-महेन्द्र तिवारी
छोटे परदे पर इन दिनों म्यूजिकल रियलिटी शो की भरमार है। हर मनोरंजन चैनल 'टैलेंट हंट' के नाम पर नौसिखियों की भीड़ इकट्ठा कर टीआरपी की दौड़ में खुद को बीस साबित करने पर तुला है।
हकीकत से कोसों दूर ये कार्यक्रम नवोदित कलाकारों को भले ही आगे लाने का दम भरते हों, लेकिन असल में इनका मकसद शुद्ध रूप से जनता की भावनाओं को भुनाना ही होता है।
प्रतियोगियों को लेकर निर्णायकों की तनातनी, गायक-गायिकाओं के बीच तकरार और शो से बाहर हुए कलाकारों की विदाई के वक्त घड़ियाली आँसुओं की बाढ़..। ये कुछ ऐसे हथकंडे हैं, जिनका इस्तेमाल आयोजक शो की लोकप्रियता में भरपूर करते हैं।
जहाँ तक इन कार्यक्रमों के विजेताओं के करियर का सवाल है, सोनू निगम, श्रेया घोषाल और सुनिधि चौहान को छोड़ दें तो अमूमन हर दूसरा कलाकार फिल्म इंडस्ट्री में खुद को स्थापित करने में अभी भी जद्दोजहद कर रहा है। किसी ने दो एलबम बाजार में उतारे हैं तो कोई भीड़ में एकाध गीत गाकर दोबारा इन शो के मंच की शोभा बढ़ा रहा है।
एक अमेरिकी कार्यक्रम की तर्ज पर बनाए गए मशहूर रियलिटी शो इंडियन ऑइडल का चौथा दौर हाल ही में सोनी चैनल पर फिर शुरू हुआ है। इसके पुराने विजेता गायक-गायिकाओं में से कुछ दूसरे चैनल पर प्रसारित इस तरह के अन्य कार्यक्रमों की मेजबानी कर रहे हैं तो कुछ गुमनाम हैं।
सोनी के पहले इंडियन ऑइडल के विजेता अभिजीत सावंत 'आपका अभिजीत', 'यारों' और 'जुनून' म्यूजिक एलबम निकालकर स्टार प्लस के रियलिटी शो 'जो जीता वही सिकंदर' में फिर माइक पकड़ते नजर आए।
आपका अभिजीत के अलावा उनके दोनों एलबम कुछ खास नहीं कर पाए। आज भी वे एक अदद हिट के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं। सोनू निगम को अपना आदर्श मानने वाले इंडियन ऑइडल के उपविजेता राहुल वैद्य ने मायानगरी की खाक छानने के बाद शो का होस्ट बनना ही मुनासिब समझा। इन दिनों वे डांस शो 'आजा माही वे' की मेजबानी कर रहे हैं।
राहुल के सफर पर निगाह डालें तो उनकी झोली में साजिद-वाजिद के निर्देशन में बना एलबम 'तेरा इंतजार', 'शादी नंबर वन' में श्रेया घोषाल के साथ एक गाना 'दिल डोला...' और इंडियन ऑइडल में उनकी साथी प्राजक्ता शुक्रे के साथ 'हैलो मेडम' गीत आया है। बहुत कम संगीतप्रेमी जानते हैं कि राहुल फिल्म 'क्रेजी-फोर' और 'हॉट मनी' में भी किस्मत आजमा चुके हैं।
उनकी 'बेकारी' का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 'जो जीता वही सिकंदर' के बाद उन्हें सहारा वन के 'झूम इंडिया' में भी उद्घोषक (एंकर) का किरदार निभाना पड़ा। हालाँकि न तो एलबम इतना चला और न ही शादी नं. वन से उन्हें पहचान मिल पाई।
इसी शो के अन्य प्रतियोगी अमित साना का चेहरा भी 'चल दिए' और 'यादें' म्यूजिक एलबम के बाद कहीं नहीं दिखाई दिया। इन सबके अलावा प्राजक्ता शुक्रे, अमित पॉल, चैंग, मोनाली और इंडियन ऑइडल-3 के विजेता प्रशांत तमांग शो के बाद गायब से हो गए।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि करोड़ों लोगों के एसएमएस और तमाम ड्रामे के बाद स्टार बनाने के दावे करने वाले ये चैनल प्रतिभाओं को कौन-सा मंच दे रहे हैं। क्यों इतने तामझाम कर जनता के जज्बातों से खेला जा रहा है।
आधार ही गलत : कहने को ये रियलिटी शो हैं, मगर इनमें हकीकत जैसी कोई चीज नहीं है। कारण, सारे गायक-गायिका फिल्मी गानों पर खुद की प्रतिभा दिखाते हैं। इसे लेकर स्वर कोकिला लता मंगेशकर भी सवाल उठा चुकी हैं। उनका कहना है कि प्रतियोगियों को मौलिक गीत ही गाना चाहिए। इनके जरिये ही कलाकारों की काबिलियत पता चलेगी। गाए हुए गीतों को कोई भी गा सकता है।
बेकाम निर्णायक : ज्यादातर शो के निर्णायक वे लोग होते हैं, जिनके पास या तो काम नहीं है या वे 'चुके' हुए हैं। सारेगामापा के इस्माईल दरबार को ही लें। 'हम दिल दे चुके सनम' और 'देवदास' के बाद इस्माईल कोई भी बड़ी हिट देने में नाकाम रहे हैं। पिछले चार-पाँच सालों में उनका कोई गाना 'चार्ट बस्टर्स' में नहीं बजा।
इंडियन ऑइडल-4 की सोनाली बेंद्रे भी गोल्डी बहल के साथ घर बसाकर बॉलीवुड को तकरीबन 'बाय' कह ही चुकी हैं। हाल-फिलहाल उनके पास करने को कोई फिल्म नहीं है।
आदेश श्रीवास्तव, जतिन ललित, जावेद अख्तर, इला अरुण, आनंद राज आनंद और अन्नू मलिक को भी इसी फेहरिस्त में डालें तो कोई ज्यादती नहीं होगी। धुनों की चोरी के लिए बदनाम अन्नू की 'लव स्टोरी-2050' भी कब आई और गई, पता नहीं चला।
छिछोरेपन के साथ फूहड़ता का तड़का : एक चीज जो इन कार्यक्रमों को सुर्खियों में लाती है, वह है इनके प्रतियोगियों का छिछोरापन और फूहड़ता। कभी किसी चैनल पर दो प्रतिभागी एक-दूसरे का गिरेबाँ पकड़ते हुए हाथापाई तक कर बैठते हैं तो कभी किसी उद्घोषक को दर्शकों के बीच से आकर कोई लड़की चुंबन दे देती है।
विडंबना यह है कि इसे दिखाने से न तो चैनल गुरेज करता है और न ही प्रतिभागी कोई अफसोस जताते हैं। इस सबका देखने वालों पर क्या असर पड़ता होगा, इसकी फिक्र उन्हें खुद करना है।
वास्तव में हिंदी फिल्म उद्योग न तो रियलिटी शो देखकर सितारे गढ़ता और न ही ऐसे कार्यक्रमों से खुद को कामयाब समझने वाले उसके अंदर जी पाते हैं। कलाकारों को थोड़ी पहचान मिल जाती है और शो को टीआरपी। इससे ज्यादा इनका कोई अर्थ निकालना अपनी ऊर्जा नष्ट करने जैसा है...।
|