वेबदुनिया के संपादक श्री जयदीप कर्णिक के आलेख 'मीडिया खुद को भी तो कटघरे में खड़ा करे!!' पर यूँ तो कई प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुई हैं और उन्हें हमने आलेख के साथ प्रकाशित भी किया है, परंतु आज की पत्रकारिता के संदर्भ में आचार्य श्री अरुण कानपुरी के विचार बहुत ही मार्मिक है। आंशिक रूप से संपादित कर श्री कानपुरी की प्रतिक्रिया को हम जस का तस प्रकाशित कर रहे हैं।
प्रिय बंधु, आरुषि कांड पर मीडिया को कठघरे में खड़ा किए जाने के आपके सवालिया आलेख पर भेजी गई मेरी प्रतिक्रिया को प्रकाशित करने और उसका प्रतिउत्तर देने के लिए आपको और वेबदुनिया को साधुवाद।
दरअसल, जो सवाल आपने आज उठाया है, उसको मैं अपनी पत्रकारिता में पिछले तीस साल से झेल रहा हूँ। ऐसे बुनियादी सवाल आज 'नक्कार खाने में तूती' की आवाज बना दिए गए हैं। वजह यह है कि इस कलिकाल के वर्तमान चरण में गला काटू, पैसा बटोरू और सत्तालोलुप मीडिया 'गिरोहबाजों' में पंडित विष्णुराव पराड़कर और गणेश शंकर विद्यार्थी की पावन और सकारात्मक पत्रकारिता को अप्रासंगिक बनाकर एक अपना 'आपातकाल' लागू कर दिया है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि पराड़करजी और विद्यार्थीजी अप्रासंगिक हो गए हों, लेकिन इन व्यावसायिक 'गिरोहबाजों' ने अपने इतने संजाल फैला दिए हैं कि अर्थशास्त्री माल्थस का वर्षों पहले लिखा गया यह सिद्धांत- 'बुरी मुद्रा, अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है' को इन्होंने ही साबित कर दिया है।
आप और हम जैसी सोच के लोग हाशिए पर डाल दिए गए हैं। यही नहीं आपातकाल दौरान जेल में मैंने फैज अहमद 'फैज' को भी पढ़ा था। उनका यह शेर मेरे जेहन में ऐसे हालातों (आरुषि कांड) के दौरान उभर आता है:-
मात-ए-लौह कलम छिन गई तो क्या गम है, के खून-ए-दिल में डूबो ली हैं उँगलियाँ मैंने।
बहरहाल, आपने मीडिया को चेताया, अच्छा किया, लेकिन इन 'गिरोहबाजो' की 'अट्टहास' को भी महसूस करो। अगर इन्होंने तुम्हारे इस आलेख को पढ़ा तो...। मीडिया खुद को भी तो कटघरे में खड़ा करे!!
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