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गुलामी के जिक्र में केवल ब्रिटिश शासन का ही ख्याल आता है। यह वाजिब भी है इसलिए कि उसी का उल्लेख गुलामी के तौर पर इतिहास में किया गया है। और इतिहास भविष्य की ओर बढ़ने का दिशा दर्शक होता है। बहुत कम ऐसा होता है कि इतिहास का विश्लेषण कर उससे असहमति का आधार तय किया जाए ताकि बेहतर भविष्य की राह का निर्माण किया जा सके।

आमतौर पर इतिहास को तोड़-मरोड़कर भविष्य की राह बनाने के प्रयास अ
  चालीस के दशक में ब्रिटिश राजनीति से मिली मुक्ति को आजादी कहा गया था। उस आजादी तक पहुँचने की राह तो काँटों-कंकड़ों से मुक्त करने के प्रयास कितनी प्रतिबद्धता, ईमानदारी, निष्पक्षता और दृढ़ता के साथ किए गए थे, यह इतिहास में दर्ज है      
धिक किए जाते हैं। राह फिर पथरीली बन जाए या भविष्य धुँधला जाए, इसकी परवाह नहीं की जाती है। आज यदि राह के कंकड़ पैरों के तलवों को छलनी कर रहे हैं तो इसकी जिम्मेदारी बीते समय में व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करने वालों की है। भविष्य में भी राह यदि पैरों को लहूलुहान करेगी तो उसके लिए आज की जा रही छेडछाड़ को ही जिम्मेदार माना जाएगा। इस बात को आज समझना पड़ेगा तब कल सुनहरा हो सकता है।


चालीस के दशक में ब्रिटिश राजनीति से मिली मुक्ति को आजादी कहा गया था। उस आजादी तक पहुँचने की राह तो काँटों-कंकड़ों से मुक्त करने के प्रयास कितनी प्रतिबद्धता, ईमानदारी, निष्पक्षता और दृढ़ता के साथ किए गए थे, यह इतिहास में दर्ज है। ये तथ्य उन गिने-चुने लोगों की जुबान पर भी हैं जो अभी उस काल की स्मृतियों को जीवंत बनाए हुए हैं।

ब्रिटिश शासन की गुलामी में देश ने क्या भोगा, यह किसी से छिपा भी नहीं है क्योंकि इतिहास गवाह है। यह भी कोई रहस्य नहीं है कि अत्याचारों को भुगतने में इस देश के आम नागरिकों ने धैर्य की अनंत सीमा का परिचय किस तरह दिया था।

इकसठ वर्ष गुजर चुके हैं। मानव उम्र के लिए यह वृद्धावस्था का प्रारंभ होता है। परंतु आजाद राष्ट्र के लिए इसे किशोर वय लेकिन वयस्कता की दहलीज कहना ठीक रहेगा। जन्म से इस उम्र तक आते-आते राजनीति आधारित इस लोकतांत्रिक शासन प्रणाली ने क्या उपलब्धियाँ हासिल कीं, यह इस टिप्पणी का विषय नहीं है। ये तो सभी के सामने स्पष्ट है कि राष्ट्र की प्रगति कहाँ तक पहुँच चुकी है।

लेकिन इस अवधि में भारतीय राजनीति की दशा-दिशा कैसी रही है, यह गंभीर चर्चा
  शासक राजनीति है जिसकी नजर लोककल्याणकारी राजा की नजर नहीं, स्वार्थप्रेरित शासक की नजर है। राजनीति जो चाहती है, मिनटों में हो जाता है। जनता जो चाहती है, वह इकसठ वर्षों में भी नहीं हो पाया है। इसे आजादी कहना कठिन है। यह तो एक और गुलामी है      
का विषय है। आज राजनीति कहाँ खड़ी है, किस हाल में है यह गौर करने का बिंदु है। प्रारंभ में माना यह गया था कि राजनीति की स्वतंत्रता के जरिए शासन में जनता की भागीदारी निश्चित होगी। इस तरह जनता के लिए जनता का शासन जनता के ही हाथों में स्थापित हो जाएगा। सैद्धांतिक तौर पर ऐसा हुआ भी। आज भी हो रहा है। चुनाव होते हैं। जनता के ही कुछ सदस्य चुनाव लड़ते हैं।


जनता ही उनमें से 'बेहतर' का चुनाव कर अपना शासन उन्हें सौंपती है। वे शासन में पहुँचकर जनहितों की पूर्ति के लिए काम भी करना शुरू करते हैं। क्या जनहितों की पूर्ति होती है? इस प्रश्न को भी थोड़ी देर के लिए अलग रख दें। यह विचार करें कि जिस राजनीति को जनता की सेवा का माध्यम बनाया गया था, क्या वह सेवक भी भूमिका में बनी हुई है? क्या वह जनता की अपेक्षाओं की पूर्ति कर बेहतर समाज की रचना में आगे बढ़ी है जैसा कि लक्ष्य तय किया गया था?

बाल गंगाधर तिलक की यह बात ठीक है कि राजनीति साधुओं के लिए नहीं है। लेकिन वह डाकुओं के लिए भी तो नहीं है। उसे तो आमजन की भूमिका का निर्वाह करने की जवाबदारी सौंपी गई थी। फिर ऐसा क्या हुआ कि राजनीति तानाशाह बन गई और जनता उसकी सेवक? भूमिकाओं में यह हेराफेरी किसने की, क्यों की, कब की? इन प्रश्नों के उत्तर खोजे जाने चाहिए थे। लेकिन उत्तर मिल जाते तो राजनीति का सुरूर उतर जाता। वह जनता का शासक बनने की हिमाकत नहीं कर पाती।

सच यह है कि राजनीति शासक बनकर जनता पर राज कर रही है। कहते हैं कि सत्ता का नशा जर, जोरू और जमीन के नशे से भी ज्यादा मतवालापन पैदा करता है। राजनीति शासक होकर मतवाली भी हो गई है। मद के कारण वह केवल अपने कद को ही ऊँचा देख पा रही है। शेष उसे बौने नजर आ रहे हैं। क्या इसे स्वस्थ लोकतंत्र की दिशा कह सकते हैं? क्या यह स्वीकार किया जा सकता है कि ब्रिटिश गुलामी से आजाद हुए राष्ट्र की जनता आज वाकई आजाद है?

क्या स्थितियाँ यह नहीं कहती दिखाई दे रही हैं कि जनता अब भी गुलाम है, केवल शासक बदल गए हैं? तब विदेशी शासक थे। आज राजनीति ने उनकी जगह ले ली है। केवल मत देने की आजादी को पूर्ण आजादी कैसे कह सकते हैं? कैसे स्वीकार कर सकते हैं कि जनता राजनीति के बंधनों में नहीं है, स्वतंत्र है? यह स्थिति कुछ मायनों में यदि ब्रिटिश शासन की गुलामी से भी बदतर दिखाई देती है तो इसके लिए जनता को तो जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है, क्योंकि वह तो शासित है।

शासक राजनीति है जिसकी नजर लोककल्याणकारी राजा की नजर नहीं, स्वार्थप्रेरित शासक की नजर है। राजनीति जो चाहती है, मिनटों में हो जाता है। जनता जो चाहती है, वह इकसठ वर्षों में भी नहीं हो पाया है। इसे आजादी कहना कठिन है। यह तो एक और गुलामी है। इस बार किसी विदेशी की नहीं अपनों की गुलामी है।
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