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सामंती दमन की मानसिकता
- डॉ. हरिओ

उत्तरप्रदेश के ग्रामीण अंचलों में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन की हकीकत जानने के दौरान मेरे सामने ऐसी अनेक घटनाएँ हुईं जिनसे पंचायती राज संस्थाओं के जरिए ग्रामीण भारत के चौमुखी विकास के मंसूबों की असफलता साफ साबित होती है। पूर्वांचल के अत्यंत पिछड़े जनपद के दूरस्थ एवं बेहद पिछड़े हुए गाँव की एक घटना मुझे याद आ रही है।

इस गाँव में गरीब पोल जातियों की बहुत बड़ी आबादी रहती है। आदिवासियों जैसी परिस्थितियों में जीवन-यापन करने के बावजूद उत्तरप्रदेश में यह जाति अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्य नहीं है। बहरहाल, इस जाति के अधिकांश परिवारों को आज भी शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य एवं स्वच्छ पेयजल जैसी सुविधाएँ उपलब्ध नही हैं। उनके नाम से सरकार द्वारा दी गई सुख-सुविधाओं का स्थानीय स्तर पर बड़ी जातियों द्वारा ही उपभोग किया जाता है।

जन-चौपाल में कई बार पूछने पर एक पोल महिला ने खड़े होकर कहा कि ग्राम प्रधान गरीबों के कल्याण के लिए चलाई जा रही योजनाओं का लाभ देने के एवज में पैसे की माँग करते हैं। जो पैसा नहीं देता, उसे कुछ भी नहीं मिलता। चौपाल में 1000 के आसपास ग्रामीण स्त्री-पुरुष मौजूद थे किंतु किसी ने भी ग्राम प्रधान के विरुद्ध, जो ऊँची जाति का था, शिकायत करने का साहस नहीं किया था।

दरअसल, ग्राम प्रधान तो उसकी पत्नी थी लेकिन सभी व्यावहारिक कामों के लिए ग्राम प्रधान वही था। अब तक प्रधान पति ही मेरे सामने गाँव में कराए गए अभूतपूर्व विकास कार्यों का ब्योरा प्रस्तुत कर रहा था। जिला कलेक्टर के सामने चौपाल के आखिरी समय में अपनी शिकायत सुनने से वह काफी क्रोधित एवं व्यग्र दिखा।

पोल महिला ने यह भी कहा कि पंचायत चुनाव में प्रधान को वोट न देने के कारण उसके परिवार को उसके घर के सामने लगे हुए हैंडपंप से पानी नहीं लेने दिया जाता। इतने बड़े जन समूह के सामने उस महिला द्वारा प्रधान के पति की शिकायत एक जोखिम का काम था। मैंने प्रधान के पति को इस संबंध में आवश्यक हिदायत देकर चौपाल समाप्त कर दी। मुझे लगा कि आगे से उस महिला को हैंडपंप से पानी लेने से कोई नहीं रोकेगा किंतु मेरा सोचना गलत था।

बाद में पता चला कि मेरे जाने के बाद उस महिला, उसके पति और उसकी बेटी की जमकर पिटाई की गई। इस घटना से सबसे पहला सवाल तो यही पैदा होता है कि सामंती और जातीय दमन की यह मानसिकता कैसे और क्यों है, जो अपने विरुद्ध उठने वाली साधारण से साधारण आवाज को भी दबा देना चाहती है?

दूसरा यह कि सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना के विकास के लिए चलाए गए इतने अभियानों के बावजूद समाज की गरीब और कमजोर आबादी अपने ऊपर हो रहे अन्याय एवं शोषण को लेकर इतनी खामोश और उदासीन क्यों है? तीसरा सवाल यह कि कानून का शासन स्थाापित करने वाली संस्थाएँ आजादी के इतने वर्षों के बाद भी दमित और उत्पीड़ित जनमानस में अपनी विश्वसनीयता क्यों कायम नहीं कर पाई हैं? (लेखक प्रशासनिक सेवा में हैं।)
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