मुख्य पृष्ठ > सामयिक > विचार-मंथन > विचार-मंथन
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
एटमी करार, दाँव पर सरकार...  Search similar articles
-आचार्य अरुण कानपुरी
आखिर भारत-अमेरिका परमाणु करार में ऐसा क्या है कि संप्रग को अपनी ही सरकार को दाँव पर लगाने की नौबत आ गई। यही नहीं, इस करार से कांग्रेस और उसकी सरकार में शामिल सहयोगी दलों को मिलेगा क्या?

सवाल यह भी उठता है कि क्या इसके पीछे बहुत से लोगों के निजी स्वार्थ छिपे हुए हैं? अगर हाँ तो वे क्या क्या हैं? इसके आलावा क्या करार के परिप्रेक्ष्य में बहुराष्‍ट्रीय कम्पनियों अथवा देश के औद्योगिक घरानों के कोई बड़े स्वार्थ हैं? ऐसे ही और भी कई सवाल हैं, जिनका खुलासा अभी नहीं हुआ है।

वाम दलों सहित भाजपा सीधे-सीधे सत्ताधारी दल पर खुल्लम-खुल्ला आरोप लगा रही है कि संप्रग सरकार को बचाने और संसद में अविश्वास प्रस्ताव के बाद मतदान में संख्या बल जुटाने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त में जुटा है। यही नहीं इसी संख्या बल को जुटाने के लिए संप्रग सरकार देश की विभिन्न जेलों में बंद अपराधी और अभियुक्त सांसदों को रिहा भी करा रही है।

वाम दलों साथ इस करार के विरोध में खड़ी हुई बसपा जेलों में बंद अपने सांसदों को भी छुड़ाने की कवायद अपने प्रदेश ही में कर रही है, क्या यह उचित है? यही नहीं वाम दलों को हर कदम पर कोसने वाली भाजपा अनुशासनहीनता के मामले में निलंबित किए गए अपने ही सांसदों को क्षमादान का फैसला इस दौरान ले चुकी है, वह क्या है?

इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार के मुखिया मनमोहनसिंह ऊपरी तौर पर इस करार को अंजाम तक पहुँचाने को लेकर अडिग हैं तो संप्रग प्रमुख सोनिया व सांसद राहुल गाँधी अपने प्रधनमंत्री की वकालत करते हुए विपक्ष को ललकार रहे हों, लेकिन अंदर ही अंदर सरकार को बचाने के लिए वे भी कोई कोर कसर बाकी नहीं रख रहे हैं। अपनी धुर विरोधी समाजवादी पार्टी को संप्रग ने अपने पाले में पहले ही खींच लिया है।

इसके ठीक दूसरी तरफ संप्रग अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने वेल्लोर की एक सभा और राहुल गाँधी ने रायबरेली में सीधे-सीधे विपक्ष को ललकार कर कहा था कि यह करार तो होकर ही रहेगा, भले ही सरकार जाती है तो चली जाए। वे इस मुद्दे पर हर कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं। याद रहे कि इसके पहले मनमोहनसिंह भी वाम दलों और भाजपा को चुनौती देते हुए कह चुके हैं कि वे प्रधनमंत्री रहें या न रहें, लेकिन इस करार को तो कराकर ही रहेंगे।

सवाल यह उठता है कि इस करार के पीछे ऐसा क्या है, जो संप्रग अपनी सरकार को कुर्बान और विपक्ष सरकार को केन्द्र से हटाने के लिए आमादा हो गए हैं। यहाँ अगर मनमोहन के परमाणु करार पर अडिग रहने के विचार को पढ़ें तो उनका कहना है कि 'भविष्य की पीढ़ी' इसको समझेगी और उसे ही इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा। हालाँकि इसका खुलासा उन्होंने अभी तक नहीं किया।

दूसरी ओर वाम दलों सहित भाजपा यही राग बराबर अलाप रहे हैं कि यह परमाणु करार हमारे देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है, लेकिन इसके साथ-साथ वे यह भी मना नहीं कर रहे हैं कि अगर वे सत्ता में आए तो यह करार नहीं करेंगे। भाजपा तो इस बीच कई बार यह दोहरा चुकी है कि यह करार तो वह भी करेगी, लेकिन अपनी कुछ शर्तों के साथ।

यहाँ बहुत साफ बात यह भी है कि अंतरराष्‍ट्रीय ऊर्जा संगठन से जुड़े बहुत से देश इस पक्ष में नहीं हैं कि भारत के साथ यह करार हो। कारण यह कि विकासशील भारत भविष्य में परमाणु ऊर्जा की सम्पन्नता के संदर्भ में विकसित देशों की पंक्ति की ओर आगे हो जाएगा।

वाम दल इस करार के बिलकुल खिलाफ हैं। इन दलों के नेताओं का कहना है कि इस करार के बाद अमेरिका की भारत में दखलंदाजी पूरी तरह बढ़ जाएगी, जिससे देश की सुरक्षा व्यवस्था को पूरा खतरा होगा। वाम दलों से पूछा जाना चाहिए कि क्या अभी यह खतरा मौजूद नहीं है?

कुल मिलाकर पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों के अध्यक्ष अनिल काकोकर और देश के कई वैज्ञानिक यह मानते हैं कि यह करार देश के हित में है तो वे क्या किसी राजनीति से प्रेरित होकर यह कह रहे हैं?

इस करार को लेकर देश और अंतरराष्ट्रीय जगत में इतने पैंच हैं कि यह हो भी पाएगा या नहीं, इसमें पूरी तरह से शक है। वजह यह कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति अभी इस करार के पक्ष में हैं तो भविष्य के राष्‍ट्रपति ओबामा ने इसी बीच साफ कर दिया है कि इस करार में वे संशोधन करेंगे। ये संशोधन क्या होंगे, ये तो वे ही जानें लेकिन इससे मौजूदा सरकार के माथे पर बल अवश्य पड़ गए हैं।
और भी
राजनीति में सभी 'नंगे'
बिके हुए समझौतावादी
भारत में फैलता 'लाल गलियारा'
इक ख्बाव तो आँखों में है, इक चाँद तेरे तकिए तले
आठ+पाँच, नतीजा सिफर
व्यावसायिकता का विकृत खेल