- अमूल्य गांगुली
जब वामपंथी मनमोहनसिंह सरकार से समर्थन वापस लिए जाने की बार-बार धमकी दे रहे थे तो उनके दिमाग में दो ही बातें थीं- पहली सरकार को डराकर परमाणु समझौते से पीछे हटाना और दूसरी, यदि सरकार इस समझौते पर आगे कदम बढ़ाती है तो उसे मुश्किल में डालना। उन्होंने यह बिलकुल नहीं सोचा होगा कि जब इस धमकी को अमल में लाएँगे तो सरकार का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, उलटे वे ही हँसी के पात्र बन जाएँगे।
हालाँकि यूपीए सरकार को आज भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। पर भारतीय राजनीति में क्षणभंगुर आस्था के चलते किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि कल को समाजवादी पार्टी में, संभवतः भाजपा की मदद से, मायावती के पक्ष में टूट हो जाए और कुछ सांसद उधर से इधर आ जाएँ।
लेकिन इधर समाजवादी और कांग्रेस पार्टी भी इस खेल में कोई बच्चे नहीं हैं जो अपनी ताकत बढ़ाने के लिए ऐसा ही पलटवार न कर सकें। और चूँकि परमाणु समझौते को कॉरपोरेट क्षेत्र का भी समर्थन हासिल है इसलिए संभव है कि आवश्यकता पड़ने पर सरकार को बचाने के लिए इस क्षेत्र की बड़ी तोपें भी सामने आ सकती हैं।
इस तरह के पेचीदा समझौतों में जबकि अक्सर बात दो पक्षों के बीच कम अंतर के बीच बहुमत साबित करने पर अटक जाती है, सबसे उल्लेखनीय तथ्य वाम दलों की फजीहत का है। इस समझौते के खिलाफ महीनों से डींगें हाँकने वाले वामपंथी आज अचानक ताश के पत्तों में जोकर बनकर रह गए हैं। उनके राजनीतिक बेढंगेपन की पोल जनता के सामने खुल गई, सो अलग।
दूसरी तरफ उनकी दया की भीख पर जीवन-यापन कर रही सरकार उसी समाजवादी पार्टी की मदद से उनको धता बताने में कामयाब हो गई है जो कभी वामपंथियों की ही दोस्त थी। समाजवादी पार्टी को भी यह ठीक लगा कि उत्तरप्रदेश में कोई असर नहीं रखने वाले वामपंथियों से तो केंद्र सरकार के साथ जाना चाहिए ताकि मायावती के बढ़ते प्रभाव का सामना किया जा सके।
गठबंधन में इस फेरबदल का नतीजा यह हुआ है कि परमाणु समझौते की पीठ में छुरा भोंकने का वामपंथियों का सपना ही चूर-चूर नहीं हुआ बल्कि तीसरा मोर्चा बनाने के उनके प्रयास भी औंधे मुँह जमीन पर आ गिरे। इन धक्कों के अलावा वामपंथियों के लिए यह भी एक हकीकत बनने जा रही है कि देर-सबेर जब भी चुनाव होंगे, उन्हें नुकसान ही उठाना पड़ेगा।
वैसे भी हाल ही में पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत और नगर पालिका चुनावों ने भी यह साबित कर दिया है कि वहाँ अब लाल रंग की चमक फीकी पड़ती जा रही है।
इसमें कोई शक नहीं कि नंदीग्राम और सिंगुर मामलों पर जनता उनसे नाराज रही है। और चूँकि यह नाराजगी सीधे तौर पर सीपीई (एम) के साथ है अतः अन्य वाम दलों ने भी अपने इस बड़े भाई से किनारा करना शुरू कर दिया है।
आरएसपी द्वारा सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया (एसयूसीआई) और माओवादियों समेत अन्य पार्टियों को लेकर एक प्रतिद्वंद्वी वाम मोर्चा बनाने की पहल को इसके साक्ष्य के तौर पर लिया जा सकता है। केरल में भी वामपंथ की तबीयत ठीक नहीं है। वहाँ मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन और पार्टी प्रमुख पिनाराची विजयन के बीच खींचतान मची हुई है तो सीपीई (एम) और सीपीआई के रिश्ते भी ठीक नहीं चल रहे।
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