यह खबर जितनी सुखद है कि 2005 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार हिन्दी के ख्यात कवि कुँवर नारायण को दिया गया है उसी तरह यह खबर भी उतनी ही सुखद है कि ब्लॉग दुनिया ने साहित्य-समाज की इस बड़ी खबर को त्वरित सम्मान दिया। कुँवर नारायण हिन्दी के शायद एकमात्र ऐसे कवि हैं जिन्हें कोई पुरस्कार मिलने पर कोई विवाद नहीं होता। यह इसलिए संभव हुआ है कि उन्होंने अपने जीवन विवेक और कविता विवेक से यह गरिमा और सम्मान हासिल किया है। हम जानते हैं कि हिन्दी में पुरस्कारों की राजनीति होती रही है और पुरस्कार हासिल करने के लिए निहायत ही गैर साहित्यिक कार्यक्रम अनवरत जारी रहते हैं लेकिन इस बार कुँवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर यदि कोई विवाद नहीं हुआ है तो इसका एकमात्र कारण उनका अपना निजी व्यक्तित्व और कवि-व्यक्तित्व है। कुँवर नारायण की कविता जहाँ एक ओर अपने समकालीन समय से संयमित रहते हुए रचनात्मक मुठभेड़ करती है वहीं दूसरी ओर वह अपनी समकालीन यथार्थ को अभिव्यक्त करने के लिए मिथकों और उपनिषदों का सहारा लेती है। वह एक तरफ निहायत समकालीन होते हुए अपने निजी और सार्वजनिक जीवन को पूरी मार्मिकता से रचती है वहीं अपनी क्लासिकी में कविता का रचाव और गरिमा हासिल करती है। चक्रव्यूह, परिवेश हम-तुम, कोई दूसरा नहीं, आत्मजयी और वाजश्रवा के बहाने अपने कविता संग्रहों और प्रबंध काव्य में उन्होंने यह सहज ही दर्शाया है कि उनकी कविता किन चीजों से मिलकर बनी है और इस बनने में वह किन मिथकों, इतिहास, उपनिषद का स्पर्श करते हुए किस तरह अपने समय की परतों को उघाड़ती-विश्लेषित करती चलती है।यही कारण है कि उन्हें ज्ञानपीठ मिलने पर समूचे हिन्दी संसार को बेहद खुशी हुई है। इस खुशी को और कवि तथा उनकी कविता के प्रति सम्मान को ब्लॉग दुनिया में बाआसानी देखा-महसूस किया सकता है। इस दुनिया में सबसे पहले ध्यान खींचता है अनुराग वत्स का ब्लॉग सबद। यहाँ पर कुँवर नारायण पर अनुराग एक सारगर्भित टिप्पणी करते हुए कुँवर नारायण की दो नई कविताएँ पोस्ट करते हैं। वे लिखते हैं कि अस्सी पार भी उनकी दिनचर्या किसी स्कूली छात्र जैसी है। आँखों की रोशनी कम पड़ने के बावजूद अपनी डेस्क से लगकर वे किताबें लैंस के सहारे देर तक पढ़ते हैं। हजारों पृष्ठों में फैली अपनी अनछपी रचनाओं का सख्ती से संपादन करते हैं। साहित्यिक गोष्ठियों से लेकर सिनेमा तक में उनकी दिलचस्पी और शिरकत अब तक बरकरार है। इन दिनों वे आलोचना की दूसरी पुस्तक पर काम कर रहे हैं। साथ ही एक नया कविता-संग्रह भी आकार ले रहा है। |