जाहिर है यह पोस्ट मनोज बाजपेयी की आंतरिक दुनिया की एक मार्मिक झलक दिखलाती है और बताती है कि यह किस कदर अपने बड़े-बूढ़ों को याद करता है, प्यार करता है। अपनी शुरुआती पोस्ट में वे नाम से लेकर ब्लॉग के लिए पीआरशिप और अच्छी हिंदी कैसे लिख लेते हैं के सवालों पर अपनी राय देते हैं। कमेंट पर कमेंट देते हैं। अविश्वास के बावजूद पढि़ए यह मेरा ब्लॉग में एक कमेंट पर वे कमेंट करते हैं कि हिन्दी के बारे में आरसी मिश्रा साहब ने लिख डाला कि ‘कौन लिख रहा है ये ब्लॉग। अब मनोज बाजपेयी तो इतनी अच्छी हिन्दी लिखने से रहे।‘ दरअसल, ये दोष उनका नहीं है जो यह सवाल पूछ रहे हैं कि एक फिल्म अभिनेता हिन्दी में कैसे लिख सकता है?
अमूमन जितने भी बड़े स्टार्स हैं, वे कामचलाऊ हिन्दी तो बोल लेते हैं लेकिन शायद हिन्दी में नहीं लिख पाएँगे। वे हिन्दी में इंटरव्यू भी बमुश्किल दे पाते हैं। इससे कहीं-न-कहीं दर्शकों-पाठकों के मन में ये आशंका होनी लाजिमी है कि एक अभिनेता हिन्दी में कैसे ब्लॉग लिख सकता है। आपकी जानकारी के लिए अमिताभ बच्चन बहुत अच्छी हिन्दी जानते हैं।
आशुतोष राणा बहुत अच्छी हिन्दी लिखते-बोलते हैं और जितने भी लोग रंगमंच से आए हैं, उनकी हिन्दी और अँग्रेजी अच्छी है। अगर आपको अभी भी अविश्वास है तो उसे रहने दीजिए, लेकिन पढ़ना जारी रखिए क्योंकि यह मेरा यानी मनोज बाजपेयी का ही ब्लॉग है और मनोज बाजपेयी की ही बात है। तो दोस्तो, ये मनोज बाजपेयी का ही ब्लॉग है, मनोज बाजपेयी की हिंदी है और उनकी ही बातें हैं। ये बातें कहीं-कहीं मार्मिक हैं, कहीं-कहीं मजेदार हैं। इनमें अपने गाँव के पुराने स्कूल की, स्वतंत्रता दिवस की, मास्टरजी के कहने पर रातभर तिरंगा बनाने औऱ माता-पिता के सामने टूटी-फूटी भाषा में जन गण मन गाने की यादें भी हैं।
यही नहीं 1971 फिल्म की शूटिंग के बहाने वे यह भी कहते हैं कि इस शानदार फिल्म की शूटिंग वे इसलिए भी पूरे मन से कर रहे थे क्योंकि वे अपने देश के प्रति प्यार और सम्मान भी प्रकट कर सकें। आपने फिल्मों में इस उम्दा फनकार के तेवर तो देख ही लिए हैं। अब इस कलाकार की कलम का कमाल भी पढ़ लीजिए। ये रहा उनका यूआरएल-http://manojbajpayee.itzmyblog.com/ |