मुख पृष्ठ > सामयिक > विचार-मंथन > विचार-मंथन > प्रकृति का ख्याल रखना भी जरूरी
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
प्रकृति का ख्याल रखना भी जरूरी
- सोनाली सिंह राठौड़
बिहार के लिए बाढ़ कोई नई घटना नहीं है, परंतु इस बार जो नई बात हुई, वह है कोसी नदी द्वारा रास्ता बदलकर सदियों पहले का रास्ता पकड़ लेना। इसके मार्ग बदलने का लंबा इतिहास रहा है। पिछले 250 वर्षों में कोसी पूर्व से पश्चिम की ओर 120 किमी खिसक चुकी है। बार-बार रास्ता बदलने व जन-धन की हानि के कारण कोसी नदी को 'बिहार के शोक' के नाम से भी जाना जाता है।

कोसी नदी का इस बार मार्ग बदलना इस मायने में महत्वपूर्ण है कि कोसी ने
ND
पश्चिम से पूर्व का मार्ग पकड़ लिया। अब यह उस रास्ते बहने लगी है, जिसे उसने 200 वर्ष से भी पहले छोड़ दिया था। नदी द्वारा जगह छोड़े जाने पर वहाँ मानव बस्ती बस गई थी, जो विकराल बहाव के कारण अब अपना नामोनिशान खो चुकी है। उपग्रह चित्रों से पता चलता है कि निरंतर पश्चिम में खिसकने के कारण भारत में कोसी का मार्ग अँगरेजी के 'सी' अक्षर जैसा घुमावदार हो गया था, पर अब यह अचानक सीधी रेखा में बहने लगी है।


पहाड़ों से निकलकर मैदान में आने के दौरान कोसी प्रति वर्ष 8.1 करोड़ टन से भी
  उत्तर बिहार की न सिर्फ कोसी, बल्कि गंडक, बूढ़ी गंडक, कमला, भुतही बलान व भागमती आदि नदियाँ भी लगातार मार्ग बदलती रहती हैं। यहाँ की अधिकांश नदियाँ हिमालय पर्वत श्रृंखला से निकली हैं और इनमें गाद की मात्रा काफी अधिक रहती है      
ज्यादा गाद अपने साथ लाती है। यह गाद नदी के किनारों पर इकट्ठा होती रहती है और धारा के लिए अवरोध पैदा करती है। इस अवरोध से बचने के लिए धारा लगातार नए मार्ग तलाशती है और समीपस्थ नरम भूमि को काटकर उस ओर बढ़ने लग जाती है।


इसके तटबंध भी बाढ़ का कारण हो सकते हैं। कई वर्षों से इसके अंदर गाद का दबाव बढ़ गया था। इस गाद का निकास नहीं हो पाया और नदी लगातार उथली होती गई। उत्तरी बिहार में भूमि का ढलान दक्षिण-पूर्व दिशा में है। इसलिए तटबंध तोड़कर कोसी का प्रवाह दक्षिण-पूर्व दिशा में ही चला। नेपाल में कोसी पर बना भीमनगर बाँध भी वर्ष 1986 में अपनी निर्धारित आयु पूरी कर चुका है। बाँधों, नहरों व तटबंधों का रखरखाव भारत व नेपाल की राजनीति का शिकार हो गया।

अगर इनका समुचित प्रबंध होता, तो तटबंध नहीं टूटते। कोसी विशेषज्ञ एफए शिलिंग फेल्ड कई साल पहले चेतावनी दे चुके थे कि जिस दिन नदी पुराने मार्ग पर चल पड़ेगी, उस दिन भारी तबाही होगी, यही हुआ। इसकी विभीषिका इतनी प्रचलित है कि उत्तरी बिहार में 'कोसी माई' के प्रकोप पर लोकगीत तक गाए जाते हैं।

उत्तर बिहार की न सिर्फ कोसी, बल्कि गंडक, बूढ़ी गंडक, कमला, भुतही बलान व भागमती आदि नदियाँ भी लगातार मार्ग बदलती रहती हैं। यहाँ की अधिकांश नदियाँ हिमालय पर्वत श्रृंखला से निकली हैं और इनमें गाद की मात्रा काफी अधिक रहती है।
1 | 2  >>  
और भी
भारत के लिए फायदे का सौदा
सभी की एक ही रट...जीवन का अंत!
ब्लॉग चर्चा में मनोज बाजपेयी का ब्लॉग
अमेरिकी चालबाजी या हमारी विचारहीनता
बढ़ोतरी और विकास का फर्क
गुम न हो जाएँ 'गजराज'