- पंकज शर्मा अप्रैल में अक्षय तृतीया के आसपास हम पन्द्रहवीं लोकसभा का चेहरा तय करना शुरू करेंगे और मई का तीसरा हफ्ता आते-आते साफ हो जाएगा कि अगले पाँच बरस के लिए किसका निजाम रहेगा। अगली लोकसभा का गठन 1 जून से पहले होना है। छः राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने आने वाले दिनों की बिसात बिछानी शुरू कर दी है।वर्ष 2004 के आम चुनाव में कांग्रेस को 145 सीटें मिली थीं। उसके बाद लोकसभा की करीब | | भाजपा ने 31 राज्यों में 364 उम्मीदवार उतारे थे। 13 राज्यों ने भाजपा को पूरी तरह नकार दिया। उसके 57 उम्मीदवारों ने अपनी जमानतें खोईं। भाजपा के सहयोगी दलों में बाला साहब ठाकरे की शिवसेना का उत्साह भी 2004 के चुनाव में देखने लायक था |
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तीन दर्जन सीटों के लिए हुए उपचुनावों में भी एक-तिहाई पर कांग्रेस जीती है। बावजूद इसके अखिल भारतीयता से दूर होती जा रही राजनीति के खतरे को समझने का यही सही वक्त है।लोकतांत्रिक संयोग भले ही कई छोटे-मोटे राजनीतिक दलों को सरकार का भाग्यविधाता बना देते हों, मगर जमीनी सचाई यह है कि कांग्रेस ही अकेला अखिल भारतीय राजनीतिक दल है जो देश के हर हिस्से में मौजूद है। सन् 2004 के आम चुनाव में कांग्रेस ने 33 राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और उनमें से 26 राज्यों में उसके प्रत्याशी जीते थे। इस मामले में दूसरे क्रम पर भारतीय जनता पार्टी रही जरूर और उसने 18 राज्यों में अपनी जीत दर्ज कराई लेकिन इसका मतलब यह है कि करीब आधे देश में उसकी अब भी कोई उपस्थिति नहीं है।2004 में कांग्रेस ने 33 राज्यों में 417 उम्मीदवार लड़ाए थे। उनमें से 145 जीते। माकपा ने 19 राज्यों में 69 उम्मीदवार खड़े कर दिए। 16 राज्यों में उसका एक भी प्रत्याशी नहीं जीता। उसके 15 उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गईं। भाकपा ने 15 राज्यों में 34 उम्मीदवार लड़ाए। 12 राज्यों में उसे कहीं कोई कामयाबी नहीं मिली। उसके 19 उम्मीदवारों की जमानतें जाती रहीं। शरद पवार की राकांपा ने 11 राज्यों में 32 प्रत्याशी खड़े कर दिए।10 राज्यों में उसका एक भी उम्मीदवार जीत दर्ज नहीं करा पाया और 10 उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गईं। लालूप्रसाद यादव के राजद ने 6 राज्यों में किस्मत आजमाई। बिहार और झारखंड को छोड़कर उसे कहीं कामयाबी नहीं मिली। 42 उम्मीदवार उसने खड़े किए थे। महज 24 जीते और 14 की तो जमानतें चली गईं। मुलायमसिंह यादव का हौसला तो अमरसिंह ने इतना बढ़ा दिया कि 2004 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 23 राज्यों में 237 उम्मीदवार लड़ा दिए।नतीजा यह निकला कि इनमें से 21 राज्यों में उसका एक भी उम्मीदवार नहीं जीत पाया और 169 तो अपनी जमानतें गँवा बैठे। रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ने भी 12 राज्यों में 40 उम्मीदवार खड़े कर दिए। 11 राज्यों में उसके प्रत्याशी बुरी तरह हार गए। 32 की तो जमानतें जाती रहीं। सिर्फ चार जीते और वे भी बिहार में।भाजपा ने 31 राज्यों में 364 उम्मीदवार उतारे थे। 13 राज्यों ने भाजपा को पूरी तरह नकार दिया। उसके 57 उम्मीदवारों ने अपनी जमानतें खोईं। भाजपा के सहयोगी दलों में बाला साहब ठाकरे की शिवसेना का उत्साह भी 2004 के चुनाव में देखने लायक था। उसने 14 राज्यों में 56 उम्मीदवार खड़े कर डाले। महाराष्ट्र को छोड़कर बाकी सभी 13 राज्यों ने शिवसेना को कोई तरजीह नहीं दी। उसके 34 उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गईं।ओमप्रकाश चौटाला के इंडियन नेशनल लोकदल ने भी चार राज्यों में पैर पसारने की कोशिश की और 20 प्रत्याशी लड़ा डाले। जीता एक भी नहीं और 14 की जमानतें जाती रहीं। यूनाइटेड जनता दल को भी लगा कि वह 16 राज्यों में अपने प्रत्याशी खड़े कर सकता है। सो, उसने भी 73 उम्मीदवार लड़ा डाले। 13 राज्यों ने जेडीयू को पाँव रखने लायक जगह भी नहीं दी और उसके 44 उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गईं। मायावती का हाथी भी 2004 में 25 राज्यों के अश्वमेध पर निकल पड़ा था।बहनजी के 435 उम्मीदवार लड़े। सिर्फ 19 जीते और 358 अपनी जमानत-राशि से हाथ धो बैठे। 25 में से 24 राज्यों में लोगों ने हाथी की पूरी तरह अनदेखी कर दी। जनता पार्टी को भी 12 राज्यों में 58 उम्मीदवार खड़े करने की सूझी। जीतना तो कोई क्या था, 57 की जमानतें और जब्त हो गईं। रिपब्लिकन पार्टी तक को लगा कि वह 8 राज्यों में दाँव आजमा सकती है तो उसने भी 18 उम्मीदवार खड़े कर दिए। कोई नहीं जीता। 17 की जमानतें भी जब्त हो गईं।2004 के आम चुनाव में सवा 67 करोड़ लोगों को वोट देने का हक था। 39 करोड़ लोगों ने अपने इस हक का इस्तेमाल किया। राजनीति के केंद्रीय रंगमंच पर अपने नखरे दिखाने वाले राजनीतिक दलों की असलियत यह है कि समाजवादी पार्टी को इनमें से महज 1 करोड़ 68 लाख वोट मिले थे और बहुजन समाज पार्टी को सिर्फ 2 करोड़ 7 लाख वोट।मायावती का हाथी मुलायम की साइकल के मुकाबले देश में 39 लाख वोट ही | | कहने-सुनने में भले ही अच्छा लगता हो कि अब केंद्र में किसी एक राजनीतिक दल की सरकार बनने के जमाने लद गए लेकिन कांग्रेस को छोड़कर बाकी राजनीतिक दलों में अखिल भारतीयता की अनुपस्थिति ही लोकतंत्र की जड़ों का मट्ठा है |
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ज्यादा हासिल कर पाता है। लालू की लालटेन भी इस मामले में बस टिमटिमाती ही रहती है। राजद को 2004 में 39 करोड़ मतदाताओं में से तकरीबन 94 लाख ने ही पसंद किया था। भारी-भरकम मंत्रालयों को अपनी तरफ खींचने में लालू से लोहा लेने वाले रामविलास पासवान की लोजपा को पिछले चुनाव में कुल पौने 28 लाख वोट मिले थे।खेतों की मुंडेर से लेकर हवाई लहरों तक पर राज कर रहे शरद पवार की एनसीपी को 70 लाख के आसपास वोट मिलते हैं और ठाकरे-परिवार 2004 में जब टूटा नहीं था तो शिवसेना को भी 70 लाख से जरा से ही ज्यादा वोट मिले थे। पूरे चार बरस केंद्र की सरकार को अपनी उँगलियों पर नचाने वाली मार्क्सवादी पार्टी को सिर्फ सवा दो करोड़ वोट मिलते हैं और भाकपा को मिलते हैं महज 54 लाख वोट। इस पिछड़े आँकड़े के उलट कांग्रेस को पिछले चुनाव में 10 करोड़ 34 लाख वोट मिले थे।देश की संसदीय राजनीति की अखिल भारतीयता का असली आईना यह है कि बसपा, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, अकाली दल, शिवसेना, एनसीपी और तेलुगुदेशम समेत बड़े और महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों में से दो दर्जन ऐसे हैं, जिनका अपने राज्य से बाहर इतना भी आधार नहीं है कि लोकसभा का एक सदस्य भी उनके नाम पर चुन कर आ सके। राजद और सपा जैसी पार्टियाँ भी दो से ज्यादा राज्यों में उछलकूद नहीं कर पाती हैं। वामदलों की बिसात भी छोटे-बड़े पाँच राज्यों से बाहर नहीं बिछ पाती है।कहने-सुनने में भले ही अच्छा लगता हो कि अब केंद्र में किसी एक राजनीतिक दल की सरकार बनने के जमाने लद गए लेकिन कांग्रेस को छोड़कर बाकी राजनीतिक दलों में अखिल भारतीयता की अनुपस्थिति ही लोकतंत्र की जड़ों का मट्ठा है। देश की तरक्की के बीज तो अंततः अखिल भारतीय मौजूदगी वाले राजनीतिक दलों की मजबूती में ही छिपे हैं।( लेखक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुखपत्र 'कांग्रेस संदेश' के कार्यकारी संपादक हैं।) |