- डॉ. वेदप्रताप वैदिक कमान भी टूटी तो किस मुद्दे पर? परमाणु-सौदे पर! कांग्रेसियों और वामपंथियों ने अपने आपको इतिहास के कटघरे में खड़ा कर लिया है। वामपंथियों के पास एक वाजिब बहाना यह है कि उन्होंने अमेरिकी साम्राज्यवाद के आगे घुटने नहीं टेके। उसने अपने सैद्धांतिक घाव को खुजला लिया, लेकिन कांग्रेस के पास कौन-सा बहाना है?
वह आज तक यह नहीं बता पाई कि परमाणु-सौदे में ऐसा क्या है, जिसकी वजह से सरकार गिराने का खतरा मोल लिया जाए। कांग्रेसियों और वामपंथियों ने एक अ-मुद्दे को मुद्दा बना दिया। दोनों को महँगाई नहीं दिखती, गरीबी नहीं दिखती, नग्न उपभोक्तावाद नहीं दिखता, भारत और इंडिया की खाई नहीं दिखती। उन दोनों को सिर्फ जॉर्ज बुश दिख रहे हैं।
एक उन्हें अपने सिर पर बिठाना चाहता है और दूसरा उन्हें अपने पैरों तले रौंदना चाहता है। भारत की नकली राजनीति और नकली नेताओं की पोल इस परमाणु-सौदे ने खोल दी है। दिल्ली में चल रही नौटंकी क्या यह नहीं बताती कि हमारे राजनीतिक दल आम जनता के दुःख-दर्दों के प्रति पत्थर दिल हो गए हैं।
प्रधानमंत्री खुश हो सकते हैं कि वामपंथियों के हटने के बावजूद उनकी सरकार टिकी हुई है। ये टिकना भी क्या टिकना है? यदि लोकसभा में विश्वास-मत मिल गया तो भी क्या होगा? सरकार की नैतिक सत्ता तो समाप्त हो जाएगी। यह समझौता इतना नाजुक है कि संसद की सर्वसम्मति या तीन-चौथाई बहुमत के बिना ऐसे समझौते किए ही नहीं जाने चाहिए।
अब जो नए समीकरण की सरकार बनेगी, वह कार्यवाहक सरकार से ज्यादा क्या होगी। ऐसी सरकार द्वारा किए गए सौदे को चुनाव के बाद आई सरकार अगर उलट दे तो इसमें गलत क्या होगा?
इस सौदे के कारण सरकार गिर जाती तो बेहतर होता। कांग्रेस और वामपंथ | | क्या कांग्रेस के नए टेकेदार (ठेकेदार नहीं) इन वर्गों के लिए कोई दबाव डालेंगे? वे कांग्रेस को खूब जानते हैं और समझते हैं। वे कांग्रेस को किन्हीं महान आदर्शों से प्रेरित होकर टेका नहीं दे रहे हैं। यह टेका वे अपने खातिर ही दे रहे हैं |
| |
का फायदा होता। कांग्रेस तो कुएँ से निकली और खाई में गिरी। समाजवादी तो समाजवादी, अब एक-एक, दो-दो सांसदों वाली पार्टियाँ भी खम ठोक रही हैं। घूरे के दिन भी बहुरे! वामपंथी तो बेचारे कुछ सैद्धांतिक मसलों पर सरकार को तंग करते थे, अब मेंढकों को तौलने के लिए सरकार को सोने और चाँदी के बाट धरने होंगे। सारे मेंढक सरकारी पलड़े में सालभर टिके रहेंगे, यह भी पता नहीं।
खरीद-फरोख्त की राजनीति हमारे लोकतंत्र की चादर को तार-तार कर देगी। एक छोटे से सौदे को बचाने के लिए मनमोहन सरकार को रोज पता नहीं कितने सौदे करने पड़ेंगे। इन सौदों का सीधा असर कांग्रेस की प्रांतीय राजनीति पर भी पड़ेगा। साधारण कार्यकर्ता दिग्भ्रमित और निराश भी होगा।
नए इंतजाम के बावजूद चुनाव में तो जाना ही पड़ेगा। कांग्रेस का मुद्दा क्या होगा? सौदे पर सरकार नहीं गिरी, इसलिए सौदा तो मुद्दा बन ही नहीं पाएगा। जैसे सरकार आज सौदे की उपयोगिता सिद्ध नहीं कर पा रही है, वैसे ही उसके होने के बाद भी नहीं कर पाएगी। ऐसी स्थिति में कांग्रेस चुनाव तभी जीत सकती है, जबकि वह आर्थिक मोर्चे पर कुछ चमत्कारी काम कर दे।
अब जबकि वामपंथ का रोड़ा हट गया है, सरकार के पास कोई बहाना नहीं रह गया है। अब वह सरपट दौड़े और अपने मनचाहे निर्णय करे लेकिन पिछले चार साल का रिकॉर्ड बताता है कि मुल्लाजी की दौड़ सिर्फ मस्जिद तक ही जाती है। सिर्फ 20-25 करोड़ मध्यमवर्गीय और उच्चवर्गीय लोगों के अलावा उदारीकरण का फायदा किसे मिला है? गरीब, ग्रामीण, पिछड़े, दलित, आदिवासी तो पहले से भी ज्यादा कष्ट में हैं।
क्या कांग्रेस के नए टेकेदार (ठेकेदार नहीं) इन वर्गों के लिए कोई दबाव डालेंगे? वे कांग्रेस को खूब जानते हैं और समझते हैं। वे कांग्रेस को किन्हीं महान आदर्शों से प्रेरित होकर टेका नहीं दे रहे हैं। यह टेका वे अपने खातिर ही दे रहे हैं। बिना माँगे ही दे रहे हैं। गले पड़ रहे हैं। कांग्रेस मना करे तो भी वे टेका देंगे।
|