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आखिर इसमे खुश होने वाली बात क्या है?
पुलिस, सेना और एनएसजी कमांडोज के बल पर मुंबई में घुसे पाकिस्तानी आतंकवादियों को खत्म कर दिया गया और सभी स्थानों से आतंकवादियों को मार गिराया गया।

इन स्थानों पर मौजूद लोगों ने सेना और पुलिस बलों की जय जयकार की और भारत माता की जय के नारे लगाए गए। समूची मीडिया में जय हिंद, जय हिंदुस्तान, आतंकवाद जमींदोज, आतंक की जंग पर जीत जैसे शीर्षकों की बाढ़ आ गई।

यह सच है कि सुरक्षा बलों के दम पर हमने आतंकवादियों को मार गिराया पर क्या राष्ट्रवादी भावनाओं के उफान में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आतंकवा‍दी ठीक उसी तरह से थे जैसे कोई डाकू आपके घर में घुस आए और उनसे बचने के लिए आपको उन्हें मारना पड़े। तब क्या आप जश्न मनाएँगे?

क्या यह जीत ऐसी नहीं है जिसके लिए हमने इसकी भारी कीमत नहीं चुकाई है? इस हमले में मुंबई पुलिस के तीन बड़े अधिकारियों समेत 14 पुलिसकर्मी शहीद हुए हैं।

एनएसजी के दो कमांडोज मारे गए जिनमें से एक मेजर संदीप उन्नीकृष्णन भी थे। नरीमन हाउस में दो आतंकवादियों के सफाए के साथ छह बंधकों के भी शव मिले थे। आतंकवादियों की गोलियों से 181 लोगों की मौत हो चुकी है। सैकड़ों लोग घायल हुए हैं और इनमें सेना, पुलिस और एनएसजी के कर्मी भी शामिल हैं।

क्या यह गर्व करने लायक बात है कि 10-20 आतंकवादी घातक हथियार लेकर कई दिनों तक कई स्थानों पर लोगों को मारते रहें और उनके मारे जाने पर हम खुशी से फूले न समाएँ।

ये आतंकवादी शानदार और सुरक्षित होटलों में घुसकर सैकड़ों लोगों को बंधक बनाते हैं और उन्हें मारते जाते हैं। बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों को भी संभलने का मौका दिए बिना ही मार गिराया जाता है। सत्ता और विपक्षी नेताओं को साँप सूँघ जाता है।

सैकड़ों पुलिस अधिकारियों और सेना के जवानों के साथ चूहे बिल्ली का खेल शुरू होता है जोकि कई दिनों तक चलता रहता है। लेकिन जब 9 या 10 आतंकवादी मार गिराए जाते हैं तो आप गर्व से भरे होते हैं और देशभक्ति का जुनून, जब्जा और जोश की जीत पर फूले नहीं समाते।

क्या हमने आतंक पर हमेशा के लिए जीत पा ली है? क्या हम आश्वस्त हो सकते हैं कि अब आगे से आतंकवादी हमले हो नही सकते हैं? क्या हम इस बात पर भी गर्व करें कि हमारी खुफिया एजेंसियों ने नौ सेना के सूत्रों, कोस्ट गार्ड और राज्य पुलिस को सूचित कर दिया था कि हमला हो सकता है फिर भी हम इसे रोकने की बजाय हमला करवाने में सफल रहे? हम यह क्यों नहीं सोचते कि आतंकवादियों ने पूरी दुनिया के मीडिया को समय दिया कि वह इस घटना को कवर करे।

आतंकवादियों की अगर इच्छा होती तो वे और भी बंधकों को मार सकते थे और होटलों को जमींदोज कर सकते थे लेकिन अगर ऐसा नहीं हो सका तो मात्र इसलिए क्योंकि आतंकवादियों का जितना ध्यान लोगों की हत्या करने पर था, उतना ही ध्यान इस बार भी था कि इस घटना को एक मीडिया इवेंट बनाकर सारी दुनिया को दिखाया जाए।

मीडिया के रिपोर्टर्स चीख चीखकर एक एक गोली चलने का हिसाब बताते रहे पर आप इसे आतंक पर जीत बता रहे हैं। संसद पर हुए आतंकवादी हमलों के बाद भी ऐसा ही दावा किया गया था।

अहमदाबाद, बेंगलुरू, जयपुर और अन्य स्थानों पर भी आतंकवादी हमले हुए और हमने ऐसे ही दावे किए थे मानो आतंक का खात्मा हमेशा के लिए कर दिया गया? लेकिन बोतल का जिन्न बार-बार हमारे सामने खड़ा हो जाता है। हम किसी तरह बोतल का ढक्कन बंद करने को अपनी जीत समझ लेते हैं।

लकिन हमारे नेता हैं कि पोटा, अफजल को फाँसी को इसका अचूक इलाज बता रहे हैं, जबकि उन्हें इस बात का अंदाजा होना चाहिए कि जो लोग इस तरह की गतिविधियों में भाग लेते हैं, उनका एक ही उद्‍देश्य होता है कि खुद मरकर अपने कथित दुश्मन का ज्यादा से ज्यादा नुकसान करना। क्या ये आतंकवादी ऐसा करने में सफल नहीं रहे? क्या मौत का डर इन आतंकवादियों को हमला करने से रोक सका? पर हमारे राजनीतिज्ञ हैं कि मुस्लिम आतंकवाद के नाम पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं और मालेगाँव मामले में गिरफ्तारी के लिए उसी हेमंत करकरे को कोसने से बाज नहीं आते जोकि मुंबई आतंकवादी हमले में शहीद हो जाता है।

एक मुख्‍यमंत्री तो उनके घर मरणोपराँत पुरस्कार देने तक पहुँच गया और पोटा के नाम को रोने वाला यह मुख्‍यमंत्री भूल जाता है कि आतंकवादी हमलों के लिए जो गोला बारूद आता है वह गुजरात की सीमा से होकर भी आता है जहाँ देश के तथाकथित राष्ट्रवादी नेताओं की सरकार है।

ऐसा भी नहीं है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ सरकार के मंत्री और शीर्ष पदों पर बैठे लोग नाकारा,लापर वाह और हद दर्जे के भ्रष्ट नहीं हैं? यह कहना गलत ना होगा कि सत्ता के केन्द्र और इसके बाहर बैठे नेता और सत्ता पाने की आस लगा रहे नेता दोनों ही ऐसी स्थितियों के लिए जिम्मेदार हैं, भले ही ये लोग यह बात मानें या न मानें।

इसलिए भावावेश में ऐसे क्षणों में सेना के कमांडोज, पुलिस अधिकारी हमारे आदर्श और हीरो बन जाते हैं जबकि सब कुछ सामान्य होने पर हमारे नेता बाल ठाकरे और राज ठाकरे जैसे बने रहते हैं जोकि लोगों को बाँटने के लिए यहाँ तक कहते हैं कि मुंबई में अगर गुंडा और दारू की अवैध भट्‍टी लगाने वाला हो तो वह भी मुंबईकर होना चाहिए।

जिस दिन ये नेता यह कहने लगेंगे कि मुंबई को बचाने वाला देश का कोई भी नागरिक कहीं का भी हो सकता है और मुंबईकर देश को बचाने के लिए देश के किसी भी हिस्से में जाकर अपनी जान दे सकता है, तभी यह देश और इसके नेता सुधर जाएँगे।
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