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ब्लॉग चर्चा में मनोज बाजपेयी का ब्लॉग
कहने की जरूरत नहीं कि यह अभिनेता प्रदेश और केंद्र सरकारों की नीति पर सवाल खड़े करता है। असंगत विकास के चलते गाँव और शहर के बीच बढ़ती खाई और गाँवों की लगातार अनदेखी पर वे सवाल करते हैं।

बाढ़ से घिरे लोगों की मदद के लिए वे अपनी कोशिशों की बात भी करते हैं और दूसरे लोगों को भी इस दिशा में कुछ सार्थक करने के लिए प्रेरित करते हैं।
अपनी एक अन्य पोस्ट शक्तिहीन अभिनेता और बाढ़ का दर्द में वे लिखते हैं आज मैं एक फिल्म की डबिंग कर रहा था लेकिन दिमाग में लोगों की चीख-पुकार ही सुनादे रही थी। मॉल के बढ़ते संसार में हम शहर के ठीक बाहर की तकलीफ को भूलते जा रहहैं। मॉल से ही सिर्फ विकास नहीं होगा। अगर गाँव और गाँव वाले ही दु:खी रहेंगे तो इदेश का कुछ नहीं हो सकता। इन्हीं सब पीड़ा को महसूस करते हुए मैं आपके साथ अपने दु:को बाँट रहा हूँ और असहाय सा महसूस कर रहा हूँ। आगे मैं चाहूँगा कि किसी तरीके सशारीरिक और भावनात्मक तौर पर ही सही, मैं अपनी तरह से पीड़ित लोगों की कुछ मदद कपाऊँ


इन दो पोस्टों से जाहिर है कि यह संवेदनशील अभिनेता बिहार में बाढ़ से कितना व्यथित है।
सत्या फिल्म से अपने अभिनेता की ताकत महसूस करवा चुका यह अभिनेता अभिनय के लिए कैसे और कहाँ से ताकत हासिल करता है इसे जानने के लिए उनकी एक पोस्ट मददगार साबित हो सकती है।

बाजार में करता हूँ अभिनय का होमवर्क में खरीददारी के बहाने बड़ी सादगी और सरलता से बताते हैं कि वे कैसे बाजारों में घूम कर लोगों से मिलते-जुलते हैं, उनके बारे में जानकारी हासिल करते हैं और इससे प्राप्त अनुभव को अपना होमवर्क बनाकर अपने अभिनेता को लगातार माँजते रहते हैं। जीवन से अभिनय की प्रेरणा लेने से ही यह अभिनेता सत्या से लेकर जुबैदा, रोड, पिंजर और शूल जैसी सशक्त फिल्मों में बेहतरीन अभिनय किया है।


बुढापा और मैं उनकी एक दिलचस्प पोस्ट है। इस पोस्ट में वे एनडीटीवी इंडिया के कार्यक्रम को देखकर बूढ़ों को याद करते हैं जिन्होंने उन्हें मार्गदर्शन दिया। इसमें वे अपने पिता औऱ ससुर से लेकर तमाम बुजुर्गों को याद करते हैं।

वे लिखते हैं दरअसल, एसएन वर्मा में मैं खुद को देख रहा था। कई सारे युवाओं को देख रहा था, अपने यौवन के मद में चूर हैं। उन्हें कहीं भी इस बात का अहसास नहीं है कि वे भी कशायद एसएन वर्मा की जगह खड़े होंगे। आज का वृद्ध वैसा हो चुका है, जैसे कि घास-फूस, जिसे काटकर अलग कर दिया जाता है ताकि नई फसल की बुवाई हो सके।

वह खुद को अलग-थलग महसूस करता है। उसके बारे में समाज तो दूर उसके अपने भी सुध नहीं लेते। क्यकरें अपने बूढ़ों का? क्या हम उन्हें सहेज कर नहीं रख सकते? क्या हम उनसमार्गदर्शन नहीं ले सकते? और अगर उसके बदले में हमें सिर्फ उनका ख्याल रखना है तअधिक क्या गया? यही सोचते-सोचते दिन कटा
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