मैं मुंबई हूँ। आप सबकी लाड़ली और चहेती नगरी। आज घायल अवस्था में अस्त-व्यस्त सी खड़ी हूँ। मेरे बाशिंदों की जिन्दगी फिर चल पड़ी है अपनी राह। सरहद पार के कुछ आतंकवादियों ने मुझे लहुलूहान कर दिया है। मेरी आन,बान और शान के लिए मेरे बेटे शहीद हो गए। मेरी गोद में यह पहला हादसा हुआ, हो ऐसा भी नहीं है। इससे पहले भी मेरे ठाट-बाट को नजर लग चुकी है, लेकिन मैं और मेरे बाशिंदें फिर चल पड़ते हैं अपनी जीवटता के साथ। इसी को सब लोग 'मुंबई स्पिरिट' कहते हैं। लेकिन यह सिर्फ मैं और मेरा कलेजा जानता है कि मेरी और मुंबईवासियों की अपनी राह पर चल देने की क्या मजबूरी है।यह 'मुंबई स्पिरिट' नहीं है । यह एक मजबूर महानगर की मजबूरी है। मेरे आँचल में सिर्फ यहीं जन्में लोग ही नहीं सुस्ताते, बल्कि मेरे आँचल की छाँह में हर प्रदेश, प्रांत और नगर के मेहनती व संघर्षशील बच्चे सुकून पाते हैं। हाँ, हुआ करती थी कभी ऐसी 'मुंबई स्पिरिट' भी हुआ करती थी, लेकिन धीरे-धीरे यह कब उनकी लाचारी बन गई पता ही नहीं चला। हादसे-दर-हादसे मेरा मुझसे ही विश्वास डगमगाने लगा। पिछले कुछ दिनों से मैं बेहद परेशान थी। मेरे ही एक लाड़ले ने कहा मुंबई सिर्फ मेरी है, बाकी सब लोग बाहरी हैं और वे बाहर निकल जाएँ। मैं स्तब्ध रह गई कि ये मेरे घर के लोगों में किसने जहर घोला? यहाँ बसने के लिए मैंने तो कभी भाषा, धर्म, प्रांत या मुल्क का सर्टिफिकेट नहीं माँगा।बस जो मेहनती है,कर्मठ है, वह मेरी संतान है। पता नहीं कब मेरी ही संतान आपस में दुश्मन बन बैठी। और फिर वही हुआ जो नहीं होना था ...अनहोनी! सरहद पार से आए दरिंदों ने मेरी गोद पर, मेरे आँचल पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया कि मैं अपनी ही सुरक्षा के लिए बेबस हूँ। भला अपने आँचल में छुपाकर बच्चों को कैसे बचा सकती हूँ? अब तक मेरे बच्चों ने मुझे जतन से सहेजा, हर आक्रमण का मुँह तोड़ जवाब दिया, लेकिन इस बार मैं हार गई। मुझे अपने लाड़ले खोने पड़े। शहीद हो गए मेरे मासूम। हैरान हूँ कि मेरे वे बच्चे जो अपनी अ'राज'नीति के कारण कल तक धमाल मचा रहे थे, अचानक कहाँ गायब हो गए? पता नहीं कहाँ, किस कोने में दुबक गए? सब ढूँढ रहे हैं। खुद मुझे नहीं पता जो उधमी बच्चे अपने ही बंधुओं को खदेड़ने में लगे थे, आज दुश्मनों से दो-दो हाथ करने क्यों नहीं आए? अपनी लड़ाकू ऊर्जा का जब सही जगह इस्तेमाल करने का समय आया तो क्यों बन बैठे 'भगोड़े'? उनके ही अनुसार मैं तो सिर्फ उनकी थी ना? इन सबके बीच पिसकर रह गए मेरे वे मासूम बच्चे जो दिन-रात की अथक मेहनत के बाद एक दिन का खाना जुटा पाते हैं। वे जो एक दिन अपने काम पर ना जाएँ तो उस दिन चुल्हा नहीं मुस्कुराता। एक दिन ऑफिस ना पहुँचें तो दूसरे दिन बिना किसी सूचना के उनकी कुर्सी पर दूसरा ही कोई बैठा मिल सकता है। ये है मुंबई की मजबूरी। एक-एक जगह पर सैकड़ों लोगों के दावे, एक- एक पद पर हजारों लोगों की निगाहें, एक- एक कुर्सी को हथियाने के लिए लाखों लोग बेताब। इतनी सख्त प्रतियोगी परिस्थितियों में मुंबईवासी हादसों के बाद भी अपनी रोजी- रोटी के लिए ना चल पड़ें तो आखिर क्या करें? मेरे अस्तित्व, आत्मसम्मान और अन्तर्मन को छलने वाले ऐसे फैशनेबल शब्दों का प्रयोग मत करो। सचाई का सामना करो और देखो कि मुंबई शहर में मजबूरी इंसान से क्या-क्या नहीं करवाती? एक तरफ है वह लाचार आदमी जो ईमानदारी से संघर्षरत है और दूसरी तरफ है नैतिक रूप से पतनशील आदमी जो धन की हवस में कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। कितना, किस हद तक गिर चुका है मेरे कुछ बाशिंदों का चरित्र यह सिर्फ मैं ही जानती हूँ। बड़े-बड़े होटलों से लेकर छोटे-छोटे रेस्टोरेंट तक अनाचार की कौन सी हद पार नहीं होती? इतिहास गवाह है कि जब किसी भी राज्य के चरित्र, नैतिकता और संस्कृति का पतन होता है, तब वह किसी मामूली आक्रमण का भी सामना नहीं कर सकता और उसके कदम लड़खड़ा जाते हैं। धन की भूख ने मेरे कुछ भटके हुए वासियों को बदहवास कर रखा है। वे इन नेताओं की तरह ही इतने बेगैरत हो गए हैं कि अपनी ही माँ को बेच आने में भी उन्हें शर्म नहीं आती। यहाँ क्या नहीं होता? तस्करी, देह व्यापार, नशाखोरी, हिंसा, अपराध, माफिया और भी ना जाने क्या-क्या। इन सबमें डूबे लोगों को भला कब इतनी फुर्सत कि ध्यान रखें मेरा और देखें कि कब, किस दिशा से कौन प्रवेश कर रहा है? अफसोस जताने वाले भी जानते हैं कि गले-गले तक गलत कामों में मशगूल उन्हें कभी समय नहीं मिला अपनी ही सुरक्षा के बारे में सोचने का। मेरा आप सभी से निवेदन है कि मेरी और मेरे वासियों की व्यथा को समझने की कोशिश करें।अपराध के रास्ते चल पड़े लोगों से मेरे परिश्रमी बच्चों को बचाओ। 'मुंबई स्पिरिट' में छुपी मेरी और मेरे वासियों की विवशता को महसूस करें। मेरी युवा शक्ति को अटकने और भटकने से बचाने की मेरी अव्यक्त गुहार को ध्यान से सुनें। आज मेरा सारा ऐश्वर्य सहेजने की जरूरत है। मुझे बाहर से ज्यादा भीतर से खतरा है। मेरे अपने भीतर बहुत सी ऐसी चीजें पनप रही हैं, जो मुझे खोखला किए दे रही हैं। मैं अब आपके भरोसे हूँ, समझो मेरा दर्द। बस इतना ही ....सिर्फ तुम्हारी सदैव सी मुंबई |