- असगर वजाहत पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने एक बयान देकर पार्टी को संकट में डाल दिया है। लेकिन चिंता का विषय यह है कि अखबारों और मीडिया ने उनके बयान को केवल 'बंद' तक सीमित कर दिया और चर्चा यह होने लगी कि बंद से देश और राज्य को क्या नुकसान होता है।
वामपंथी नेताओं ने अपने ढंग से कहा कि 'बंद' मजदूरों के हाथ में एक सबसे बड़ा हथियार है, आदि आदि। दरअसल बुद्धदेव का बयान केवल 'बंद' तक सीमित नहीं था। उन्होंने एक सवाल के जवाब में साफ कहा था कि दिल्ली में मेरे साथी भी इस पर (सुधारवादी नजरिया) बहस कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि रूढ़िवाद और कट्टरता से काम नहीं चलेगा और आशा | | कम्युनिस्ट पार्टियों में संभवतः सिद्धांतः और व्यवहार को लेकर इतनी खींचातानी रही है कि उसके परिणामस्वरूप पार्टी को नुकसान ही हुआ है। कहीं-कहीं इतिहास सिद्ध करता है कि एक समय में लिया गया निर्णय गलत था और उसके परिणाम बहुत खराब निकले हैं |
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जताई कि दिल्ली के साथी शायद इस पर विचार कर रहे हैं। समय लग सकता है पर निश्चय ही साथी नए स्वरूप को स्वीकार करेंगे। कुछ इस तरह बातें करते हुए उन्होंने स्पष्ट संकेत दिए कि 'बंद' तो एक बहुत छोटी बात है, दरअसल मुख्य बात यह है कि वामपंथी अपने नजरिए और समझ में क्या बदलाव लाते हैं।
राजनीतिक दलों और विशेष रूप से वामपंथी दलों के बीच वैचारिक बहस चलना कोई नई बात नहीं है। दरअसल यही बहसें पार्टियों को प्रासंगिक बनाए रखती हैं और मरने से बचाती हैं। सिद्धांत और कार्यक्रम का जन्म वस्तुस्थिति से ही होता है और वस्तुस्थिति जब बदल जाती है तो निश्चय ही उसका प्रभाव सिद्धांत और व्यवहार में परिलक्षित होता है।
मार्क्सवाद जड़ दर्शन नहीं है और इस कारण उससे जन्मी राजनीति भी कभी जड़ नहीं रही। लेकिन जहाँ-जहाँ उसमें जड़ता आई है, वहाँ-वहाँ उसे दंड भोगना पड़ा है। कम्युनिस्ट पार्टियों में संभवतः सिद्धांतः और व्यवहार को लेकर इतनी खींचातानी रही है कि उसके परिणामस्वरूप पार्टी को नुकसान ही हुआ है। कहीं-कहीं इतिहास सिद्ध करता है कि एक समय में लिया गया निर्णय गलत था और उसके परिणाम बहुत खराब निकले हैं।
उदाहरण के लिए आजादी के बाद सोवियत यूनियन के निर्देश के अंतर्गत कम्युनिस्ट पार्टी के लिए स्पष्ट निर्देश था कि वह कांग्रेस और विशेष रूप से नेहरू के हाथ मजबूत करे। उस समय कम्युनिस्ट पार्टी का एक धड़ा इसे अस्वीकार करता था और यह कहता था कि पार्टी का काम नेहरू के हाथ मजबूत करना नहीं, क्रांति के लिए माहौल तैयार करना होना चाहिए। इस आधार पर पार्टी बँट गई थी।
पार्टी बँट जाने के लगभग पचास साल बाद दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों ने यूपीए की सरकार को समर्थन देकर यह सिद्ध कर दिया कि सन् 55-60 में कांग्रेस और नेहरू के हाथ मजबूत करने वाली लाइन सही थी। यूपीए सरकार से समर्थन ले लेने के बाद भी क्या कम्युनिस्ट भाजपा जैसी पार्टी को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस के साथ कोई मंच नहीं बनाएँगे? राष्ट्रीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि 'भाजपा' का जवाब कांग्रेस और वामपंथी दलों का गठजोड़ ही हो सकता है।
बुद्धदेव और बंगाल के अन्य वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता जो बहस चलाना चाहते हैं, आज वह बहुत जरूरी है। इसलिए कि अगर बहस न चलाई गई तो कॉमरेड ज्योति बसु को प्रधानमंत्री पद से वंचित कर देने वाली सीपीएम लगातार ऐतिहासिक भूलें करती रहेगी। सीपीएम के पिछले महाधिवेशन में एक विचारवान शुभचिंतक होकर जो कुछ देखने और सुनने का मौका मिला था वह भी कुछ ऐसा था जो 'ठहराव' की ओर संकेत कर रहा था।
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