- अनवर जे अशरफलंदन में घर पर बैठे टेलीविजन के चैनल बदल रहा था। भारतीय चैनल देखते हुए मीडिया को सेंसर करने वाली खबर से टकराया तो लगभग उसी वक्त बीबीसी पर प्रिंस हैरी की खबर देखी, जिस पर ब्रिटिश मीडिया ने उनकी खूब खबर ली। पाकिस्तानी दोस्त को ‘पाकी’ कहकर बुलाना शाही राजकुमार के लिए महँगा साबित हुआ और उन्हें माफी माँगनी पड़ी।चैनल बदलते हुए सोचा कि अगर ब्रिटेन में मीडिया पर सेंसर होता तो क्या सरकारी मदद से चलने वाला बीबीसी कभी इस खबर को दिखा पाता और बीबीसी ही क्यों, दर्जनों दूसरे टेलीविजन चैनल और अखबार क्या इस खबर को दिखा पाते।एक और बात जेहन में आई। पिछले साल उत्तर कोरिया का एक ट्रेनी पत्रकार रेडियो प्रसारण की बारीकियाँ सीखने जर्मनी आया था। 20-22 साल के उस पत्रकार के साथ 50-55 साल का एक बुजुर्ग शख्स साये की तरह लगा रहता था। कौतुहल जगा, तो वजह जानने की कोशिश की। पता चला कि बुजुर्ग सरकार का एजेंट है, जो पत्रकार के हर कदम पर नजर रखता है। | | कुल मिला कर सारी बात जवाबदेही की है। मीडिया को भी जवाबदेह बनना होगा और सरकार को भी, लेकिन पाबंदियाँ लगा कर जवाबदेही तय नहीं की जा सकतीं |
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उस वक्त सोचकर बड़ा अजीब लगा कि क्या ऐसी भी पत्रकारिता हो सकती है, लेकिन भारत में अब जब सरकार की तय करेगी कि कौन-सी खबर दिखानी है, कौन-सी नहीं और कितना फुटेज दिखाना है, तस्वीर कौन-सी लगानी है तो फिर ज्यादा फर्क नहीं रह जाता है।ओलिंपिक बीते अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है। पत्रकारिता और रिपोर्टिंग पर अंकुश लगाने के लिए दुनिया भर की मीडिया ने जब चीन सरकार को कोसा था, तो भारत भी उसमें पीछे नहीं था। तिब्बत की खबरों को दबाने के लिए चीन को कहा-कहाँ नहीं जवाब देना पड़ा था। या उससे कुछ दिन पहले अगर म्याँमार की बात करें, तो वहाँ भी जन आंदोलन के खिलाफ कोई खबर नहीं आ पाती थी।सरकारी अखबार अपने मुताबिक बातें पेश कर देता था। यहाँ तक कि विदेशी पत्रकारों तक को वहाँ जाने की इजाजत नहीं मिल पा रही थी, लेकिन अगर भारत में नया कानून आ जाए, तो क्या कोई विपक्षी पार्टी रैली करने की सोच सकती है। और अगर रैली हो भी जाए तो क्या इसकी सही तस्वीर जनता तक पहुँच पाएगी।अगर सरकारी दख़ल या प्रभाव के बारे में सोचें तो दूरदर्शन का सरकारी चेहरा सामने आता है। दूरदर्शन के पास विशाल नेटवर्क है, भारत में शायद सबसे बेहतर तकनीक है, सरकार का पूरा बैक-अप है और इसे देखने के लिए केबल टीवी की भी जरूरत नहीं। फिर भी कितने लोग इसे देखते हैं। ताज़ा आँकड़े के मुताबिक चार फीसदी से भी कम, लेकिन नए कानून के बाद तो सभी चैनल दूरदर्शन ही की तरह हो जाएँगे।प्रस्तावित कानून की बातें सोचकर अजीब लगता है। छोटे स्तर का कोई अफसर तय करेगा कि किसी खबर का लाइव प्रसारण होगा या नहीं। सोचता हूँ कि क्या ये वैसी ही बात नहीं हुई कि जैसे कोई पत्रकार जाकर तय कर दे किसी इलाके में कर्फ्यू लगाना है कि नहीं, लाठीचार्ज करना है कि नहीं।मुंबई हमलों के कवरेज को लेकर भारतीय मीडिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन जवाब तलाशने के लिए जरा बाहर निकलना होगा। सोचना होगा कि 9/11 के वक्त अमेरिकी मीडिया ने क्या किया। क्या उन्होंने इस खबर को दबा दिया था या इसे सरकार से पूछकर चलाया गया। लंदन बमकांड के दौरान ब्रिटिश मीडिया ने क्या किया। ब्रिटेन में तो इसके बाद एक बेकसूर के ट्रेन में पुलिस के हाथों मारे जाने पर मीडिया ने जो रोल निभाया, उसकी तारीफ पूरी दुनिया करती है।और दूर क्यों जाएँ, पाकिस्तानी मीडिया को ही देख लें। भारत में इमरजेंसी और उस दौरान मीडिया की हालत तो याद ही होगी, लेकिन पाकिस्तान में जब 2007 में इमरजेंस लगी, तो मीडिया ने घुटने नहीं टेके, बल्कि पाकिस्तानी सरकार ने भी वैसा डंडा नहीं चलाया। मुंबई हमलों का सच सामने लाने के हकदार भी ‘डॉन’ और ‘जियो न्यूज’ जैसे चैनल पाकिस्तानी मीडिया ही हैं।जरा कल्पना कीजिए कि नए कानून के बाद क्या भारत में कोई भी चैनल या अखबार किसी सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष को कैमरे पर रिश्वत लेते दिखा पाएगा? क्या बाढ़ की बेहाली में डूबती-बहती जिंदगियों की कहानी उजागर हो पाएगी और क्या संसद में नोट लहराते नेताओं की तस्वीर सामने आ पाएगी? ऐसा तो नहीं है कि आँख बंद करने से रामराज आ जाएगा। ऐसे मामले तो तब भी होंगे, फर्क इतना रहेगा कि ये बड़ी आसानी से बर्फ में दबा दिए जाएँगे। | | आज, जबकि भारत को महाशक्ति के तौर पर देखा जाने लगा है, क्या मीडिया पर पाबंदी लगाए जाने के बाद उस पर सवाल नहीं उठाए जाएँगे? |
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हाल ही में चीन में एक बड़ा दूध घोटाला सामने आया था। घोटाला इतना बड़ा था कि हजारों क्विंटल दूध बहा देना पड़ा था और दुनिया भर के सुपर स्टोरों ने चीनी दूध से बने माल वापस कर दिए थे। इस पूरे मामले की खबरें ढँकी-छिपी, चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के जरिए आ पाईं। पूरी तस्वीर कभी साफ नहीं हुई। घोटाले से चीन सरकार को अरबों डॉलर की चपत लग गई। ऐसे कुछ मामले भारत में भी सामने आ चुके हैं लेकिन ज्यादातर मौकों पर शायद मीडिया की सजगता से शुरुआती दौर में ही इनका राजफाश भी कर दिया गया है।जर्मनी में रहते हुए यहाँ की मीडिया पर नजर डालता हूँ तो कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि जैसे सरकार का दखल पड़ रहा हो। मीडिया को पूरी आजादी है। नेताओं के फर्जीबाड़े की खबर हो या कंपनियों के बड़े अफसरों की धोखाधड़ी की खबरें, हर बात पूरी पेशेवर निष्ठा और तटस्थता के साथ जारी होती है।यह सच है कि भारतीय मीडिया को अपने अंदर झाँकने की जरूरत है, जो वह कर भी रहा है, लेकिन इससे निपटने के लिए उसे जंजीरों में जकड़ा जाए, इसकी जरूरत नहीं लगती। मुंबई हमलों के बाद खुद मीडिया ने अपने ऊपर नजर रखने की कोशिशें की हैं, जिस पर अमल भी शुरू हो गया है, लेकिन इस तरह की बंदिशों से न सिर्फ भारत में, बल्कि विदेशों में भी भारत की साख पर बट्टा लगेगा।भारतीय मीडिया और वहाँ की ट्रेनिंग को किस नजर से देखा जाने लगा है, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि बीबीसी, सीएनएन और अल जजीरा सहित सभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थाओं में भारत और भारतीय मूल के पत्रकारों की संख्या बढ़ती जा रही है। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अखबारों में तो उन्होंने पहले से ही जगह बना रखी है।आज, जबकि भारत को महाशक्ति के तौर पर देखा जाने लगा है, क्या मीडिया पर पाबंदी लगाए जाने के बाद उस पर सवाल नहीं उठाए जाएँगे? क्या उन देशों पर सवाल नहीं उठते, जहाँ मीडिया को पिंजरे में कैद रखा गया हो, चाहे वह चीन हो या म्याँमार?कुल मिला कर सारी बात जवाबदेही की है। मीडिया को भी जवाबदेह बनना होगा और सरकार को भी, लेकिन पाबंदियाँ लगा कर जवाबदेही तय नहीं की जा सकतीं। |