इसके अलावा देश के पश्चिमोत्तर में फेडरली एडमिनिस्टर्ड एरियाज (फाटा) में अतिवादियों के खिलाफ कार्रवाई के चलते सेना बहुत अधिक अलोकप्रिय हो गई है। अफगानिस्तान से सटे इलाकों में कार्रवाई के चलते लाखों बेघर हो रहे हैं और सैकड़ों मारे जा चुके हैं।
तालिबान और अतिवादी हिंसा और लगभग प्रतिदिन होने वाले धमामों के कारण देश के ताने बाने पर ही संकट मँडरा रहा है। ऐसे में सेना की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है और जनरल अशफाक परवेज कियानी भी चाहेंगे कि देश के सत्ता केन्द्रों पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत जरूर बनी रहे कि इसे सत्ता पर काबिज दलों से किसी प्रकार की चुनौती नहीं मिल सके।
वैसे मुशर्रफ को हटाए जाने के मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह रही है कि एक सैनिक तानाशाह ने पहली बार बिना किसी सैनिक हस्तक्षेप के सत्ता छोड़ दी अन्यथा पाकिस्तान का इतिहास रहा है कि जब भी किसी तानाशाह ने सत्ता छोड़ी उसने सेना के ही किसी आदमी के लिए कुर्सी खाली की। फील्ड मार्शल अयूब खान ने सत्ता छोड़ी तो उन्होंने इसे जनरल याह्या खान को सौंप दिया। जनरल याह्या खान के कार्यकाल में जब देश विभाजन हो गया तो तत्कालीन सेना प्रमुख ने याह्या को पद छोड़ने के वाध्य कर दिया था।
इस बार भी जब अल्लाह, अमेरिका और आर्मी ने चाहा तो मुशर्रफ को कुर्सी छोड़नी पड़ी लेकिन वे किसी सेना प्रमुख को अपनी कुर्सी पर नहीं बिठा सके। हालाँकि सेना प्रमुख कयानी को उन्होंने ही चुना था और इसके बदले में कयानी ने इतना जरूर चाहा कि पूर्व सेना प्रमुख मुशर्रफ को पूरे सम्मान के साथ विदा किया जाए। ऐसा माना जा रहा था कि मुशर्रफ के जाने के बाद देश में लोकतांत्रिक शक्तियाँ मजबूत होंगी।
पर उनकी विदाई के बावजूद गठबंधन सरकार एकजुट नहीं रह सकी और जरदारी ने अपने इस डर के चलते नवाज को किनारे लगा दिया कि अगर पूर्व चीफ जस्टिस चौधरी फिर से सुप्रीम कोर्ट में आ जाते हैं तो उनका जुड़ीशियल एक्टिविज्म फिर शुरू हो सकता है और नेशनल रिकंशिलिएशन ऑर्डर (एनआरओ) के तहत उन्हें मुशर्रफ से अपने खिलाफ विभिन्न मामलों से जो छूट मिली थी वे मामले फिर से शुरू हो सकते हैं।
इसी डर के चलते पहले उन्होंने जजों की बहाली के मामले को लटकाए रखा है और चाहा कि चौधरी कोर्ट में दोबारा न आ सकें क्योंकि अगर ऐसा होता है तो नवाज शरीफ को कोर्ट के बल पर ताकत बनकर उभरने में मदद मिल सकती है। दोनों के बीच परस्पर विश्वास की कमी और एक दूसरे को कम असरदार बनाए रखने की होड़ में सरकार ठीक से भी काम नहीं कर पा रही है। मुशर्रफ के बाद मौकापरस्ती की जो हवा बह रही है, वही तय करेगी कि देश की इस स्थिति से जरदारी ज्यादा फायदा उठा पाते हैं या जजों की बहाली के मुद्दे पर अड़े नवाज को अपनी स्थिति मजबूत करने का कोई मौका मिलता है।
हालाँकि इससे पहले इस बात के भी प्रयास किए गए कि जरदारी राष्ट्रपति पद की दावेदारी से हट जाएँ। इस संबंध में ब्रिटेन के फाइनेंशियल टाइम्स की एक खबर में छपा था कि बेहतर हो कि जरदारी राष्ट्रपति पद की दौड़ से हट जाएँ क्योंकि अगर वे चुने जाते हैं तो भ्रष्टाचार के आरोपों और मानसिक अस्वस्थता से दागदार व्यक्ति का इस पद पर आना ठीक नहीं होगा लेकिन जरदारी को अपना भी बचाव करना है। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के बहुत से मुकदमे हैं जिन पर फिलहाल मुशर्रफ के ऑर्डर ने पर्दा डाल रखा गया था लेकिन अगर ये किन्हीं कारणों से फिर खुलते हैं तो ऐसी स्थिति में जरदारी के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी, कहा नहीं जा सकता ?
जबकि पाकिस्तान की स्थिति यह है कि कोई भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति चुन लिया जाए, सत्ता की असली बागडोर सेना और इसके सर्वशक्तिमान संगठन आईएसआई के हाथों में ही बनी रहती है। इस देश के बारे में यह भी कहा जाता है कि अन्य देशों में उनकी सेनाएँ होती हैं लेकिन पाकिस्तानी सेना के पास देश रहता है।
हालाँकि सेना प्रमुख कयानी ने मुशर्रफ के हटाए जाने पर सेना को इससे दूर रखा लेकिन अगर पाक की राजनीतिक प्रक्रिया ही इतनी गड्डमड्ड हो जाती है कि सेना को हस्तक्षेप करना पड़े तो क्या जनरल कयानी को भी लंबे समय तक मुल्क, कौम और अवाम की सेवा करने से रोका जा सकेगा जैसीकि जनरल मुशर्रफ ने पाकिस्तान की नौ वर्ष तक खिदमत की है। इसलिए अब देखना है कि जरदारी किस तरह अपने विरोधियों और सेना को अपने जाल में फँसाए रखते हैं और कब तक सेना से सीधे टकराव से अपना बचाव करते हैं। वे राष्ट्रपति बन गए हैं तो उन्हें अपने खिलाफ मामलों में राहत मिलना स्वाभाविक है लेकिन अगर जजों की बहाली का मामला जोर पकड़ता है तो उनके सामने मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं और अगर उनके खिलाफ पुराने मामले भी खुलने लग जाते हैं तो उनका वर्षों की बजाय कुर्सी पर कुछ महीने निकालना भी मुश्किल हो जाएगा और तब पाकिस्तान में नवाज को ताकतवर उभरने का मौका मिल सकता है।
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