अमरनाथ भूमि आवंटन और सिंगूर में टाटा मोटर के ड्रीम प्रोजेक्ट नैनो कार को लेकर जारी विवादों ने यह सिद्ध कर दिया है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सड़क तंत्र बुरी तरह हावी हो गया है। लोकतंत्र में विरोध प्रकट करने का अधिकार है, लेकिन हाइवे जाम करके आम जनजीवन को अस्तव्यवस्त करना या किसी उद्योग में कामकाज बंद करने का अधिकार किसी को नहीं है।
अमरनाथ भूमि संघर्ष समिति ने जम्मू-श्रीनगर हाइवे को जाम करके एक छोटे से विवाद को गंभीर राष्ट्रीय संकट में बदल दिया। वहीं तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने किसानों की भूमि के अधिग्रहण से जुड़े विवाद को इस स्तर पर पहुँचा दिया है कि देश ही नहीं बल्कि विश्व के प्रतिष्ठित उद्योग समूह टाटा को यह इस बात पर विचार करना पड़ रहा है कि क्या नैनो कारखाने को देश के किसी अन्य हिस्से में ले जाया जाए?
| | सरकार की पहली जिम्मेदारी है कि वह आम लोगों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा करें। सरकारें इस बात से आतंकित रहती हैं कि यदि उसने शक्ति का प्रयोग किया तो चुनाव में उसका राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ सकता है |
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पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पिछले एक महीने से प्रतिदिन बयान दे रहे हैं कि वे इस मुद्दे पर ममता बनर्जी के साथ बातचीत करने के लिए तैयार हैं, लेकिन अपनी जिद पर अड़ी हुई ममता बातचीत के लिए तैयार नहीं है। लोकतंत्र में विरोध प्रकट करने के बाद अंततः समाधान बातचीत के माध्यम से ही संभव होता है। विश्व युद्धों में लाखों लोगों की मौत होने के बाद बातचीत के माध्यम से ही शांति स्थापित हुई थी।
रेल की पटरियों को उखाड़ना राष्ट्रदोह की श्रेणी में आता है, लेकिन राजस्थान में गुर्जर आंदोलन के दौरान इस काम को जायज लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति मान लिया गया था। लगभग पन्द्रह दिनों तक दिल्ली-मुंबई के बीच रेल यातायात बाधित रहा। दुनिया के अन्य देशों में भी लोगों के साथ सरकार द्वारा अन्याय होता है, लेकिन उन देशों में सड़कों व रेलों को जाम नहीं किया जाता है। लोग अपनी नाराजगी व गुस्से को इस तरह भी प्रभावी ढंग से प्रकट कर सकते हैं कि दूसरों की जिन्दगी पर उसका प्रतिकूल असर न पड़े।
जापान में प्रदर्शनकारी फुटपाथ पर लंबी कतार में खड़े होकर या अपने साथ लाए छोटे स्टूल पर बैठकर अपनी माँगों के समर्थन में प्रदर्शन करते हैं, ताकि पैदल चलने वालों को भी परेशानी न हो। भारत में बंद व चक्का जाम की वजह से बीमार आदमी सड़क पर ही दम तोड़ देते हैं।
सवाल उठता है कि लोकतंत्र पर सड़क तंत्र कैसे हावी हो गया? लोकतंत्र को प्रभावी ढंग से चलाने में सरकार व राजनेताओं की भूमिका सबसे महत्वूर्ण होती है। दुर्भाग्य की बात है कि आज समाज में नेताओं की छवि बेहद खराब है। सरकार व विपक्ष के बीच सामान्य संवाद की स्थिति भी नहीं दिखाई देती है। नेताओं के हर बयान को लोग आशंका व अविश्वास की नजर से देखते हैं। पार्टी व नेताओं का चुनावी हित देश के हित से बड़ा हो गया है।
ममता बैनर्जी बार-बार इस वाक्य को दोहरा रही हैं कि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य टाटा ग्रुप को ही क्यों बढ़ावा दे रहे हैं? वहीं बुद्धदेव की तरफ से अखबारों में इस आशय की खबरें प्रकाशित कराई जा रही हैं कि किसी प्रतिद्वंद्वी उद्योगपति के इशारे पर ममता बनर्जी टाटा कंपनी के खिलाफ अभियान चला रही है। सरकारों ने अपना यह अधिकार भी खो दिया है कि यदि कोई पार्टी, नेता या संगठन सर्वस्वीकृत नियम-कायदों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की जाए।
सरकार की पहली जिम्मेदारी है कि वह आम लोगों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा करें। सरकारें इस बात से आतंकित रहती हैं कि यदि उसने शक्ति का प्रयोग किया तो चुनाव में उसका राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। नतीजा हम देख रहे हैं कि पश्चिम बंगाल की बुद्धदेव सरकार ममता के सामने असहाय मुद्रा में खड़ी दिखाई दे रही है। यह कोई नहीं चाहेगा कि सिंगूर के किसानों के हितों की कीमत पर उद्योगों का विकास हो।
देश के सामने यह सवाल नहीं है कि किसानों व उद्योग के हितों के बीच में किसे चुना जाए? देश का हित दोनों के बीच सामंजस्य में है। इसलिए ममता बनर्जी व बुद्धदेव भट्टाचार्य को मिलकर कोई रास्ता निकालना चाहिए। यदि ममता अपनी जिद पर अड़ी रहें तो फिर सरकार को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
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