यास भी पुरुषों की तरह होने लगा। नतीजतन स्त्री की जो 'स्त्रैण-छवि' पुरुषों को यौनिक उत्तेजना देती थी, शनैः शनैः उसका लोप होने लगा। उसका आकर्षण घट गया। कहना न होगा कि वेशभूषा की भिन्नता के जरिए किशोरवय में लड़के और लड़की के बीच जो प्रकट फर्क दिखाई देता था, वह धूमिल हो गया।

इस स्थिति ने लड़के और लड़के के बीच यौन-निकटता बढ़ाने में इमदाद की, जिसने अंततः उन्हें समलैंगिकता की ओर हाँक दिया। निश्चय ही इसमें फैशन-व्यवसाय की भी काफी अहम भूमिका थी। फिर इस निकटता में अपने 'समलैंगिक-सहचर' से यौन-संबंध बनाते समय गर्भ रह जाने की महाविपत्ति से भी बचाव हो गया था। इस दोनों में से किसी को भी पिल्स लेने की आवश्यकता नहीं होती थी। तब 'एड्स' का आशीर्वाद भी नहीं था कि किशोरों को कंडोम को जेब में रखने की आज की-सी आजादी उपलब्ध होती। बहरहाल इस यौन-मैत्री में रिस्क नहीं थी। कक्षा के 'क्लासमेट' को 'सेक्समेट' बनाया जा सकता था।
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