दूसरी बात, देश के सबसे विविधतापूर्ण इस राज्य की व्यवस्था एक तरह से अत्यंत केंद्रीकृत है। नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच जुलाई 1952 में हुए क्षेत्रीय स्वायत्तता समझौते की बात करना तो दूर, राज्य में पंचायती राज जैसी विकेंद्रीकृत व्यवस्था आज तक लागू नहीं हुई है, जो कि देश के शेष भागों में आगे बढ़ती जा रही है। आज मुख्यमंत्री का बहुत-सा समय उन स्थानीय मुद्दों को हल करने में लग जाता है, जो वास्तव में पंचायत स्तर के होते हैं।
इसी तरह यहाँ कोई रीजनल बोर्ड, जिला बोर्ड या ब्लॉक स्तर का बोर्ड नहीं है, जो अपने स्तर पर जनसमस्याओं का निराकरण कर सके। हालाँकि कांग्रेस सरकार विकास को मुख्य मुद्दा बनाती रही है, लेकिन इससे जनता की तकलीफें दूर नहीं हुई हैं। आज भी वहाँ विभिन्न स्तरों पर धर्मनिरपेक्ष विधिसम्मत फोरम की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
असल में धर्मनिरपेक्ष परंपराएँ और पहचान ही जम्मू की ताकत रही हैं। जमीन विवाद को हिन्दू समस्या बनाकर नेता लोग जम्मू के हितों को नुकसान ही पहुँचा रहे हैं। आज केंद्रीय व्यवस्था में जम्मू क्षेत्र के हिन्दुओं के साथ ही मुसलमान भी राजनीतिक और सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ गए हैं। जम्मू क्षेत्र के भदरवाह, राजौरी, बनिहाल और साम्बा इलाकों में सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं।
यदि यही हाल रहा तो राज्य के बँटवारे की बात उठ सकती है, जो कि न तो जम्मू के हित में होगी और न ही कश्मीर के। शायद इसी तथ्य को समझते हुए मुस्लिम कट्टरपंथी यह कहते हैं कि वे न तो यात्रा के खिलाफ हैं और न ही हिन्दुओं के। उनका विरोध तो सरकार से है।
चूँकि जम्मू भौगोलिक रूप से कश्मीर के लोगों को शेष भारत से जोड़ने का एक सेतु है इसलिए उन्हें कश्मीरी अलगाववादियों और सरकारी फैसलों पर विरोध जताते हुए भी सेतु वाली अपनी भूमिका को नहीं भूलना चाहिए। उन्हें संघर्ष के शांतिपूर्ण और अनुशासित मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, जो हिंसक प्रदर्शनों से कहीं बेहतर है उन्हें मजबूत बनाने के लिए। ( लेखक कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ हैं।) |