इसमें गुलजार साहब के गीत पढ़े जा सकते हैं, सुने जा सकते हैं। गुलजार पर टिप्पणियाँ हैं। नज्में हैं और उनकी ईजाद की गई त्रिवेणियाँ भी हैं। इसमें उनके फिल्मी गीतों और नज्मों के साथ ही गैर फिल्मी नज्मों को पढ़ने का मजा लिया जा सकता है। इस ब्लॉग की शुरुआत, जाहिर है गुलजार पर एक परिचयात्मक टिप्पणी के साथ होती है। ‘गुलजार एक परिचय’ शीर्षक इस पोस्ट में आप गुलजार के बारे में जानकारियाँ हासिल कर सकते हैं कि कब उन्होंने एक गीतकार और फिल्मकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की।
उन्हें कब पहली बार फिल्म फेयर और राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। ये पुरस्कार कब-कब और किन-किन फिल्मों और गीतों के लिए मिले। उन्होंने किन फिल्मों का निर्माण किया, किन फिल्मों के लिए पटकथाएँ लिखीं और किन फिल्मों का निर्देशन किया। लेकिन इन तमाम जानकारियों से भी ज्यादा खास बात यह है कि यह ब्लॉग गुलजार के बेहतरीन नगमों-नज्मों से आपका परिचय छोटी-छोटी लेकिन आत्मीय टिप्पणियों के जरिए कराता है। एक बानगी देखिए-
सुबह की ताजगी हो, रात की चाँदनी हो, साँझ की झुरमुट हो या सूरज का ताप, उन्हें खूबसूरती से अपने लफ्जों में पिरो कर किसी भी रंग में रंगने का हुनर तो बस गुलजार साहब को ही आता है। मुहावरों के नए प्रयोग अपने आप खुलने लगते हैं उनकी कलम से। बात चाहे रस की हो या गंध की, उनके पास जाकर सभी अपना वजूद भूल कर उनके हो जाते हैं और उनकी लेखनी में रच-बस जाते है। यादों और सच को वे एक नया रूप दे देते हैं। उदासी की बात चलती है तो बीहड़ों में उतर जाते हैं, बर्फीली पहाडि़यों में रम जाते हैं। रिश्तों की बात हो तो वे जुलाहे से भी साझा हो जाते हैं। दिल में उठने वाले तूफान, आवेग, सुख, दु:ख, इच्छाएँ, अनुभूतियाँ सब उनकी लेखनी से चलकर ऐसे आ जाते हैं जैसे कि वे हमारे पास की ही बातें हों। जैसे कि बस हमारा दु:ख है, हमारा सुख है।
एक बानगी देखिए- जाहिर है यह टिप्पणी गुलजार साहब की रचनाओं की खासियत ही नहीं बताती बल्कि उनके प्रति यह टिप्पणी लिखने वाले कुश एक खूबसूरत खयाल के मोहब्बत का इजहार भी हैं। इस ब्लॉग की एक पोस्ट में कुश ने यह नज्म दी है। आप भी इसमें कही इक बात का, महीन बात का मजा लें-नज़्म उलझी हुई है सीने में मिसरे अटके हुए हैं होठों पर उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा बस तेरा नाम ही मुकम्मल है इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी। गुलजार की इस नज्म में कही गई बात पर जरा गौर फरमाएँ। इसमें लफ्ज सादा हैं, कहने का ढंग सादा है। इक बात है गहरी और जिस बात को लिखा गया है वह कागज भी सादा है और एक पीड़ा है कि मेहबूब का खयाल ही इतना घना है कि बस नाम लिखके वह बैठा है और सीधे दिल से निकली बात कहता है कि बस तेरा नाम ही मुकम्मल है, इससे बेहतर भी नज्म क्या होगी। अब कौन न मर जाए इस बला की सादगी पर। यही गुलजार का जादू है। |