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इक ख्वाब तो आँखों में है, इक चाँद तेरे तकिए तले
ब्लॉग-चर्चा में इस बार 'गुलजारनामा'
गुलजार ने कविता में प्रयोग भी किए हैं और उसे गुलजार साहब ने त्रिवेणी कहा। इसे खूब सराहा भी गया। अपने द्वारा ईजाद की गई इस विधा के बारे में खुद गुलजार क्या कहते हैं मुलाहिजा फरमाएँ। वे कहते हैं- बड़ी सीधी सी फॉर्म है, तीन मिसरों की लेकिन इसमें एक जरा-सी घुंडी है। हल्की सी। पहले दो मिसरों में बात पूरी हो जानी चाहिए। गजल के शेर की तरह वह अपने आप में मुकम्मल होती है। तीसरा मिसरा रोशनदान की तरह खुलता है। उसके आने से पहले दो मिसरों के मफ़हूम पर असर पड़ता है। उसके मानी बदल जाते हैं।

तो गुलजार की इन त्रिवेणियों में स्नान करने का पुण्य आप भी कमा लें। लिहाजा कुछ मिसालें पेश हैं।
माँ ने जिस चाँद सी दुल्हन की दुआ दी थमुझ
आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखमैंन
रात भर रोटी नज़र आया है वो चाँमुझ
और दूसरी त्रिवेणी यह है-
सारा दिन बैठा,मैं हाथ में लेकर खा़लकास
रात जो गुज़री,चाँद की कौड़डाल गई उसमे
सूदखो़र सूरज कल मुझसे ये भी लजाएगा

इसके अलावा इस ब्लॉग पर आस्था, रेनकोट, झूम बराबर झूम जैसे फिल्मों के गीत भी हैं। गुलजार और मानसून, गुलजार के गीतों में साउंड का कमाल पोस्ट्स भी पढ़ने लायक हैं। यही नहीं इस ब्लॉग पर गुलजार की किताबों पर बातें हैं और किताबों पर लिखी एक बहुत ही मार्मिक नज्म भी है जिसका शीर्षक है- किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से। उनकी गुलाब-सी नाजुक इस नज्म की एक पंखुरी आपकी नजर

किताबों से जो जाती राब्ता था, कट गया ह
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थ
कभगोदी में लेते थ
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाक
नीम सजदे में पढ़करते थे, छूते थे जबीं स
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भ
मगर वो जकिताबों में मिला करते थे सूखे फू
और महके हुए रुक्क
किताबें मँगाने, गिरनउठाने के बहाने रिश्ते बनते थ
उनका क्या होग
वो शायद अब नही होंगे !!
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