- विष्णुदत्त नागर
अभी तक यही सुनते थे कि जानवर भी हमारे बदन की गंध से अपने कार्यकलापों को अंजाम देते हैं, लेकिन अब सुदूर स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी भारतीयों के जिस्म की बू से आकर्षित हो रही हैं। यह गंध यूनीलीवर कंपनी के लंदन और रोटरडेम के मुख्यालयों तक पहुँच गई है।
यूनीलीवर के वैश्विक उपाध्यक्ष रसेल टेलर द्वारा हाल ही में ब्रिटिश मीडिया को | | विदेशी व्यापारियों तक यहाँ के गुलाब जल और इत्र की सुगंध पहुँच जाती थी और उन्हें आकर्षित करती थी। बहुधा शेर गंध के आधार पर जंगली जानवरों का शिकार करते हैं। यूनीलीवर भी अब भारतीयों की गंध के सहारे भारत आने को बेताब है |
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दिए गए साक्षात्कार में भारतीयों के शरीर पर टिप्पणी करते हुए कहा गया है कि 'भारत समेत एशिया के अन्य देशों के लोग अपने शरीर की गंध के बारे में सचेत नहीं हैं। इसलिए उनके अनुसार भारत में सुगंध प्रसाधन का उपयोग लगभग नगण्य और एशिया में तो केवल 7 प्रतिशत है।'
उन्होंने सुझाव दिया कि भारत और एशिया के अन्य देशों के लोगों को अपने पसीने की बू, दाग-धब्बे के बारे में जागरूक करने का अभियान चलाना चाहिए। उनकी मान्यता है कि सभी मनुष्यों को पसीना आता है और उनके शरीर में विशेष प्रकार की गंध उपजती है।
ब्रिटिश मीडिया को याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि सुगंधी उपकरणों ने बाजार में प्रवेश किया तब बहुत से देशों को उनका उपयोग करने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ी। भारत में जहाँ सुगंधी प्रसाधनों का उपयोग 2 प्रतिशत से भी कम है, सही दिशा में अभियान चलाकर इसे 50 प्रतिशत तक किया जा सकता है। भारत का एक बड़ा बाजार है और यहाँ की आबोहवा को देखते हुए सुगंधी स्प्रे के विस्तार के बड़े अवसर हैं।
संभवतः ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ यहाँ की प्राथमिक आवश्यकताओं, परिवेश और परंपराओं से अनभिज्ञ हैं। हम सुगंधी वस्तुओं जैसे इत्र और गुलाब जल आदि से अपरिचित नहीं थे। जहाँगीर-नूरजहाँ के गुलाब की सुगंध से भरे स्नानागार और कन्नौज के इत्र अभी भी याददाश्त में ताजा हैं।
विदेशी व्यापारियों तक यहाँ के गुलाब जल और इत्र की सुगंध पहुँच जाती थी | | कुछ समय हुआ बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ग्रामीण सौंदर्य प्रतियोगिता की, जिसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे सौंदर्य प्रसाधनों का प्रवेश और प्रचार करना था जिनसे कोई भी लड़की सौंदर्य शिखर पर पहुँचने में कामयाब हो सकती है |
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और उन्हें आकर्षित करती थी। बहुधा शेर गंध के आधार पर जंगली जानवरों का शिकार करते हैं। यूनीलीवर भी अब भारतीयों की गंध के सहारे भारत आने को बेताब है। लेकिन जंगली जानवरों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शिकार में फर्क है।
जानवर चिंगाड़ मारकर शिकार करते हैं जबकि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ चुपचाप विज्ञापन के आड़ में बाजार में आती हैं और पहले वस्तुओं की आपूर्ति कर बाजार में माँग पैदा कर अपने शिकार को आकर्षित करती हैं। कुछ समय हुआ बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ग्रामीण सौंदर्य प्रतियोगिता की, जिसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे सौंदर्य प्रसाधनों का प्रवेश और प्रचार करना था जिनसे कोई भी लड़की सौंदर्य शिखर पर पहुँचने में कामयाब हो सकती है।
ऐसी प्रतियोगिता की मंशा नैसर्गिक सौंदर्य खोजने की नहीं, बल्कि उपभोक्ता की जेब खोजने की रहती है। ज्ञातव्य है कि कुछ समय पूर्व तक एक साबुन बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी के विज्ञापन में ग्रामीण युवक से कहा जाता था कि साबुन का उपयोग करने से शहर की मेम भी उस पर रीझ जाएगी।
मीडिया द्वारा आपत्ति प्रकट करने पर प्रचार-प्रसार ही नहीं, साबुन का उत्पादन भी बंद हुआ। पौराणिक कथाओं में पढ़ा है कि कामदेव ने भगवान शिव की समाधि को खंडित करने के लिए अपने मायाजाल का विस्तार किया था। जिस कामदेव ने सरोवरों में कमल खिलाकर, सुंदर भौरों के समूह से गुंजार कराकर, राजहंस, कोयल और तोते की सुरीली बोली लगवाकर और अप्सराओं को नचाकर शिवजी की अचल समाधि तोड़ी थी उनमें से कोयल, तोते, भौरें तो गायब हो गए, लेकिन सौंदर्य प्रतियोगिताओं के माध्यम से ग्रामीणों की जीवनशैली को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है।
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