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नाभिकीय समझौते की आलोचनाओं का जवाब  Search similar articles
- अवधेश कुमार

भारत-अमेरिका असैनिक नाभिकीय सहयोग समझौते के विरोध में कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद उनके द्वारा दिए गए कारणों की पड़ताल आवश्यक है। कम्युनिस्ट दल, जो ज्यादातर मामलों में चीन से सहमति जताते हैं, नाभिकीय ऊर्जा एवं नीतियों पर उनसे सीख लेने को तैयार नहीं हैं।

इनका कहना है कि नाभिकीय रिएक्टरों की बिजली महँगी है, ये हमारी
  हमारे पास नाभिकीय ईंधन एवं प्रतिबंधों के कारण उपयुक्त तकनीक नहीं है, इसलिए आरंभिक लागत मूल्य ज्यादा होगी, लेकिन इसका उत्पादन सस्ता है और प्रतिबंध हटने व तकनीकीकुशलता प्राप्त करने के साथ यह और कम होगी      
आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं करेगी एवं इस ओर जाने की आवश्यकता नहीं। यानी जिस सिद्धांत पर यह समझौता टिका है ये उसे ही नकारते हैं। चीन ने 2010 से 2015 तक 22300 मेगावाट नाभिकीय बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा है। 2014 से 2018 तक इसने अतिरिक्त 19,400 मेगावाट का लक्ष्य तय किया है। यानी 41 हजार 700 मेगावाट।


प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, एबी वर्धन, डी. राजा आदि अगर चीन की नीतियों को समझते तो वे समझौते का विरोध नहीं करते। नाभिकीय बिजली मूल्यों पर हाल के शोध बताते हैं कि यह कोयले, गैस और तेल से उत्पादित बिजली से महँगी नहीं है।

हमारे पास नाभिकीय ईंधन एवं प्रतिबंधों के कारण उपयुक्त तकनीक नहीं है, इसलिए आरंभिक लागत मूल्य ज्यादा होगी, लेकिन इसका उत्पादन सस्ता है और प्रतिबंध हटने व तकनीकीकुशलता प्राप्त करने के साथ यह और कम होगी। नाभिकीय रिएक्टरों के व्यापार में उतरने के बाद तो यह लाभकारी होगा।

तेल के बढ़ते दाम एवं ताप बिजलीघरों सहित फैक्टरियों में प्रयुक्त कोयले व तेल से निकलने वाले कार्बन के कारण धरती के बढ़ते तापमान पर पूरी दुनिया चिंतित है। इस समय साफ-सुथरे बिजली की ओर बढ़ने का माहौल है एवं सूर्य की किरणों से या हवा के झोंकों आदि से पैदा की जाने वाली बिजली जैसे अक्षय स्रोतों के साथ सबसे व्यावहारिक उपलब्ध परीक्षित विकल्प हमारे सामने नाभिकीय ही है। वैसे भी हम अपनी आवश्यकता का 80 प्रतिशत तेल और गैस आयात करते हैं।

विकिरण के खतरे की बात समझ में आती है। हालाँकि आधुनिक ढंग के रिएक्टर चेर्नोबिल के समय से ज्यादा सुरिक्षत हैं। वाम दल कहते हैं कि भारत अपनी बिजली आवश्यकता की पूर्ति नाभिकीय रिएक्टरों से नहीं कर सकता। इस समय हम 3800 मेगावाट से भी कम बिजली पैदा कर पाते हैं और इसमें 2020 तक 20 हजार मेगावाट भी बहुत बड़ा लक्ष्य लगता है।

लेकिन नाभिकीय बिजली की संभावनाओं पर अध्ययन करने वाली व्यावसायिक फर्मों ने भी भारत की क्षमता को असीमित करार दिया है। मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार चिदंबरम ने जोर देकर कहा है कि समझौते के साथ आधुनिक तकनीकों वाला तेज ब्रीडर रिएक्टर आने से 2050 तक हमारी क्षमता दो लाख मेगावाट हो सकती है।

परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोडकर ने 9 जुलाई को मुंबई में आयोजित भारत-अमेरिका नाभिकीय संधि पर आयोजित गोष्ठी में कहा कि 2012 से 2020 के बीच प्रतिवर्ष 40 गीगावाट के नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र या ईंधन आयात कर सकेगा। अगर आयात एक दशक भी देरी से होता है तो घाटा 180 गीगावाट का होगा।
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