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बढ़ोतरी और विकास का फर्क
हिन्दी के महान कवि 'निराला' ने ऊँची अट्टालिकाओं को 'आतंक भवन' कहा था। निराला के समय में ये आतंक भवन ब्रिटिश साम्राज्यवाद के प्रतीक थे। ऊँचे भवन अब भी किसी न किसी साम्राज्यवाद से ही संबंध रखते हैं। यह विकास है तो इस विकास की परीक्षा करनी चाहिए। कबीरदास 'कागजलेखी' पर नहीं 'आँखिन देखी' पर यकीन करते थे। कागजलेखी आज के युग में वे आँकड़े हैं जो वस्तुस्थिति कम, सुखी और संतुष्ट लोगों के भ्रामक विज्ञापन ज्यादा होते हैं। और विज्ञापन का इस अर्थतंत्र में वही स्थान है, जो वेदांत में माया का है। माया के दो काम हैं।

'आवरण' यानी सत्य को ढँकना और निक्षेप यानी जो नहीं है, असत्‌ है उसे सत्य की तरह स्थापित करना। आप अखबारों, टीवी चैनलों में जो विज्ञापन देखते हैं और जिन विज्ञापनों ने लगभग सारे सांस्कृतिक कार्यक्रमों को ग्रस्त कर रखा है वे कितना सच बोलते हैं, कितना अंधाधुँध पैसा कमाने के साधन हैं। विज्ञापन कितनी तेजी से हमारे आस्वाद और हमारी रुचियों को भ्रष्ट कर रहा है। संगीत अब सुनने की नहीं, देखने की चीज हो गया है।

वस्तुतः दलित चेतना और नारी शिक्षा का प्रसार भारत की सर्वाधिक स्वागतयोग्य उपलब्धियाँ हैं। दलित चेतना तो अब दलित शक्ति बन चुकी है और नारी शिक्षा का असर हमारे पारिवारिक ढाँचे में क्रांतिकारी प्रगतिशील परिवर्तन ला रहा है। जरूरत इस बात की है कि हम विकास को बढ़ोतरी का समानार्थक न समझें। बढ़ोतरी अपने-आप में विकास नहीं, बढ़ोतरी का वितरण उचित विकास है। हमारे देश में समृद्घि आई है किंतु वह कुछ केंद्रों में ठहर गई है या जमा हो गई है। इसीलिए देश में तेजी से दो देश साफ दिखलाई पड़ते हैं।

बढ़ोतरी अगर किसी एक ही अंग या कुछ ही अंगों की होती रहे तो पूरा शरीर विकृत और विकलांग हो जाएगा। शरीर के कुछ ही अंगों की निरंतर बढ़ोतरी स्वास्थ्य नहीं भयंकर रोग कैंसर का लक्षण है। आप देश के एक हिस्से को समृद्घ बना दें, उनकी आकांक्षाओं को आसमान पर पहुँचा दें और पैसे के जोर से उन्हीं के प्रतिनिधि बन जाएँ। सामान्य जनता की आवाज सुनाई ही न पड़े तो आप प्रतिनिधि तो बन जाएँगे, नेता नहीं बन पाएँगे। नेता का काम जनता को आगे ले जाना भी होता है। वह कुछ लोगों या कुछ समुदायों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने से इंकार भी कर सकता है। (लेखक प्रसिद्ध समालोचक और चिंतक हैं।)
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