अध्ययनों से पता चलता है कि सरस्वती नदी हरियाणा, पंजाब व राजस्थान से होकर बहती थी और कच्छ के रण में जाकर अरब सागर में मिलती थी। तब सरस्वती के किनारे बसा राजस्थान भी हराभरा था। उस समय यमुना, सतलुज व घग्गर इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ थीं। बाद में सतलुज व यमुना ने भूगर्भीय हलचलों के कारण अपना मार्ग बदल लिया और सरस्वती से दूर हो गईं। हिमालय व शिवालिक की पहाड़ियों में प्राचीन काल से ही बड़ी संख्या में भूगर्भीय गतिविधियाँ चलती रही हैं।
संभवतः ऐसी ही किसी हलचल के कारण सरस्वती का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध | | ? अगर समय रहते ध्यान दिया गया होता, तो संभव था कि कोसी तटबंध तोड़ती, तो भी मार्ग नहीं बदलती और जन-धन की हानि इतनी विकराल नहीं होती, जैसी अब है |
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हुआ और वह मार्ग बदलकर बहने लगी। बदले मार्ग पर इसे हिमालयी जल नहीं मिला व यह वर्षा जल से बहने वाली नदी रह गई। कालांतर में राजस्थान क्षेत्र में मौसम गर्म होता गया, तब वर्षा जल भी न मिलने के कारण सरस्वती नदी सूखकर विलुप्त हो गई।
चीन का शोक कही जाने वाली ह्वांगही नदी (पीली नदी) भी मार्ग बदलने के लिए कुख्यात है। इस नदी ने वर्ष 1976 से 2000 के बीच 20 बार अपना मार्ग बदला है। अमेरिका के लुसियाना में मिसीसिपी नदी व श्रीलंका की महावेली नदी भी मार्ग बदलकर बह रही हैं।
वस्तुतः नदियों की उत्पत्ति हजारों वर्ष पहले तब हुई, जब आज के अधिकांश पहाड़ नहीं थे। धरती के विकासक्रम में इसका भौगोलिक व भू-गर्भीय स्वरूप लगातार बदलता रहा। साथ ही बदलते रहे नदियों के मार्ग। कभी पहाड़ों ने नदियों के रास्ते में खड़े होकर इन्हें मार्ग बदलने को मजबूर किया, तो कभी भूकम्प, भू-स्खलन, मौसम परिवर्तन आदि ने। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जिसमें कुछ नदियाँ बनीं, तो कुछ लुप्त हुईं।
कोसी की बाढ़ और मार्ग परिवर्तन प्राकृतिक न होकर काफी हद तक मानव गतिविधियों का परिणाम हैं। जाँच का विषय यह भी है कि बाँधों व तटबंधों के रखरखाव के लिए प्रतिवर्ष जारी की जाने वाली भारी-भरकम राशि कहाँ जाती है? अगर समय रहते ध्यान दिया गया होता, तो संभव था कि कोसी तटबंध तोड़ती, तो भी मार्ग नहीं बदलती और जन-धन की हानि इतनी विकराल नहीं होती, जैसी अब है।
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