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बेशर्म नेताओं की बेशर्म जुबान
काश, कि तुम डूब मरों
स्मृति जोशी
  सारे नेता चाहे वे किसी भी पार्टी के हों? एक बात को बहुत ध्यान से सुन और समझ लें कि आज वे सब सड़क पर खड़ें हैं। उनके सारे भेद खुल चुकें हैं। आज देश का बच्चा-बच्चा उनके नाम पर गालियाँ दे रहा हैं ....      
कौन समझेगा उस पिता की अव्यक्त पीड़ा को जो छटपटाकर नेता को बाहर का रास्ता दिखाने को बाध्य हो जाती है? स्तब्ध हैं सारे देशवासी केरल के सीएम के बयान को सुनकर कि अगर संदीप उन्नीकृष्णन शहीद नहीं होते तो ----- भी उनके दरवाजे नहीं आता । उफ, जिस शब्द को मेरी लेखनी अपनी नोक पर लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही वह एक बेशर्म नेता की जुबाँ पर किस बेशर्मी से आ गया? सोच-सोच कर सब हैरान हैं ।

ये वही भिक्षुक हैं ना जो हर पाँच वर्ष में रंग बदलते हैं? ये वही झूठों के सरताज हैं ना जो चुनाव के वक्त अपनी वादों की पिटारी खोल कर तमाशा दिखाने बैठ जाते हैं और हम जनता उस खेल को देखने भी जुट जाती है। वह वोट जो हम लोकतंत्र की लाज बचाने के लिए धूप में कतारबद्ध खड़े हो कर इन्हें अर्पित करते हैं।

वह वोट जिसके बदले हमें मिलती है बिजली की कटौती , पानी की किल्लत और सड़क की जर्जरता । और ये वही नेता हैं जिन्हें हमारे इस एक बेशकीमती वोट के बदले मिलती है लाल बत्ती की गाड़ी ,सुरक्षा गार्ड, आलीशन बंगले, नौकर और सुख-सुविधाओं का जखीरा । इन्हें तो भिक्षुक कहना भी मुझे गवारा नहीं क्योंकि भिक्षुक भिक्षा प्राप्ति के बाद आशीर्वाद देकर जाते हैं ।

ये बेगैरत, लंपट नेता जंगलों में फिंकवा कर जानवरों से नुचवाने के लायक हैं। इस समय देश की जनता आक्रोशित है। अगर उसका बस चले तो वे चौराहे पर केरल के सीएम वी. एस. अच्युतानन्द को एक हजार कोड़े की सजा सुना दे पर अफसोस की उनका कोई बस नहीं है ,वह बेबस है क्योंकि वह जनता है।

कब, आखिर कब इस देश के नागरिकों का गुस्सा साझा बनकर इन नेताओं का आतंक बनेगा ? लोकतंत्र में लोगों का तंत्र इतना प्रभावी तो होना ही चाहिए कि किसी भी नेता की जुबान शहीदों को गाली देने से पूर्व गल कर गिर जाए ।

देश के मासूम सपूत इस देश की रक्षा के लिए कुर्बान हो गए और हमारे नेताओं के मुँह से ऐसी मिट्टी झर रही है।

मुझे समझ नहीं आता कि किस मिट्टी के बने हैं ये घृणित नेता जिन पर किसी भी गाली का असर तो होता नहीं उल्टे बेलगाम जुबान से समय, मौका और परिस्थितियों को ना समझते हुए ऐसी शर्मनाक बयानबाजी करते हैं। शहीद उन्नीकृष्णन के पिता ने तो सिर्फ घर से निकाला है अगर और कोई होता तो शायद जूतों से इनका स्वागत करता ।

ऐसी भाषा का प्रयोग करना संस्कार नहीं हैं लेकिन अगर मेरे देश के शालीन (?) नेता इतना भी नहीं जानते कि एक शहीद के परिवार की व्यथा को समझते हुए संवेदना प्रकट करने का तरीका क्या है तब तो उन्हें इसी तरह की भाषा में समझाना होगा, यही उनके स्तर की है ।

क्या केरल के मुख्यमंत्री को इस दर्द का अहसास भी है कि अपने इकलौते बेटे को राजनीतिक दुर्बलता के चलते खो देना कैसा होता है? क्या बेहतर यह नहीं होता कि वे सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना करते हुए कहते कि मैं शहीद के पिता की पीड़ा समझ सकता हूँ और इस समय उनका गुस्सा जायज है। मैं उनके गुस्से का सम्मान करता हूँ । लेकिन नहीं, ये क्या अपेक्षा कर रही हूँ मैं इस देश के नेताओं से?

मुझे लगता है अगर इस देश के नागरिकों के हाथ में आतंकवादियों के जब्त हथियार पहुँच जाएँ तो दावा है कि उनका आश्चर्यजनक रोष सामने आएगा और नेता(?) कहे जाने वाले ये सारे लिजलिजे लोग संसद तक पहुँचने से पहले ही वहाँ पहुँचा दिए जाएँगे जहाँ इन्हें बहुत पहले पहुँच जाना चाहिए था ।

भूल गए केरल के सीएम कि ये वही शहीद हैं जो संसद पर हुए हमलें के वक्त नेताओं के तारणहार बने थे। अगर उस समय पता होता कि बाद में नेता यूँ भस्मासुर की शक्ल में सामने आएँगे तो उसी दिन एक साथ सबको आतंकवादियों के हवाले कर देते ।

सारे नेता चाहे वे किसी भी पार्टी के हों? एक बात को बहुत ध्यान से सुन और समझ लें कि आज वे सब सड़क पर खड़े हैं। उनके सारे भेद खुल चुके हैं। आज देश का बच्चा-बच्चा उनके नाम पर गालियाँ दे रहा है। देश की अवाम इन सफेदपोश काले लोगों की सचाई जान चुकी है।

देश की जनता अब इन्हें सुधरने और सम्हलने का मौका भी नहीं देना चाहती । इनकी झूठी माफी भी उन्हें मंजूर नहीं। सारा देश इस समय संदीप उन्नीकृष्णन के पिता के साथ-साथ सभी शहीदों के परिवार के दर्द को गहराई से महसूस कर रहा है। मुझे लगता है सभी बड़बोले नेताओं पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए। लेकिन नेताओं के अपराध के आगे वह भी बहुत छोटा है।

आज पड़ोस की एक अम्मा ने मुझसे कहा काश कि ये सारे नेता कहीं जाकर डूब मरे।

मैं भी यही कहना चाहती हूँ काश, कि तुम डूब मरों।
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