हालाँकि वॉशिंगटन में अमेरिकी प्रवक्ता ने जोर देकर कहा है कि वह भारत के साथ परमाणु समझौते को मझधार में नहीं छोड़ सकता लेकिन इस समझौते को अपनी जरूरतों के अनुरूप बनाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। जबकि प्रवक्ता ने इसे अमेरिकी मजबूरी बताते हुए कहा कि काफी व्यस्त समयसीमा के तहत अमेरिका काम कर रहा है और यह सुनिश्चित करना चाहता है कि इसके भीतर यह मसौदा पारित हो जाए।
| | अमेरिकी राजदूत मलफर्ड ने भी बुश के पत्र पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा है कि अमेरिका ने भारत पर कोई नई शर्त नहीं लगाई है। बैठक में अमेरिका की ओर से पैरवी करने के लिए अमेरिकी विदेश उपमंत्री बिल बर्न्स और जॉन रूड वियेना में मौजूद हैं। |
| |
अमेरिकी राजदूत मलफर्ड ने भी बुश के पत्र पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा है कि अमेरिका ने भारत पर कोई नई शर्त नहीं लगाई है। बैठक में अमेरिका की ओर से पैरवी करने के लिए अमेरिकी विदेश उपमंत्री बिल बर्न्स और जॉन रूड वियेना में मौजूद हैं।
लेकिन 'वॉशिंगटन पोस्ट' में छपा राष्ट्रपति बुश का पत्र भारत के लिए घातक साबित हो सकता है। इस पत्र के बाद परमाणु अप्रसार का नाम लेकर भारत पर दबाव डालने वाले देश अपना रुख और कड़ा कर सकते हैं कि राष्ट्रपति बुश के पत्र के अनुरूप एनएसजी में मसौदा संशोधित किया जाए। हालाँकि भारत का कहना है कि राष्ट्रपति बुश के पत्र में जो कहा गया है इसका उल्लेख अमेरिकी कांग्रेस द्वारा हाइड कानून में भी है जिसे भारत ने मानने से इनकार कर दिया है। भारत केवल द्विपक्षीय 123 समझौते से ही निर्देशित होगा।
भारत एनएसजी का सदस्य नहीं है, लेकिन वह एनएसजी के सदस्यों की गुरुवार दोपहर बाद फिर से अलग अनौपचारिक बैठक कर परमाणु अप्रसार और निरस्त्रीकरण को लेकर अपनी अब तक की नीति की व्याख्या कर रहा है और परमाणु अप्रसार को लेकर उनकी चिंताओं का निराकरण करेगा। इस बैठक को विदेश सचिव मेनन और श्याम सरन संबोधित करेंगे।
एनएसजी की 21 और 22 अगस्त को वियेना में पहले दौर की बैठक में आम राय नहीं बन पाने के कारण गुरुवार (4 सितंबर) को दूसरे दौर की बैठक बुलाई गई है जिसमें परमाणु अप्रसार को लेकर चिंता जाहिर करने वाले देशों की माँगों से कुछ समझौता करते हुए नया संशोधित मसौदा पेश किया गया है। लेकिन परमाणु अप्रसार के कट्टर समर्थक देशों का रवैया अधिक नहीं बदला है। भारत ने इन देशों की चिंताओं के अनुरूप कुछ सुझावात्मक बातें संशोधित मसौदे में मानी है, लेकिन चिंता जाहिर करने वाले देश इसे केवल सतही ही बता रहे हैं।
अमेरिका ने एनएसजी की बैठक से एक दिन पहले ही यह भी साफ कर दिया है कि न्यूक्लियर फ्यूल की आपूर्ति की गारंटी का मतलब यह कतई नहीं है कि भारत द्वारा परमाणु परीक्षण की स्थिति में वह मदद करेगा या उसके संभावित परिणामों से बचाएगा। जबकि भारत में अभी तक सरकार की ओर से बताया जाता रहा है कि परमाणु टेस्ट करने की स्थिति में अमेरिका ने संधि टूटने के बावजूद एनएसजी से न्यूक्लियर फ्यूल के सप्लाई का आश्वासन दिया है।
वियना में एनएसजी की बैठक के एक दिन पहले अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की विदेशी मामले की समिति के अध्यक्ष हावर्ड बरमैन ने भारत-अमेरिका परमाणु करार से जुड़े 45 सवालों के अमेरिकी विदेश मंत्रालय के जवाब जारी किए। इन जवाबों से भारत-अमेरिका परमाणु करार को लेकर तस्वीर बहुद हद तक साफ हो गई है।
वॉशिंगटन पोस्ट में छपी रिपोर्ट के अनुसार बरमैन के एक प्रवक्ता ने कहा है कि उन्होंने इन जवाबों को इसलिए सार्वजनिक किया है क्योंकि अमेरिकी कांग्रेस के पास इसकी सूचना होनी चाहिए। खबर में यह भी दावा किया गया है कि बुश प्रशासन द्वारा लिखी गई इस चिट्ठी की जानकारी यूपीए सरकार को पहले से ही थी।
दरअसल विदेशी मामले की समिति के पूर्व अध्यक्ष टॉम लैंटोस ने पिछले साल अक्टूबर में विदेश मंत्रालय से 45 सवाल पूछे थे और उनके जवाब इस साल 16 जनवरी को भेजे गए थे। लेकिन पिछले नौ महीने तक इन दस्तावेजों को गोपनीय बनाए रखा गया और अब वियना में न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) की बैठक से ठीक पहले सार्वजनिक किया गया है।
| | वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार इन जवाबों के सबके सामने आने से करार पर चर्चा के दौरान भारत में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार गिर सकती थी इसलिए क्लासीफाइड नहीं होने के बावजूद अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इसे गोपनीय बनाए रखा |
| |
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार इन जवाबों के सबके सामने आने से करार पर चर्चा के दौरान भारत में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार गिर सकती थी इसलिए क्लासीफाइड नहीं होने के बावजूद अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इसे गोपनीय बनाए रखा।
बरमैन ने हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने धमकी दी थी कि अगर बुश प्रशासन ने भारत को दी जा रही एनएसजी छूट में अतिरिक्त शर्तें नहीं जोड़ी तो अमेरिकी कांग्रेस में करार को ब्लॉक कर दिया जाएगा।
अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इन प्रश्नों के उत्तरों में कहा है कि जैसा कि 123 संधि में कहा गया है अगर भारत ने कोई परमाणु विस्फोट किया तो अमेरिका को उसके साथ तमाम परमाणु सहयोग तुरंत रोकने का अधिकार होगा। इसमें परमाणु ईंधन की आपूर्ति भी शामिल है।
'वॉशिंगटन पोस्ट' की रिपोर्ट से वामपंथियों और भाजपा के ठंडे पड़ गए समझौता विरोधी अभियान में अचानक जान आ गई है। दोनों दलों ने मनमोहन सरकार को यह कहते हुए कटघरे में खड़ा किया कि उसने देश को गुमराह किया है। इससे न सिर्फ सरकार की पोल खुल गई है, बल्कि यह भी साबित हो गया है कि उसने देश के सुरक्षा हितों के साथ समझौता किया है, जबकि कांग्रेस यह कहते हुए बचाव की मुद्रा में आ गई कि जो भी खुलासा हुआ है वह अमेरिकी प्रशासन और अमेरिकी विधायिका की आपसी बातचीत है।
विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने वॉशिंगटन में बुश के पत्र पर टिप्पणी से इनकार कर दिया है, लेकिन यहाँ विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत अमेरिका के साथ किए गए द्विपक्षीय 123 समझौते से ही बँधा है। प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि परमाणु परीक्षण के मसले पर भारत की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। प्रवक्ता ने यह भी कहा कि अपनी नीति के तहत हम किसी देश के अंदरूनी पत्र व्यवहार पर टिप्पणी नहीं करते।
भाजपा के उपाध्यक्ष यशवंत सिन्हा ने कहा कि विदेशी मामलों से संबंधित समिति को बुश प्रशासन की ओर से भेजा गया खत कोई मामूली बात नहीं है। इस खत से अमेरिकी सरकार की नीति झलकती है। उन्होंने कहा कि यह खत नौ महीने पुराना है और भारत सरकार को इसकी जानकारी होनी चाहिए।
सिन्हा ने कहा कि सरकार ने दावा किया है कि भारत के पास परीक्षण का अधिकार बना रहेगा, जबकि बुश प्रशासन के पत्र से साफ हो गया है कि भारत के परमाणु परीक्षण करते ही सभी प्रकार का सहयोग रोक दिया जाएगा।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया का कहना है कि इस खत से असैन्य परमाणु करार के मुद्दे पर वाम दलों का विरोध सही साबित हुआ है और प्रधानमंत्री को इसका जवाब देना होगा। पार्टी के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अंजान ने कहा कि हाइड एक्ट के प्रावधानों के डील पर असर से प्रधानमंत्री पूरी तरह वाकिफ थे और उन्हें देश को जवाब देना होगा। उन्होंने कहा कि परमाणु करार का समर्थन करने वाले दलों को भी देश को यह बताना होगा कि करार पर सरकार को आगे बढ़ने का क्या अधिकार था।
सीपीएम ने कहा है कि वाम दलों ने सरकार को पहले ही चेतावनी दी थी, जो इस खुलासे के बाद सच साबित हुई है। पार्टी ने कहा है कि प्रधानमंत्री ने संसद में जो भी दावे किए थे सब झूठे साबित हो गए हैं। सीपीएम नेता वृंदा करात ने सरकार पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह बेहद खेदजनक स्थिति है और देश की ट्रैजिडी है कि आप ऐसी सरकार को स्वीकार करते हैं जो देश को बेच सकती है। |