गुलजार हिंदी फिल्मों के गीतकार हैं, क्या इससे उनकी साहित्यिकता कम हो जाती है। बिलकुल नहीं। यदि उनके गीतों का गंभीर पाठ किया जाए तो वे अपने साहित्यिक मूल्यों के लिए भी उतने ही अर्थवान हैं। झूम बराबर झूम के एक गीत का उदाहरण लिया जा सकता है। यह उदाहरण मैं इसलिए जान कर के दे रहा हूँ कि वे अपनी गैर फिल्मी रचनाओं से तो यह साबित कर चुके हैं कि वे एक बेहतरीन शायर हैं लेकिन उनकी कलात्मकता और रचनाधर्मिता ने गीतों को भी कितना अर्थवान बनाया है यह छिपा नहीं है। इस गीत को यहाँ पढ़ें और मौका मिले तो इसे सुनें भी। इसकी धुन भी बहुत नशीली है। इसके अंतरे मैं यहाँ दे रहा हूँ। आ नींद का सौदा करें इक ख्वाब दें इक ख्वाब लें इक ख्वाब तो आँखों में है इक चाँद तेरे तकिये तले
कितने दिनों से ये आसमाँ भी सोया नही है, इसको सुला दें
बोल ना हल्के हल्के बोल ना हल्के हल्के
उम्रे लगी कहते हुए दो लफ़्ज़ थे एक बात थी वो इक दिन सौ साल का सौ साल की वो रात थी
ऐसा लगे जो चुपचाप दोनों पल-पल में पूरी सदियाँ बिता दें
बोल ना हल्के हल्के बोल ना हल्के हल्के
मुझे कहने दीजिए, गुलजार ने अपनी महीन कल्पना और गहरी संवेदनशीलता से हमारे लिए ऐसे नगमे लिखे हैं, ऐसी नज्में लिखी हैं कि हम अपनी किसी भूली मोहब्बत को एक गहराती रात में, छिटकी चाँदनी में फिर से याद कर धड़कने लगते हैं। उनके लफ्ज हमारे भीतर एक आत्मीय संसार रचते हैं, जहाँ हम अपने टूटे-बनते रिश्तों की डोर को, उसके रंगों को और उसकी खुशबू को महसूस करने लगते हैं।
हम उस चाँद को अपने तकिए तले या सिरहाने में दु:ख में या मोहब्बत में पास में चमकता महसूस करते हैं। वे हमारे लिए ख्वाब बुनते हैं और हमारे अकेलेपन धीरे से कहीं रख जाते हैं। वे हमारी आँखों में सो चुके किसी ख्वाब को जगा जाते हैं, प्रेम की टूटन में पलकों से टपकने वाली आँसू की बूँदों को थाम लेते हैं। वे रूह दिखाते हैं और महसूस कराते हैं। वे खामोशी को रचते हैं और उसे एक गहरा अर्थ और गरिमा देते हैं। हम इसी खामोशी में अपनी आह और कराह को सुन पाते हैं और एक अच्छे इंसान बने रहते हैं।
कलाएँ यही करती हैं कि वे आपको ख्वाब देती हैं, जीने की ताकत देती हैं और आपको एक बेहतर इंसान बनाए रखती हैं। यह काम गुलजार अपने गीतों-नज्मों के जरिए बखूबी कर जाते हैं। वे हमें ख्वाब दिखाते हैं, कि वह कहाँ-कहाँ हो सकता है, चुपके से किसी रात में खिलता हुआ। और वे हमें प्रेम का और मन का आदिम प्रतीक चाँद भी दिखाते हैं, बार-बार, अलग-अलग ढंग से, जो हमें, हमारे संसार को ज्यादा खूबसूरत बनाता है। हमें कल्पनाशील और संवेदनशील बनाता है। इसलिए उन्होंने कितनी खूबसूरती से यह कहा है कि-इक ख्वाब तो आँखों में है और इक चाँद तेरे तकिए तले।
इस ब्लॉग पर जाइए और इस अजी़म फनकार से एक बार फिर मुलाकात कीजिए और उस ब्लॉगर कुश का शुक्रिया अदा कीजिए जो हमें गुलजार के गीत पढ़ाता-सुनाता है।
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