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आग तो लोगों के दिलों में भी धधक रही है
हमले की घटना पर विभिन्न ब्लॉगरों के विचार
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कहने की जरूरत नहीं कि भारत आतंकवाद को लेकर जो राजनीति करता रहा है उसमें वह दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति नहीं दिखाई दी है जो इस गंभीर समस्या को लड़ने के लिए जरूरी है। एक ब्लॉगर हैं सतीश पंचम। उनकी चिंता जायज लगती है।

सफेद घर में सतीश पंचम आतंकवाद की जड़ों में मट्ठा डालने में देर हो गई शीर्षक पोस्ट में लालकृष्ण आडवाणी की आलोचना करते हुए लिखते हैं कि मुंबई के आतंकी घटना के मूल में हमारा भ्रष्ट राजनीतिक इतिहास रहा है।

आडवाणी को आज कहते सुना कि ये 1993 का ही Continuation है, लेकिन आडवाणी शायद भूल गए कि 1993 की जड़ में वही राममंदिर था जिसके दम पर उन्होंने सरकारी सुख भोगा था। और आगे बढ़ें तो उस राममंदिर के मूल में हिंदू-मुस्लिम फसाद था जो आजादी के वक्त बहुत कुछ हमारे राजनीतिज्ञों की दूरदृष्टि में कमी की वजह से पनपा था।

फसाद के जड़ में यदि शुरुआत में ही मट्ठा डाल दिया जाता तो ये आतंकवाद का विषवृक्ष पनपने न पाता। रही बात अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की, तो वह भी इसी तरह के जैसे मसलों की उपज है। बस उसकी जड़ों में मट्ठा डालने में देर हो गई है। अब ये आतंकवाद का वृक्ष कब तक फलेगा-फूलेगा, समझ नहीं आ रहा।

आतंकवाद से न लड़ पाने की अक्षमता से लोग दुःखी भी हैं, क्रोधित भी। वे चाहते हैं कि इसका कोई ठोस इलाज हो। इसीलिए कुछ ब्लॉगर कहते हैं कि हमें आतंकवाद से लड़ने के लिए अमेरिका से प्रेरणा लेना चाहिए। उसी से इच्छाशक्ति हासिल करना चाहिए।

कुछ ईश्वर की कुछ इधर की ब्लॉग पर डीके शर्मा कहते हैं- हमारा देश राजनीतिक इच्छाशक्ति में सचमुच नपुंसक ही साबित हुआ है। अरे अमेरिका से ही कुछ सीख लो। 9/11 के बाद उनके देश में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने आतंकवादियों के आकाओं तक को सबक सीखा दिया। आप से तो एक अफ़ज़ल गुरु को फाँसी नहीं दी जाती तो ठोस क़दम क्या उठाओगे।

भगवान के लिए वोटों की राजनीति बंद कीजिए और देश के बारे में कुछ सोचिए। देश ही नहीं रहेगा तो राज़ किस पर करोगे। अब जाने से पहले एक बार तो अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते जाइए, ताकि हम भी फख्र से कह सकें कि हमारी रीढ़ में पानी अभी बाकी है।

लेकिन कुछ ब्लॉगर्स इस हमले के मद्देनजर कुछ तीखे सवाल उठाते हैं। धीरू सिंग अपने ब्लॉग दरबार में एक आग उगलता शीर्षक लगाकर कुछ सवाल पूछते हैं। उनका शीर्षक है अगर आतंक से निजात पाना है तो एक ही रास्ता है पाकिस्तान पर। और उनके सवाल ये हैं-

क्या अब भी कसर बाकी है ?

क्या यह हमला हमारे कान खोलने को काफी नहीं है ?

कितनी लाशें देखने के बाद हमारी नींद खुलेगी ?

क्या हमारा खून पानी हो गया है ?

क्या अब भी आतंक की विवेचना करनी पड़ेगी ?

क्या पाकिस्तान की साजिश को साबित करना वोट बैंक पर भारी पड़ता है ?

खट्टी-मीठी ब्लॉग पर कामोद लिखते हैं राजनीति और विशेषकर वोट की राजनीति ने कड़े फैसले लेने से हमेशा रोका है। संसद पर हमले के दोषी पाए गए अफज़ल गुरु को फाँसी की सज़ा दिए जाने के बाद भी आज वो जिन्दा है। आखिर क्यों??

क्यों नहीं भारत में अमेरिका की तरह कड़े फैसले लेने का साहस है? क्यों भारत में देश की सुरक्षा के नाम पर खिलवाड़ होता है जबकि अमेरिका में सुरक्षा के लिए भारत के रक्षा मंत्री के कपड़े उतारने से भी परहेज नहीं किया जाता है?

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क्यों भारत में वोट की राजनीति खेली जाती है जबकि वहाँ विरोध के बाद भी इराक के राष्ट्रपति को फ़ाँसी दे दी जाती है? इसी तरह की भाषा में सुर से सुर मिलाते हुए हथौड़ा पर अंशुमाल रस्तोगी क्रोधित होकर लिखते हैं कि क्या हम जनता सिर्फ यूँ ही मरते रहने के लिए है?

आखिर हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या हमारा वोट सिर्फ उन्हें राजा बनाने तक ही सीमित होकर रह गया है? वोट जनता के और सुरक्षा नेताओं-मंत्रियों की! उन सैनिकों का क्या जो अपनी हिफाजत के लिए नहीं, हमारी-आपकी हिफाजत के लिए हर पल मुस्तैद रहते हैं।

उनकी चिंता कौन करेगा? उनके परिवारों की फिक्र किसे है? बस, इंतजार कीजिए। इस हमले पर भी राजनीति होगी। बहुत बेशर्मी के साथ होगी। आतंकवाद के पुतले यहाँ-वहाँ फूँके जाएँगे। बस, कड़े शब्दों में ही निंदा होगी।

जिन्हें शहीद होना था, वे हो गए। अब यह हम जनता को ही तय करना है कि हम नेताओं या सरकार के सहारे रहें या फिर अपनी ही कोई 'कठोर रणनीति' बनाएँ आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए।

इसके अलावा कुछ ब्लॉगरों ने कविता के जरिए अपने भाव व्यक्त किए हैं। पूनम ने अपने ब्लॉग पर कविता के जरिए अपना गुस्सा जताया है।
उनकी कविता की आखिरी पंक्तियाँ ये हैं -

बर्दाश्त नहीं हो पाता है
एक भी हमवतन का रक्त बहे
नेता जान बचाएँ अपनी और
बार-बार हम ज़ुल्म सहें'

अनवरत ब्लॉग पर दिनेशराय द्विवेदी की कविता का एक अंश-

हम सिर्फ भारतीय हैं, और
युद्ध के मोर्चे पर हैं
तब तक हैं जब तक
विजय प्राप्त नहीं कर लेते
आतंकवाद पर।
एक बार जीत लें, युद्ध
विजय प्राप्त कर लें
शत्रु पर।
फिर देखेंगे
कौन बचा है? और
खेत रहा है कौन ?
कौन कौन इस बीच
कभी न आने के लिए चला गया
जीवन यात्रा छोड़कर।
हम तभी याद करेंगे
हमारे शहीदों को,
हम तभी याद करेंगे
अपने बिछुड़ों को।
तभी मना लेंगे हम शोक,
एक साथ
विजय की खुशी के साथ।

  जिन्हें शहीद होना था, वे हो गए। अब यह हम जनता को ही तय करना है कि हम नेताओं या सरकार के सहारे रहें या फिर अपनी ही कोई 'कठोर रणनीति' बनाएँ आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए।      

और अंत में गीतकार की कलम ब्लॉग पर राकेश खंडेलवाल लिखते हैं -

कब तक नगर जलेगा ? शासक वंशी में सुर फूँकेंगे

कब तक शुतुर्मुर्ग से हम छाए खतरों से जूझेंगे

कब तक ज़ाफ़र, जयचन्दों को हम माला पहनाएँगे

कब तक अफ़ज़ल को माफ़ी दे, हम जन गण मन गाएँगे

सोमनाथ के नेत्र कभी खुल पाए अपने आप कहो

उठो पार्थ गाण्डीव सम्भालो, और न कायर बने रहो

जो चुनौतियाँ न स्वीकारे, कायर वह कहलाता है

और नहीं इतिहास नाम के आगे दीप जलाता है ।


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