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समय! ठहरो सूर्य कुछ कहता है
हमारे वैज्ञानिकों और अभियंताओं ने इसके लिए आवश्यक तकनीक और उपकरण आदि भी तैयार कर लिए हैं, लेकिन सरकारों की उदासीनता के कारण इनका कोई इस्तेमाल नहीं कर रहा है। मंत्रालय ने गुड़गाँव-फरीदाबाद मार्ग पर ग्वाल पहाड़ी पर 50 किलोवाट क्षमता का सौर तापीय बिजलीघर अवश्य बनाया है, लेकिन ग्रिड के लिए सौर ऊर्जा से बिजली बनाने की ओर किसी प्रकार की कोशिश नहीं की गई।

कुछ दक्षिणी राज्यों ने दिलचस्पी अवश्य दिखाई है और तमिलनाडु ने अपने अधिकारियों को सौर ऊर्जा बिजलीघर के बारे में जानकारी लेने के लिए जर्मनी और स्पेन भेजा है। लेकिन मंथर गति से चलने वाले घिसे-पिटे सरकारी रवैए ने केवल औपचारिकता मात्र ही निभाई है। नवीन और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय ने सौर ऊर्जा से बिजलीघर बनाकर ग्रिड को बिजली देने में सरकार की ओर से वित्तीय प्रोत्साहन देने की घोषणा अवश्य की है।

इस योजना के अनुसार फोटो वाल्टाइक तरीके से बिजली बनाने पर प्रोत्साहन की दर 12 रुपए प्रति यूनिट और सौर ताप से बिजलीघर बनाने पर 10 रुपए प्रति यूनिट की दर होगी। लेकिन हैरत की बात यह है कि उसमें यह शर्त डाल दी गई है कि सौर बिजलीघर की क्षमता एक मेगावाट से कम नहीं होनी चाहिए।

मुझे दुःख इस बात का है कि मेरी अनंत क्षमता होते हुए भी मध्यप्रदेश में निविदा प्रणाली के माध्यम से टेंडर मँगवाकर कम बोली की आड़ में मेरी गुणवत्ता का क्षरण किया। छत्तीसगढ़ ने घरेलू सौर ऊर्जा पर प्रति लीटर 40 रुपया व व्यावसायिक उपयोग पर 25 रुपया सबसिडी देकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली।

समय! तुम जानना चाहोगे कि मेरा उपयोग कैसे हो और मेरी लागत लाभ का क्या ढाँचा होगा? मेरी ऊर्जा से बिजली बनाने के लिए प्रमुख रूप से दो तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं। पहला तरीका है फोटो वोल्टाइक या पीवी प्रणाली और दूसरा सोलर कलेक्टर के माध्यम से गर्मी या ताप का इस्तेमाल। फोटो वोल्टाइक प्रणाली के तहत धूप वाले स्थान पर सोलर पैनल लगाया जाता है, जिनके सोलर सेल सीधे ताप से बिजली बनाते हैं।

अस्पतालों, होटलों, सरकारी कार्यालयों, बड़ी-बड़ी शिक्षण संस्थाओं आदि की
  आवश्यकता इस बात की है कि इस तकनीक की कीमत कम करने के लिए और भी जोरदार अनुसंधान और प्रयास हों। मेरी गर्मी या ताप बिजली इस्तेमाल के लिए 'सोलर कलेक्टर' गर्माहट से इकट्ठा कर जिस बायलर तक पहुँचाते हैं उसकी भाप से टरबाइन चलाकर बिजली बनाते हैं      
छत पर सोलर पेनल के उपयोग के व्यावसायिक रूप से 12 मेगावाट बिजली बनाई जा रही है। फोटो वोल्टाइक तरीके से बिजली बनाना महँगा तरीका है इसलिए लोकप्रिय नहीं हो पा रहा है, लेकिन जिस तरह तेल कंपनियाँ ढाई लाख करोड़ का घाटा उठाकर तेल बेच रही हैं और सरकार 112 करोड़ से अधिक के तेल बॉण्ड जारी कर चुकी है, उनको देखते हुए फोटोवोल्टाइक या पीवी प्रणाली को सबसिडी देना जनता और सरकार दोनों को सस्ता पड़ेगा।


आवश्यकता इस बात की है कि इस तकनीक की कीमत कम करने के लिए और भी जोरदार अनुसंधान और प्रयास हों। मेरी गर्मी या ताप बिजली इस्तेमाल के लिए 'सोलर कलेक्टर' गर्माहट से इकट्ठा कर जिस बायलर तक पहुँचाते हैं उसकी भाप से टरबाइन चलाकर बिजली बनाते हैं। सोलर पैनल से बिजली बनाने के स्थान पर यह तरीका सस्ता है।

अब केंद्र और राज्य सरकार का दायित्व है कि वे देश के बड़े-बड़े भवनों की छतों को बिजलीघरों में कैसे बदलते हैं। शुरू में यह तो किया ही जा सकता है कि ऊँची इमारतों में ऊर्जा संरक्षण कोड जरूरी हो। इसके लिए ऊर्जा की कम खपत के साथ-साथ पर्यावरण की भी रक्षा होगी और प्रदूषण कम फैलेगा।

ऊर्जा संरक्षण कोड के तहत बहुमंजिला इमारतों में सौर ऊर्जा का प्रयोग किए जाने के साथ-साथ कम ऊर्जा खपत वाले उपकरण, कम ऊर्जा खपत वाली लिफ्ट, बल्ब और ऊर्जा संरक्षण के लिए सेंसर आदि का प्रयोग अनिवार्य होना चाहिए। अगर समझदारी के साथ रणनीति अपनाई जाए तो सौर ऊर्जा से देश का विद्युत संकट बहुत हद तक दूर हो सकता है।
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