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ब्लॉग चर्चा में मनोज बाजपेयी का ब्लॉग
रवींद्र व्यास
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हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया फैल रही है, बढ़ रही है। इसे मिलती लोकप्रियता आम और खास को लुभा रही है। इसे संवाद के नए और लोकप्रिय माध्यम के रूप में जो पहचान मिली है उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि सीधे लोगों तक पहुँच कर आप उनसे हर बात बाँट सकते हैं, कह सकते हैं।

इससे एक अंतःक्रियात्मक संबंध बनता है। यह संबंध ज्यादा अनौपचारिक होता है। आत्मीय होता है। बिना किसी हिचकिचाहट के लोग ब्लॉग पर अपने कमेंट्स देते हैं। इसीलिए रोज-ब-रोज कई ब्लॉगर परिदृश्य पर अपनी सार्थक मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। अमिताभ बच्चन और आमिर खान के साथ कई अभिनेता-अभिनेत्रियाँ ब्लॉगर बन रहे हैं। इसकी ताजा कड़ी ख्यात अभिनेता मनोज बाजपेयी हैं।

उनका ब्लॉग अन्य अभिनेता-अभिनेत्रियों से इस मायने में अलग है क्योंकि यहाँ प्रचार की हवस दिखाई नहीं देती। इस अभिनेता ने हाल ही में जो चीजें पोस्ट की हैं, उससे लगता है ये एक प्रतिबद्ध अभिनेता हैं। ऐसा अभिनेता जो अपने प्रचार और फिल्मों पर ही बात नहीं करता बल्कि देश-समाज के सूरते हाल पर सतत नजर रखे है।

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देश में जो कुछ भी घट रहा है, हो रहा है, वह इस अभिनेता को परेशान करता है। वह चिंतित होता है। सोचता है और दुःखी होता है। बिना लाग लपेट के अपनी बात कहता है। बिना ज्यादा भावुक हुए लेकिन पूरी संवेदनशीलता के साथ। सवालों-समस्याओं पर बात करते हुए सवाल करता हुआ। लेकिन मनोज बाजपेयी सिर्फ सोचते ही नहीं, कुछ करने की इच्छा भी रखते हैं। करते भी हैं। कुछ अच्छा करने के लिए लोगों को प्रेरित भी करते हैं, उत्साहित करते हैं।

मिसाल के तौर पर बिहार में आई बाढ़ पर उनकी दो पोस्ट पढ़ी जा सकती हैं। बिहार में आई बाढ़ उन्हें परेशान करती है। पानी में घिरे असहाय लोगों का दुःख उन्हें सालता है। वे गाँव के लोगों के पक्षधर हैं। उनकी तरफ खड़े होकर सोचते हैं और लिखते हैं।


बिहार की बाढ़ से हारना नहीं शीर्षक की अपनी पोस्ट में वे लिखते हैं- कोसी नदी या कोई भी पहाड़ी नदी, जो उत्तर के पहाड़ से निकलकर बिहार में प्रवेश करतै, उसका कहर और उसके किस्से मैं बचपन से सुनता आ रहा हूँ। आश्चर्य इस बात का है कि हम सब देखते रह गए और पानी घुस आया। इसका मतलब यह है कि इतने साल में उन सारबाँधों पर कोई काम नहीं हुआ है। कब तक गरीब इसी तरह से अपनी जान गँवाते रहेंगे। कतक हम सिर्फ शहर को ही हिन्दुस्तान मानते रहेंगे। सवाल इस बात का है
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