- डॉ. विष्णुदत्त नागर आम आदमी के लिए बीता साल आवश्यक खाद्य वस्तुओं की महँगाई का दर्द छोड़ गया है यद्यपि सरकार द्वारा जारी किए गए आँकड़ों के अनुसार मुद्रास्फीति की दर घटकर नौ महीनों के निचले स्तर 6.38 प्रतिशत पर आ गई है लेकिन अनाज विशेषकर दाल, चावल, गेहूँ आदि की बढ़ी हुई कीमतों ने आम आदमी की थाली छोटी कर दी है और उसका प्रोटीन के महत्वपूर्ण स्रोत दाल से रिश्ता टूट गया है! पिछले तीन महीनों में दालें 15 प्रतिशत और चावल 13 प्रतिशत महँगे हुए। गेहूँ का भी जिद्दी स्वभाव बना रहा, इसका मूल्य सूचकांक भी बढ़ा।वर्ष 2009 में दो आशंकाओं की छाया हमें घेरे रहेगी। पहली, सरकार द्वारा 20 लाख टन गेहूँ का निर्यात करने और गेहूँ और चावल का वायदा व्यापार खुलने से महँगाई और बढ़ेगी। दूसरी, इस वर्ष मध्य क्षेत्र में वर्षा की कमी से गेहूँ का उत्पादन कम होने का भय है।वर्ष 2009 के आगाज के साथ ही यह अति आशावादी अवधारणा उपजी है कि मुद्रास्फीति | | बीते वर्ष की वैश्विक आर्थिक मंदी के पतझड़ ने हर किसी को इस कदर विचलित कर दिया है कि रोजगार पाने के इच्छुक वर्ष 2009 में रोजगार का वसंत आने के सपने देख रहे हैं |
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की दर शून्य हो सकती है लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि जब तक दालें पचास रुपए प्रतिकिलो और खाद्यान्न स्थिति 11 प्रतिशत हैं तब तक मुद्रास्फीति शून्य होने की कोई संभावना नहीं। जो शून्य पर लाने का तर्क पेश कर रहे हैं, उन्हें याद होगा कि खाद्यान्न का भार मूल्य सूचकांक में केवल 23 प्रतिशत है, जो वास्तविकता से परे है। हाँ, मुद्रास्फीति को प्रभावित करने वाले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की गिरती कीमतों ने अवश्य राहत दी है।जहाँ तक भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति का संबंध है, वर्ष 2009 में वर्तमान के रेपो रेट, रिवर्स रेपोरेट, नकद आरक्षित राशि और वैधानिक तरलता अनुपात में कमी होने की संभावना है। रिजर्व बैंक का उद्देश्य यह रहेगा कि मंदी से निकलकर अर्थव्यवस्था आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हो, साथ ही, मुद्रास्फीति भी रिजर्व बैंक की आशानुसार पाँच प्रतिशत तक आ सके।बैंकिंग प्रणाली में तरलता देखते हुए बड़ी जमा राशि पर ब्याज की दर घटाई जा सकती है। साथ ही, भारतीय रिजर्व बैंक के सुझाव के अनुसार नए वर्ष में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को तेल एंव फर्टिलाइजर्स बांड जारी करने के बजाय नकद सब्सिडी दी जाएगी।भारतीय निवेशकों ने पिछले वर्ष करीब 450 खरब रुपए का नुकसान उठाया और म्यूचुअल फंड की परिसंपत्तियों का आकार घटकर करीब चार लाख करोड़ रुपए पर आ गया लेकिन आशा की जा रही है कि 2009 में म्यूचुअल फंडों के पास अधिक तरलता होने और पश्चिमी देशों की मंदी के वित्तीय संकट का लाभ उठाते हुए भारतीय कंपनियाँ उत्पादन लागत कम कर और गुणवत्ता बढ़ाकर अधिक निर्यात कर सकेंगी।लगभग 19 प्रतिशत कंपनियों को अगले साल की पहली तिमाही में लाभ होने की उम्मीद है। जहाँ विदेशी कंपनियाँ 10 फीसदी लाभ के लिए जूझ रही हैं, वहीं हमारी कंपनियों ने 50-60 प्रतिशत मुनाफा कमाया है।बीते वर्ष की वैश्विक आर्थिक मंदी के पतझड़ ने हर किसी को इस कदर विचलित कर दिया है कि रोजगार पाने के इच्छुक वर्ष 2009 में रोजगार का वसंत आने के सपने देख रहे हैं। भारत के शीर्ष उद्योगपतियों ने पिछले नवंबर में आशंका व्यक्त की थी कि वर्ष 2009 की प्रथम तिमाही में 25 लाख से अधिक लोगों की नौकरियाँ जा सकती हैं।वर्ष 2008 में अकेले कपड़ा क्षेत्र में 5 लाख लोगों के रोजगार पर वित्तीय संकट का खासा असर दिखाई दिया लेकिन अब भारतीय कारपोरेट सेक्टर, बीमा, बैंकिंग और फाइनेंस, टेलीकॉम, बीपीओ इत्यादि क्षेत्रों में छँटनी के बादल छँटने लगे हैं। लगभग 19 प्रतिशत कंपनियों को अगले साल की पहली तिमाही में रोजगार बढ़ने की काफी उम्मीद है।याद रहे, जहाँ एक ओर बीते दिसंबर के आखिरी सप्ताह में अमेरिका में 6 लाख लोगों ने बेरोजगारी भत्ता लिया और ऐसे लोगों की संख्या 26 वर्षों में सर्वाधिक हो गई, वहीं दूसरी ओर 2009 में भारत के बीमा क्षेत्र में 2 लाख 14 हजार, बैंकिंग क्षेत्र में करीब 50 हजार, इन्फोटेक में 70 हजार, विनिर्माण में करीब 12 हजार और बीपीओ क्षेत्र में 7 हजार अतिरिक्त रोजगार अवसरों की घोषणा हुई है अर्थात इसी नए वर्ष में करीब 3 लाख 40 हजार नई भर्ती की घोषणाएँ हुईं।इस साल सरकार के लिए अच्छे समाचार आने की उम्मीद नहीं है। कर वसूली के जो आँकड़े अब तक प्राप्त हुए हैं उनसे यह संभावना क्षीण होती जा रही है कि 2008-2009 के वित्त वर्ष में प्रत्यक्ष कर वसूली 15 प्रतिशत बढ़कर 3 लाख 65 हजार करोड़ हो जाएगी। इसका कारण यह है कि नवंबर 2008 तक प्रत्यक्ष कर संग्रहण में 37 प्रतिशत की कमी आई।वैश्विक मंदी और ब्याज दरों में वृद्धि के कारण औद्योगिक उत्पादन में कमी की वजह से | | वर्ष 2009 में राजकोषीय घाटा 5 प्रतिशत होने और व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर तक होने के कारण सरकार भी 2009-2010 में विदेशी कर्ज लेने के लिए बाध्य हो सकती है। वर्तमान में विदेशी ऋण का बोझ 221 अरब डॉलर तक पहुँच गया है |
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उत्पाद शुल्क की वसूली में कमी आई है। कच्चे तेल की कीमतें घटने से सरकार कीसीमा शुल्क के संग्रहण में भी गिरावट आई। भुगतान संतुलन के चालू खाते में घाटे के कारण डॉलर के मुकाबले में भारतीय रुपए की कीमत में करीब 25 प्रतिशत की गिरावट आई।इतना ही नहीं, किसानों की कर्ज माफी, ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का विस्तार, छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू करने और विभिन्न प्रकार की सब्सिडी और दूसरी ओर कर संग्रहण में कमी के कारण सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़कर नए वित्त वर्ष में 5 प्रतिशत तक हो जाने की आशंका है। वैश्विक मंदी के कारण विदेशी पूँजी के आगम के जो मुख्य स्त्रोत थे, अब सूखते जा रहे हैं।वर्ष 2009 में राजकोषीय घाटा 5 प्रतिशत होने और व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर तक होने के कारण सरकार भी 2009-2010 में विदेशी कर्ज लेने के लिए बाध्य हो सकती है। वर्तमान में विदेशी ऋण का बोझ 221 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। आय-व्यय की दृष्टि से यह वर्ष चाहे बहुत सुखद न लगे, लेकिन अंततोगत्वा अर्थव्यवस्था के सुधार और आगामी वर्ष सात प्रतिशत की वृद्धि के संदर्भ में सरकार द्वारा बुनियादी सुविधाओं का विस्तार और रोजगार बढ़ाने के नए कदम नई माँग को बाजार में लाएँगे।तब आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन के कई क्षेत्रों में गति मिलेगी। पिछले सप्ताह केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा 45 हजार करोड़ की तरलता बढ़ाने और ऋण बाजार में 1.5 करोड़ डॉलर तक की सीमा बढ़ाने से मुद्रा आपूर्ति बढ़ सकती है जिसका सीधा प्रभाव मुद्रास्फीति पर पड़ेगा। भारत के सभी क्षेत्रों के लिए अवसर है जब वैश्विक मंदी की चुनौतियों को अवसरों में बदला जा सकता है।( लेखक अर्थशास्त्री हैं) |